इस यात्रा में उन्हें एक वर्ष सवा दो महीने लगे थे। वे 10 अक्टूबर सन् 1827 को लौटकर कलकत्ते पहुंचे थे। ‘उदन्त मार्तण्ड’ में उनकी यात्रा, दरबार और लोगों से मिलने-जुलने की खबरें बराबर छपा करती थीं।
दिल्ली सल्तनत बनाम ‘नई हिंदी’ : ज़टल्ली से Gen-Z तक
आप इंस्टाग्राम खोलिए, एक से एक नारे और एक से एक पिंगल सुनने-देखने को मिलेंगे जिन्हें आज तक इस देश में खुलकर कभी किसी इंकलाबी कार्रवाई में नहीं बरता गया था। दोस्त-यारों के बीच हंसी ठिठोली या मार-झगड़े के दौरान गाली-गलौज की बात अलग है। विडम्बना है कि यही शब्द अब सरकार-विरोधी जुटान को ताकत दे रहे हैं।
होरमुज़ पर टिकी किसानों की उम्मीद कहीं टूट न जाए!
ऐसा कम ही देखा गया है कि जंग दुनिया के किसी एक हिस्से में छिड़ी हो और किसी दूसरे कोने में लोगों की जबान पर वहां की एक नहर का नाम बैठ गया हो। होरमुज़ के साथ बीते एक साल में यह घटा है, जो किसी के लिए स्ट्रेट है, किसी के लिए जलडमरूमध्य, किसी के लिए जलसंधि तो किसी के लिए तेल और खाद की उम्मीद…!
‘उजियाली के घमंड’ में चूर ‘बहुत मोटे ओ बड़े’ लोगों के किस्से
उदन्त मार्तण्ड में सम्पन्न लोगों की धन सम्पदा से लेकर उनके शारीरिक वैभव पर कटाक्ष भी छपते थे। दिलचस्प यह था कि समूचे वर्णन के बाद अंतिम पंक्ति में सम्पादक अपना पिंगल मार देते थे। ऐसे ही दो उदाहरण 1826 के भादो और अश्विन अंक से प्रस्तुत हैं, जिन्हें श्री ब्रजेन्द्रनाथ बनर्जी ने ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित किया था। ये दो कहानियाँ जिन दो व्यक्तियों के बारे में हैं, उनमें मोटे आदमी की मृत्यु 1809 और राजा की 1826 में हुई थी- जिस वर्ष उदन्त मार्तण्ड शुरू हुआ था।
कोउ नृप होय हमै ही हानी… अमीनुल हक की यही कहानी!
दो सौ साल की उम्र वाले असम और पचहत्तर साल से ज्यादा उम्र वाले इस भारतीय गणतंत्र में नागरिकता का संकट हास्यास्पद स्तर तक राजाज्ञा और विशेषाधिकार का मामला बन चुका है
नागरिकता की बहस में ग़ाज़ीपुर के एक गुमनाम बाग़ी की याद
वे खुद को इस देश का ‘प्रथम नागरिक’ कहते थे। उनका दावा था कि आधुनिक भारत में नागरिकता की कानूनी स्थिति एक ‘फर्जीवाड़ा’ है। आज यही बात दबी जबान वे तमाम बड़े-बड़े लोग कह रहे हैं जिन्हें पढ़ा-लिखा माना जाता है।
छावनी की जिंदगी, जिंदगी की छावनी…
हर बार कहीं कुछ संवेदनशील होता है तो वहां अचानक ‘छावनी’ क्यों बन जाती है? और ये अखबार वाले सकारात्मक लहजे में इसकी मुनादी क्यों करते हैं? आखिर इसका मतलब क्या है? छावनियों से बाहर रहने वाले इस देश के सवा अरब से ज्यादा लोगों को नहीं पता कि छावनी की जिंदगी कैसी होती है, जब तक कि उनके अपने शहर में किसी दिन कोई जगह छावनी नहीं बना दी जाती।
