किसी मनुष्य को समझना कितना मुश्किल या कितना आसान है? क्या किसी के जीते जी उसको समझा जा सकता है और पक्की राय बनाई जा सकती है? या मरने के बाद ही उसको वास्तव में सही ढंग से समझा जाता है? या फिर, बकौल निदा फ़ाज़ली, हर आदमी में इतने आदमी होते हैं कि उसे कई बार देखना पड़ता है? पर क्या कई बार किसी को देखना उसे सही ढंग से समझ लेने की गारंटी है?
ये सवाल इसलिए पैदा होते हैं क्योंकि हम किसी को साधु या शैतान की श्रेणी में डालने को उद्धत रहते हैं जबकि कहानी दोनों के बीच कहीं अटकी होती है- किसी प्रेत की तरह, जिसे सही ढंग से पहचाने जाने लायक मुक्ति नहीं मिल पाई हो, जो अपने किए अनकिए से उपजी छाया में ही भटक रहा हो और खुद को किसी खांचे में गढ़े जाने के विरुद्ध क्रोधित हो।
जैसे अशोक वाजपेयी, जिन्होंने श्रीकांत वर्मा सम्मान को लेकर हुई फजीहत और आलोचना के बाद कह दिया कि वे बीस बिस्वा के ब्राह्मण हैं और जो उनके कार्यक्रम में नहीं आएगा उसको वे श्राप दे देंगे। अब हमारे यहां श्राप तो प्रेत ही देते हैं, चाहे जिंदा हों या मृत! श्राप वही देता है जो प्रेत योनि में अटका हुआ हो, अतृप्त हो। अशोक वाजपेयी की अतृप्ति पहले से समझ में आती रही है, इसलिए उनके श्राप का क्या ही बोझ लेना! इस हफ्ते कहानी कला के क्षेत्र से एक बड़े साधक की, जिसकी मौत हुए अस्सी साल हो रहे हैं लेकिन जिसे समझना आज भी टेढ़ी खीर है।

ये कहानी बीसवीं सदी के एक बड़े कला प्रेत निकोलस रोरिक की है। रूसी में उनकी दूसरे नाम का उच्चारण रेरिक है, हालांकि उनकी भारतीय आश्रयभूमि हिमाचल प्रदेश के नग्गर में उनका नाम रेरिक और रोरिख दोनों तरीके से लिखा मिलता है। हम बीच का रास्ता अपनाएंगे, लोक का रास्ता, जो उन्हें रोरिक कहता है।
भूत प्रेतों की धरती नग्गर में रोरिक जब अमेरिका से भागकर आए तो अंतिम दिनों तक रहे। भारत को आजादी मिलते ही उनको भी देह से मुक्ति मिल गई। नग्गर में उनकी समाधि है। उनका संग्रहालय है, घर है। बहुत भारी भरकम परिसर है, जिसे रूस और भारत की सरकार मिलकर चलाती है। वे मूलतः पेंटर थे, लेकिन दार्शनिक और आध्यात्मिक भी थे। उन्होंने अग्नि योग नाम की एक स्वयंभू आध्यात्मिक धारा बनाई। दुनिया भर से विदेशी लोग रोरिक की समाधि पर आते हैं, दुखी मन और भारी चेहरे से उन्हें याद करते हैं। नग्गर के आम लोगों के लिए रोरिक का परिसर उनके लिए पहचान और गौरव का मामला लगता है।
उनके घर की सीढ़ियों पर चढ़ते ही ठीक सामने उनकी आदमकद तस्वीर लगी है जिस पर निगाह पड़ते ही ऐसा लगता है कि रोरिक की आंखें आपको भेद देंगी। आप भी उसे घूर कर देखने को मजबूर हो सकते हैं, अगर आपके पास अपनी नजर है। पहली नजर कहती है कि ये आंखें महज एक चित्रकार या कलाकार की नहीं हो सकतीं। अनुभव सबसे बड़ा गुरु है। रोरिक की आंखों में देखना एक अनुभव है, जो बताता है कि ये आदमी मुक्त नहीं हुआ है। ये एक क्रोधित अतृप्त प्रेत का चेहरा है।
गुजरे जमाने के प्रसिद्ध संगीतकार इगोर स्त्राविंस्की ने कभी रोरिक के बारे में कहा था कि ‘वे ऐसे दिखते हैं कि या तो वे रहस्यवादी हों या फिर जासूस’! यह उद्धरण रोरिक पर चार साल पहले पहली प्रामाणिक जीवनी लिखने वाले जॉन मैकानन की किताब में दर्ज है। किताब का नाम भी कम रहस्यमय नहीं है- ‘निकोलस रोरिक: द आर्टिस्ट हू वुड बी किंग’। यानी एक कलाकार, जिसे राजा होना था। रोरिक की आंखों पर जॉन खुद लिखते हैं कि ‘अपनी तस्वीरों और पोर्ट्रेट में रोरिक किसी स्फिंक्स की तरह अपलक हमें घूरते हैं’। जॉन के मुताबिक, उनकी किताब रोरिक को पलट कर घूर पाने की एक कोशिश है।

