जिन्हें जनजातियों के पर्यावरण की चिंता थी, उन्हें तो दिल्ली के प्रेस क्लब में सुनने के लिए कायदे से तीस लोग भी नहीं आए थे। इन्होंने जो चिट्ठी भेजी है प्रधान जज को पिछली 22 तारीख को, वो शायद उन्हें मिल गई होगी। उस पर देश भर से 340 लोगों के दस्तखत हैं, लेकिन वे उसे क्यों पढ़ेंगे?
दो सौ साल पुराने सूर्य के आभासी पुनरुदन्त पर एक औपचारिकता
हर साल की 30 मई की तरह इस बार भी हिंदी पत्रकारिता दिवस को रस्मी तौर से मनाकर लोग फारिग हो जाएंगे और अपने-अपने काम-धंधों में लग जाएंगे। फिर? शायद ढाई सौ साल होने पर इसे याद करें! वह घड़ी बहुत दूर नहीं है?
हिंदुस्तान का कॉकरोच प्रसंग और मलेशिया की एक कविता
दशकों पहले मलेशियाई अधिवक्ता और कवि सेसिल राजेंद्रा ने यह विलक्षण कविता लिखी थी जो इस प्रसंग की मूर्खता को कहीं बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करती है, बजाय इसके कि इस पर कोई आडंबरपूर्ण संपादकीय लिखा जाय!
क्योंकि ब्योंड़े के टूट जाने पर किला देर तक नहीं बचता…
अबकी उन्हें भी अहसास हो गया था, शायद इसीलिए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को लगातार ‘बाहरी’ और ‘जमींदार’ बताकर चुनाव प्रचार किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल के लिए ‘विदेशी’ भाजपा को रोकने वाली ‘देसी’ ताकतों की जमीन छिन चुकी थी जबकि उसे बढ़ाने वाली विभाजनकारी हवा समूचे बंगाल को घेर चुकी थी।
श्री श्रीमान् गवरनर जेनरेल बहादुर का सभा वर्णन
‘उदन्त मार्तण्ड’ के पहले ही अंक में श्रीमान् गवर्नर जनरल बहादुर का सभावर्णन दिया हुआ है। उस समय लार्ड एमहर्स्ट भारत के गवर्नर जनरल थे। ब्रह्मा की लड़ाई समाप्त हो चुकी थी, और ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रह्मा के राजाओं में उसी सन् में संधि हुई थी। ‘उदन्त मार्तण्ड’ में इस संधि की शर्तें प्रकाशित हुई थीं। इस संधि के उपलक्ष में जो दरबार हुआ था, उसी का वर्णन ‘श्री श्रीमान् गवरनर जेनरेल बहादुर का सभा वर्णन’ शीर्षक में दिया गया था।
प्रथम अंक: मई, 2026 की सुर्खियां
अपने अखबारी जन्म के दो सौ वर्ष बाद ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला डिजिटल अंक पाठकों के सामने प्रस्तुत है। इस अंक में कुल सात कहानियाँ हैं जो बंगाल के चुनाव के संदर्भ में लिखी गई हैं। उनके अलावा सबसे पहली कहानी ‘उदन्त मार्तण्ड’ के मूल छापाखाने की कलकत्ते में तलाश का एक प्रसंग है।
बंगाल का खतरनाक प्रायश्चित उसे बनारस के करीब ला रहा है
यह अनायास नहीं है कि जो बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश में 1992 में तोड़ी गई थी, वह बंगाल के मुर्शिदाबाद में 2026 में बनाई जा रही है। बंगाल का यह सबसे नया प्रायश्चित उसे सियासी तौर से एक बार फिर बनारस के करीब ला रहा है। इस बात को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा गए बगैर नहीं समझा जा सकता।
