दुनिया 200 साल बाद

साधु और शैतान के बीच प्रेत होने की कला

श्रीकांत वर्मा सम्मान को लेकर हुई फजीहत और आलोचना के बाद अशोक वाजपेयी ने कह दिया कि वे बीस बिस्वा के ब्राह्मण हैं और जो उनके कार्यक्रम में नहीं आएगा उसको वे श्राप दे देंगे। अब हमारे यहां श्राप तो प्रेत ही देते हैं, चाहे जिंदा हों या मृत! श्राप वही देता है जो प्रेत योनि में अटका हुआ हो, अतृप्त हो। अशोक वाजपेयी की अतृप्ति पहले से समझ में आती रही है, इसलिए उनके श्राप का क्या ही बोझ लेना! इस हफ्ते कहानी कला के क्षेत्र से एक बड़े साधक की, जिसकी मौत हुए अस्सी साल हो रहे हैं लेकिन जिसे समझना आज भी टेढ़ी खीर है।

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दुनिया 200 साल बाद

राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!

Bharat Kala Bhawan

क्‍या यह समाचार सामान्‍य है कि बनारस के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार एक संग्रहालय को दे‍ दिए, घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्‍मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्‍मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था!

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दुनिया 200 साल बाद

वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…

हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्‍यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्‍दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्‍वभाव है।

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दुनिया 200 साल बाद

बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया

Sayaji Rao Gaekwad Central Library, BHU

बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।

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दुनिया 200 साल बाद

‘वंदे भारत’ के अजनबी

दिल्‍ली के पंजाबी बनियों, हापुड़ के एक चौधरी साहब और कुछ मद्रासी श्रद्धालुओं की यह कहानी बताती है कि खाये पीये अघाये सभ्‍य समाज के भीतर भी कैसे कुछ लोगों को बेगाना और अजनबी बना कर खारिज कर दिया जाता है। बात बनारस की ही है, जहां अशोक ने अपने उत्‍पीड़न की अर्जी दी थी और जहां से श्रद्धालुओं की एक पार्टी दिल्‍ली की ट्रेन में चढ़ी।

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बनारस से अशोक बनवासी की चिट्ठी

इस कहानी की तस्‍वीर में दिख रही दुखियारों की भीड़ में अशोक बनवासी कोई भी हो सकता है। आप गौर से देखें तो उसे पहचान भी सकते हैं। उसकी दी हुई चिट्ठी को नीचे जस का तस छापा जा रहा है। यह कहानी अकेले अशोक की नहीं, उन सैकड़ों लोगों की हो सकती है जिन्‍हें केवल उनकी पैदाइश के चलते अपराधी मान लिया जाता है।

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दुनिया 200 साल बाद

मटियाबुर्ज: होने और न होने के बीच

कलकत्ते में वाजिद अली शाह की खुशबू लेनी हो तो मटियाबुर्ज जाना चाहिए, जहां नवाब ने अपने आखिरी साल बिताए और शहर के भीतर एक छोटा सा अदद लखनऊ बसा डाला। आज भी यहां आप किसी से दो बात कर लें तो भूल जाएंगे कि बंगाल में हैं।

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दुनिया 200 साल बाद

दिल्‍ली सल्‍तनत बनाम ‘नई हिंदी’ : ज़टल्‍ली से Gen-Z तक

A Gen-Z Placard at Jantar Mantar, Delhi

आप इंस्‍टाग्राम खोलिए, एक से एक नारे और एक से एक पिंगल सुनने-देखने को मिलेंगे जिन्‍हें आज तक इस देश में खुलकर कभी किसी इंकलाबी कार्रवाई में नहीं बरता गया था। दोस्‍त-यारों के बीच हंसी ठिठोली या मार-झगड़े के दौरान गाली-गलौज की बात अलग है। विडम्‍बना है कि यही शब्‍द अब सरकार-विरोधी जुटान को ताकत दे रहे हैं।  

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दुनिया 200 साल बाद

होरमुज़ पर टिकी किसानों की उम्मीद कहीं टूट न जाए!

Fertilizer Cebter in Mahu, MP

ऐसा कम ही देखा गया है कि जंग दुनिया के किसी एक हिस्‍से में छिड़ी हो और किसी दूसरे कोने में लोगों की जबान पर वहां की एक नहर का नाम बैठ गया हो। होरमुज़ के साथ बीते एक साल में यह घटा है, जो किसी के लिए स्‍ट्रेट है, किसी के लिए जलडमरूमध्‍य, किसी के लिए जलसंधि तो किसी के लिए तेल और खाद की उम्‍मीद…!

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दुनिया 200 साल बाद

कोउ नृप होय हमै ही हानी… अमीनुल हक की यही कहानी!

Sculpture of the Ahom rebellion as seen in Shaheedi Park, Delhi.

दो सौ साल की उम्र वाले असम और पचहत्तर साल से ज्‍यादा उम्र वाले इस भारतीय गणतंत्र में नागरिकता का संकट हास्‍यास्‍पद स्‍तर तक राजाज्ञा और विशेषाधिकार का मामला बन चुका है

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