बहरहाल, आंखों की टेक से आगे बढ़ते हुए जब हम यह तलाशने की कोशिश करते हैं कि इस कलाकार की कला के आगे पीछे क्या क्या था, तो एक अजीब मायावी शख्स से हमारा सामना होता है। कोई सौ साल पहले की बात है जब निकोलस रोरिक एक टीम को लेकर ‘इतिहास के सर्वाधिक असामान्य सफर’ पर निकले थे। जॉन लिखते हैं कि 20 सितंबर 1927 को वे डम्बर दर्रे पर पहुंचे, जो दक्षिण पश्चिमी चीन और उत्तरी तिब्बत को जोड़ता है। उन्हें ल्हासा पहुंचना था। उनके काफिले के हाथ में अमेरिकी झंडा था लेकिन एक भी शख्स अमरीकी नहीं था। दिलचस्प है कि वे रूसी सरकार के वाहनों का इस्तेमाल कर के पहुंचे थे। यात्रा पर निकलने से पहले रोरिक ने घोषित किया था कि उनका उद्देश्य कलात्मक और अकादमिक है, वे हिमालय के चित्र बनाना चाहते हैं, एशिया के इस छुपे हुए इलाके के लोक और मिथकों को समझना चाहते हैं। वास्तविकता यह है कि कला और मिथक आदि उनकी ‘महान योजना’ का एक कवर था, आवरण था।
ये महान योजना क्या थी? वे शम्भाला के महान प्राचीन साम्राज्य को खोजना चाहते थे और अपना खुद का एक अखिल बौद्ध राज्य बनाना चाहते थे जिसमें मंगोलिया, मध्य एशिया, हिमालयी क्षेत्र और साइबेरिया के कुछ हिस्सों को मिलाया जाना था। यानी, वे अपने बनाए एक देश का राजा बनना चाहते थे। यहां याद रखा जाए कि शम्भाला हिन्दू और तिब्बती बौद्ध परंपराओं में वर्णित एक रहस्यमयी, पौराणिक और आध्यात्मिक राज्य है जहां कल्कि अवतार यानी मैत्रेय बुद्ध को भविष्य में जन्म लेना है। यूपी का सम्भल जिला इसी शब्द से निकला माना जाता है।
रोरिक का काफिला ल्हासा नहीं पहुंच सका, लेकिन मैत्रेय बुद्ध (जो हिंदू धर्म का कल्कि है) को जगाने और दुनिया को प्रलय से बचाने की उनकी महत्वाकांक्षा नहीं थमी। सात साल बाद वे फिर से अपना देश बनाने के लिए यात्रा पर निकले, अबकी फ्रैंकलिन रूजवेल्ट के अमेरिकी प्रशासन ने उनकी सीधी मदद की। यह रूस में बोल्शेविक क्रांति के बाद का समय था। रोरिक अपनी महान योजना के लिए अमेरिका और रूस दोनों का इस्तेमाल कर रहे थे। यहां तक कि उन्होंने चीन और जापान से भी अलग अलग समय पर मदद ली। अमेरिका के तीन राष्ट्रपति चुनावों के नतीजों पर उनका असर रहा। यहां नेहरूजी के वे बहुत प्रिय बने रहे। गोर्बाचोव ने उनका स्मारक बनवा दिया। अमेरिका में उनके नाम पर टावर खड़ा किया गया।
ये सब कुछ उन्होंने अपनी जरूरत के हिसाब से वैचारिक पाले बदल कर किया। वो भी शीतयुद्ध के पहले के दौर में, विश्व युद्धों के बीच, और इस हद तक कि किसी भी देश की सरकार को उन पर भरोसा नहीं रह गया। अंग्रेजों ने, चीनियों और जापानियों ने, रूसियों ने उन्हें जासूस और गुप्तचर माना। अंततः, 1935 में अमरीकी प्रशासन के भीतर उनके अग्नि योग के भक्तों ने उनसे रिश्ता तोड़ लिया। जब वित्तीय मदद मिलनी बंद हुई तो उनका परिवार अमेरिका छोड़ के भारत चला आया और नग्गर में बस गया। बाद में उन पर जितने किस्म के लेखन हुए, उनमें उनकी आलोचना वाले पक्ष ने उन्हें ठग कलाकार, आतंकवादी और शैतानपूजक तक कहा।

फिर भी, आज रोरिक की समाधि पर टहलते वक्त इसमें से एक भी संज्ञा का भी ठीक ठीक पता नहीं चलता, सिवाय उनकी आंखों के, जो साधु और शैतान के बीच अटके किसी प्रेत की आहट देती हैं। क्या ही दिलचस्प है कि एक आदमी जो अपने ही बनाए देश का राजा बनना चाहता था उसकी राजनीतिक परियोजना की आड़ उसकी कला थी। आज अशोक वाजपेयी जैसों में रोरिक के ही प्रेत का अंश दिखाई देता है, जो कहीं ज्यादा बेशर्मी से अपनी महत्वाकांक्षाओं के हित जीते जी श्राप देने तक में नहीं हिचकता!
क्या अशोक वाजपेयी के कला प्रेम को उनकी किसी महान योजना की आड़ माना जाना चाहिए? निकोलस रोरिक पर जॉन मैकेनन की किताब पढ़ें और खुद फैसला करें।
