लुटियंस की दिल्ली जब से बनी है अपनी डिजाइन में ही वह अश्लील, निर्जीव और अंधेरी है। प्रधान सेवक को लगता है कि लुटियंस दिल्ली ने उन्हें कभी नहीं अपनाया। पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी इसके डिजाइन से असंतुष्ट रहते थे। उन्होंने कहा था कि ‘अपनी तमाम तड़क-भड़क और आडम्बर में नई दिल्ली ब्रिटिश सत्ता का स्पष्ट प्रतीक नजर आती है।‘ नीरद सी. चौधरी से लेकर वीएस नायपॉल तक लुटियंस की दिल्ली की बनावट के आलोचक रहे।
शिकायतें तो बहुतों को रहीं, अलग-अलग किस्म की, लेकिन उस पर ठोस काम केवल प्रधान सेवक ने किया क्योंकि वह थोड़ा निजी मामला था। उन्होंने पुरानी संसद बंद करवा दी, नया सेंट्रल विस्टा बनवा दिया। यहां तक कि इस साल की शुरुआत में राष्ट्रपति भवन से एडविन लुटियंस की कांसे की प्रतिमा भी हटवा दी। सड़कों के नाम तो बदल ही दिए। हजार से ज्यादा सरकारी बंगलों वाले इस रेगिस्तान में प्रतीकों को बदलने से यदि हरियाली आ जाती तो दिक्कत ही क्या थी, पर अबकी तो जीवन-जगत और जनता की आखिरी उम्मीद जंतर-मंतर को ही उजाड़ दिया गया।
जंतर-मंतर से पहले लुटियंस की दिल्ली में जीवंतता का प्रतीक बोट क्लब हुआ करता था। पुरानी वाली संसद से यह कुछ मीटर की दूरी पर था। यहां देश भर से तमाम लोग जब अपनी वास्तविक और काल्पनिक शिकायतें लेकर जुटते, तो बगल में बहती नकली नहरों का पानी मचल उठता था। पहले सरकार ने बोट क्लब को खत्म किया, अब तीन दशक बाद जनता को नई दिल्ली की सरहद से ही बाहर हकाल दिया है। लुटियंस की दिल्ली में रोशनी का अंतिम किवाड़ बंद हो गया। अंधेरे की छाया मुकम्मल हो चुकी है।

एक आदर्श शहर के बारे में पत्रकार जेन जेकब्स ने लिखा है कि यह एक ऐसी रिहाइश है जिसे पैदल चलकर नापा जा सके और चलते हुए जिसके सारे रंगों का साक्षात्कार किया जा सके। इस पैमाने पर बनारस एक आदर्श शहर जान पड़ता था, जिसे प्रधान सेवक ने बीते बारह साल की अपनी सांसदी में लुटियंस दिल्ली जैसा सपाट और एकरंगा बनाने की भरपूर कोशिश की है। क्या यह इत्तेफाक है कि बनारस से एडविन लुटियंस को भी शिकायत थी?
लुटियंस बनारस गया था एक बार। वहां एनी बेसेन्ट से मिलने के बाद उसने अपनी पत्नी लेडी एमिली को ख़त लिखा, ‘बेसेन्ट से मिलने के बाद हम लोग शहर में मंदिरों को देखने निकले। बाप रे! धूल-धक्कड़, कीचड़ और सांड़, गाय, बंदर की पूजा! असंभव! और हर चीज इतनी बदबूदार, घिनौनी, लिसलिसी और बर्बर। ऐसा लगा कि कोई विशालकाय गाड़ी आकर इन सबको कुचल दे तो ही ठीक। हिंदुओं को लेकर मेरे मन में थोड़ा उदार भाव था, लेकिन उनका पवित्र शहर बनारस तो अविश्वसनीय रूप से सड़े हुए कचरे जैसा निकला।‘
बनारस के पुराने पत्रकार सुफल कुमार अपनी किताब ‘दिल्ली: सिटी ऑफ योगिनीज़’ में लिखते हैं, ‘बनारस ने समय रहते इस अपमान का बदला ले लिया जब एक बनारसी जिद्दू कृष्णमूर्ति ने लुटियंस की बीवी को उससे छीन लिया। लेडी एमिली युवा कृष्णमूर्ति के प्रभाव में आ गई और खुद को उन पर न्यौछावर कर डाला। वह उन्नीस साल छोटी थी, लेकिन कृष्णमूर्ति के साथ अपने रिश्ते को उसने मां-बेटे का नाम दिया।‘
