1826 के झरोखे से

दो सौ साल पहले विलायती कपड़े से शुरू हुई एक कहानी

आजकल दिल्‍ली में विलायत से बड़े-बड़े मेहमान नेता लोग आए हुए हैं। इसको ब्रिक्‍स सम्‍मेलन कहा जा रहा है। तीन साल पहले बिलकुल इसी मौसम में यहां और ज्‍यादा विदेशी मेहमान आए थे। उसे जी20 के नाम से हो रहा सम्‍मेलन बताया गया था। अपने यहां के लोग नामों का इतना महीन अंतर नहीं समझते। वे सब धान बाईस पसेरी तौलते हैं। जैसे, कोई विदेशी कहीं दिख गया तो वह हमारे लिए अंग्रेज ही है, अंग्रेजी राज की गुलामी का ऐसा जोर दिमाग पर अब तक पड़ा हुआ है।

और अभी तो जी20 का जोर-जबर ही ठंडा नहीं पड़ा है, फिर ये नया नाम ब्रिक्‍स किसी की जबान पर कैसे चढ़ सकता है इतनी जल्‍दी! ये बात इससे समझ पड़ती है कि उस दिन शास्‍त्री भवन के पास पेड़ के नीचे बाल काटने वाले फुरकान ने बड़ी मासूमियत से पूछा था- भइया, ये जी ट्वेंटी फिर से होने जा रहा है क्‍या?

दाढ़ी बनवाकर उठे दीवानजी वहीं खड़े थे। उन्‍होंने नाम पर टोका नहीं, बस ताजा-ताजा छंटी हुई अपनी मूंछ में अटका हुए एक बाल चुनते हुए इतना ही बोले- दो दिन पहले ही दुकान हटानी पड़ेगी। सब साफ सफाई कर दी जाएगी। इस रोड पर आना जाना बंद। सरकारी दफ्तर भी बंद

जमीन पर बैठ के अखबार बांच रहे चाचा ने पिंगल मारा- हां, और क्‍या! अंग्रेज लोग आएंगे तो हम लोग का यहां क्‍या काम। भइया फुरकान, तू तो तीन दिन की छुट्टी मना ले अब…। फुरकान ने ग्राहक पर उस्‍तरा फेरते हुए बेमन से कहा- काहे की छुट्टी? साले रोज रोज चले आवे हैं रोजी रोटी मारने। इन्‍हें और कोई और काम ना है क्‍या?

अब, अपने यहां विलायतियों का जलवा ही ऐसा है। आज से थोड़े है। इतिहास गवाह है। बस फुरकान उतना पढ़ा-लिखा नहीं है, उसकी क्‍या गलती!

‘विशाल भारत’, 1931 के एक अंक में ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी लिखते हैं:

‘आजकल हमारे देश में लगभग 60,00,00,000 का विलायती कपड़ा आता है। आजकल हम लोगों को अपनी शारीरिक लज्‍जा को भी निवारण करने के लिए विदेशियों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है, मगर क्‍या भारतवर्ष सदा से वस्‍त्र के लिए दूसरों का आश्रित रहा है। एक सौ पन्‍द्रह वर्ष पहले विलायती कपड़े की कितनी खपत भारतवर्ष में थी इसका हाल ‘’उदन्‍त मार्तण्‍ड’’ के तारीख 5 सितम्‍बर के अंक में इस प्रकार दिया है:

इस देश में विलायती कपड़ों की आमदनी किस तरह से साल-साल बढ़ती गई वह नीचे के लिखे ब्‍योरे के देखने से ही समझ पड़ेगा।

सन 1815 में एक लाख उनचास हजार अरसठ रुपये का ओ 1816 में एक लाख तिरसठ हजार छ सौ पंदरह रुपये का ओ सन 1817 में चार लाख तेइस हतार आठ सौ चौंतिस रुपये का ओ सन 1818 में सात लाख एक हजार पांच सौ बिरानवे रुपये का ओ 1819 में चार छेआसठ हजार सोलह रुपये ओ सन 1820 में आठ लाख तिरसठ हजार छ सौ ए‍कतिस रुपये का ओ सन 1821 में ग्‍यारह लाख छत्तीस हजार चौहत्तर रुपये का ओ सन 1822 में ग्‍यारह लाख सतसठ हजार दो सौ छियालीस रुपये का ओ सन 1823 में ब्‍यारह लाख इक्‍यासी हजार छ सौ एकहत्तर रुपये का ओ सन 1824 में ग्‍यारह लाख अड़तीस हजार एक सौ छैयासठ रुपयेका माल आया ओर अब सूते की भी आमदनी इससे बढ़के होगी।’

बनर्जी इस पर टिप्‍पणी करते हुए आगे बहुत काम की बात लिखते हैं:

‘ज़रा सोचिए कि कहां डेढ़ लाख रुपये का साल का कपड़ा और कहां साठ करोड़ रुपये वार्षिक का! एक सौ पन्‍द्रह वर्ष में 4,00,00,00 प्रति सैकड़ा की वृद्धि!! जब राजसत्ता के साथ साथ व्‍यापारिक दोहन की नीति काम में लाई जाती है, तब उसका परिणाम कितना भयंकर होता है।’