दुनिया 200 साल बाद

क्योंकि ब्‍योंड़े के टूट जाने पर किला देर तक नहीं बचता…

अबकी उन्‍हें भी अहसास हो गया था, शायद इसीलिए उन्‍होंने भारतीय जनता पार्टी को लगातार ‘बाहरी’ और ‘जमींदार’ बताकर चुनाव प्रचार किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल के लिए ‘विदेशी’ भाजपा को रोकने वाली ‘देसी’ ताकतों की जमीन छिन चुकी थी जबकि उसे बढ़ाने वाली विभाजनकारी हवा समूचे बंगाल को घेर चुकी थी।

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दुनिया 200 साल बाद

प्रथम अंक: मई, 2026 की सुर्खियां

अपने अखबारी जन्म के दो सौ वर्ष बाद ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला डिजिटल अंक पाठकों के सामने प्रस्तुत है। इस अंक में कुल सात कहानियाँ हैं जो बंगाल के चुनाव के संदर्भ में लिखी गई हैं। उनके अलावा सबसे पहली कहानी ‘उदन्त मार्तण्ड’ के मूल छापाखाने की कलकत्ते में तलाश का एक प्रसंग है।

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दुनिया 200 साल बाद

बंगाल का खतरनाक प्रायश्चित उसे बनारस के करीब ला रहा है

यह अनायास नहीं है कि जो बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश में 1992 में तोड़ी गई थी, वह बंगाल के मुर्शिदाबाद में 2026 में बनाई जा रही है। बंगाल का यह सबसे नया प्रायश्चित उसे सियासी तौर से एक बार फिर बनारस के करीब ला रहा है। इस बात को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा गए बगैर नहीं समझा जा सकता।

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बनारस में तहज़ीब के मरकज़ का मलबा देखिए…

वो शाम रमज़ान की पहली थी। रोज़े शुरू हो रहे थे। उम्‍मीदन नई सड़क पर अच्‍छी खासी भीड़भाड़ थी। जितनी आम तौर से रहती है उतनी तो थी ही लेकिन त्‍योहार की खरीदारी करने वाले खासकर गलियों में ठुंसे पड़े थे। उन्‍हीं गलियों में, जहां से तबाही का मंज़र शुरू होता था।

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बनारसियों के लिए दालमंडी कोई मुद्दा क्यों नहीं है? फिर भी लोग नाराज हैं…

वो फिर से सवर्णो में कोई ऐसा मुद्दा डाल देगा कि आपस में लड़ाएगा लेकिन सवर्ण लड़ेंगे नहीं आपस में, ठीक है मिले जिसको मिले। हमारा कहना है बस गरीब को मिले, जरूरतमंद को मिले। हकीकत ये है कि जो मजबूत है उसी को आरक्षण मिल रहा है, गरीब को नहीं। हरिजन परिवार में भी जो नौकरी पा गया है उसी को मिल रहा है।

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दालमंडी: काशी विध्‍वंस का सबसे संगीन अध्‍याय

मामला केवल दालमंडी को तो़ड़ने तक सीमित नहीं है। आगे रेवड़ी तालाब के पुनर्निर्माण का भी ठेका निकल चुका है। वह भी मुस्लिम बहुल इलाका है। इस सब की जड़ में काशी को क्‍योटो बनाने वाली केंद्रीय परियोजना है, जिसकी पहली कील बनारस की छाती में 2019 में गड़ी थी जब विश्‍वनाथ मंदिर को गंगा से सीधे जोड़ने के लिए करीब ढाई सौ विग्रहों, इतने ही भवनों और एक समूची सभ्‍यता को हमेशा के लिए मिटा दिया गया था जिसमें गलियां थीं, चौक चौराहे थे, पुस्‍तकालय थे और प्राचीन देवालय थे।

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काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस : कलकत्ता वाया बनारस

लड़के ने ऊपर से मुंडी बाहर निकालते हुए कहा, अंकल अंदर की कहानी है। मैं पॉलिटिक्स पर बात नहीं करता, लेकिन खेल हुआ है। मैं वहीं का हूं, जानता हूं। बाकी, मंदिर तो बहुत भव्य बना है। योगी मोदी नहीं बनवाते तो ऐसा स्वरूप निकल के नहीं आता। इस पर श्रीवास्तव जी कुछ नहीं बोले। उनकी बिटिया ने चुपके से बाप से कहा, लगता है भैया भाजपाई हैं! बै…

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उस्‍ताद के उजड़े दयार पर तीन घंटे

रवींद्रनाथ को पढ़ने के लिए आपको शांति निकेतन में जाना होगा। समेट दिया कोने में। रवींद्रनाथजी वहीं बैठे हैं। पेड़ के नीचे। आप कल्‍चर की बात कर रहे हैं, यहां छोटा बच्‍चा गाली से बात करना शुरू करता है। कल्‍चर गायब हो चुका है। कुछ नहीं है। यहां का हालत बहुत खराब है। आप जिन लोगों से बात कर रहे हैं न, वो दिन में गांजा पीते हैं और रात में शराब पीते हैं। काम क्‍या करते हैं, पॉलिटिक्‍स…

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सड़क के रिश्‍ते

ऐसा लगता है कि पूरा शहर किसी आश्वस्ति के लंबे बहकावे में है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कलकत्ता दरअसल अतियों का शहर है। या कहें कि बंगाल अतियों की धरती है। अपने बिद्यार्थी दादा कहते हैं कि इस जमीन ने जितने बिप्‍लवी पैदा किए उतने ही क्‍लर्क भी पैदा किए हैं। यानी, यहां बदलाव किसी एक चरम पर जाकर ही होता है वरना लंबे समय तक यथास्थिति बनी रहती है। फिलहाल शहर के लोगों से बात कर के लगता है कि वे यथास्थिति के मूड में हैं।

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दो सौ साल बाद 37, अमड़ातला गली की तलाश…

चायपत्ती वाले का कहना था कि इमारत पहले किसी मुसलमान की थी जिससे चायपत्ती वाले मारवाड़ी ने खरीद कर जमींदोज कर दिया और नई बनवाई। कौन जाने उस मुसलमान ने भी किसी और से न खरीदी रही हो। जो पता इतिहास में ‘अमड़ातला की गली 37 अंक’ के नाम से दर्ज हो ही चुका है, वहां 27 मकानों के बीच 37वां खोजना वैसे भी बेवकूफी ही होती। क्‍या करते हम मालिक से मिल के!

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