बीवी छिन जाने के बाद एडविन की जिंदगी उजड़ गई। उसके पास रायसीना हिल की वीरानगी के अलावा गले लगाने को कुछ नहीं रह गया। उसने ‘अपनी पूरी हैवानियत के साथ अपनी यौन कुंठा को वहां उतारने की कोशिश की’, जिसका नतीजा उसकी बनाई नई दिल्ली है। इस प्रसंग का जिक्र करते हुए सुफल कुमार ने जेन रिडली की लिखी एक किताब का संदर्भ दिया है, जिसमें लुटियंस दंपत्ति के विपुल पत्राचार शामिल हैं। रिडली के दादा लुटियंस दम्पत्ति की बेटी उर्सुला से ब्याहे थे। रिडली अपनी किताब द आर्किटेक्ट ऐंड हिज़ वाइफ: ए लाइफ ऑफ एडविन लुटियंस में लुटियंस की बनाई दिल्ली की अद्भुत व्याख्या करती हैं।
वे पूछती हैं, ‘क्या वास्तुकला का जन्म यौन कामनाओं और हताशाओं से होता है?’ इसका जवाब में हां से देती हैं। वे बताती हैं कि लेडी एमिली अपने पति के अधूरे और लिजलिजे प्यार से उकता चुकी थीं, इसलिए कृष्णमूर्ति के प्रभाव में आने के बाद उन्होंने एडविन से शारीरिक संबंध तोड़ लिए। उसने पति को ख़त में लिखा, ‘मेरा मानना है कि एक औरत का अपने शरीर पर अधिकार होता है। अगर वह स्वेच्छा से खुद को दे तब तो संबंध खूबसूरत होगा, लेकिन जहां दबाव में उसे खुद को देना पड़े तो इसे वेश्यावृत्ति कहा जाएगा- शादी में रहते हुए या उसके बाहर- और यह घोर पाप है।‘
रायसीना की पहाड़ी उस वक्त अनछ़ुई थी, अक्षत थी। वह बोल नहीं सकती थी। किसी से शिकायत नहीं कर सकती थी। एडविन लुटियंस ने उसके साथ जो बलात्कार किया, उसे काट-पीट कर जैसा साम्राज्यवादी आडम्बर खड़ा किया, सुफल कुमार के शब्दों में- वह ‘आज भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की शर्म है’। इसी अश्लील लुटियंस दिल्ली को देखकर नीरद चौधरी ने कहा था कि ‘मैं नहीं जानता था कि केवल बंगलों वाली जगह को भी शहर कहा जा सकता है।‘
लुटियंस के बनाए इस ‘शहर’ में जब संसद बनी, तो उसके गेट संख्या 1 के ऊपर छांदोग्य उपनिषद की एक ऋचा लिखी गई जिसका मोटामोटी अर्थ था, ‘अपने लोगों के लिए दरवाजे खोल दो ताकि वे सम्प्रभुता का अनुभव कर सकें।‘ बहुत साल बाद जॉर्ज फर्नांडीज ने एक बात पूछी, ‘अजीब रहस्य है कि एक बार संसद में घुस जाने के बाद निर्वाचित सदस्य जनता के हितों को क्यों भूल क्यों जाते हैं?’

दरअसल, संसद के भीतर जहां चुने हुए प्रतिनिधि बैठते थे वहां असली सम्प्रभुता थी ही नहीं, बल्कि पास के बोटक्लब पर थी जहां लोग अपनी मांगों को लेकर धरना देते थे। संसद के भीतरी कक्षों और सभागारों में तो हमेशा अंधेरा रहता था। वह एडविन लुटियंस की अंधेरी कुंठित आत्मा की परछाई थी। रोशनी तो लोकतंत्र के धरनास्थल पर थी, जो कालान्तर में बोट क्लब से होते हुए जंतर-मंतर पहुंचा और अंत में लुटियंस दिल्ली की सीमाओं के बाहर फेंका जा चुका है।
बहुत से लोगों को सरकार की यह हरकत नागवार गुजरी है। उन्हें एडविन लुटियंस की कहानी पढ़नी चाहिए और ऐसी कार्रवाइयों के पीछे की मनोवैज्ञानिकता को समझना चाहिए, कि एक हताश-कुंठित मर्द किसी भी रोशनीदार जगह को कैसे और क्यों अंधेरे में डुबो देता है। कभी दिल्ली डूबी थी, आज बनारस की बारी है। लुटियंस की आत्मा तो खुश ही हो रही होगी कि उसका बदला उसी के जैसा कोई स्त्रीहीन पुरुष बनारस ही नहीं, पूरे देश से ले रहा है। बहरहाल, जहां तक जनता की बात है उसके लिए एक बात अब भी उम्मीद की शेष है जिसकी ओर कभी बड़े पुलिस अधिकारी रहे के.पी.एस. गिल ने ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा था, ‘लुटियन की दिल्ली अंधेरे की गिरफ्त में है, दिल्ली की सरहद के पार जाओ तो आपको हर जगह रोशनी मिलेगी।‘
हो सकता है कि प्रदर्शनकारियों के लिए सरकार का यह कदम अदृश्य वरदान जैसा कुछ साबित हो। अंधेरे के किले में रोशनी की सरकारी थिगली तले बैठने से वैसे भी क्या हासिल हुआ है आज तक!
