हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्वभाव है।
दो सौ साल पहले विलायती कपड़े से शुरू हुई एक कहानी
अभी तो जी20 का जोर-जबर ही ठंडा नहीं पड़ा है, फिर ये नया नाम ब्रिक्स किसी की जबान पर कैसे चढ़ सकता है इतनी जल्दी! ये बात इससे समझ पड़ती है कि उस दिन शास्त्री भवन के पास पेड़ के नीचे बाल काटने वाले फुरकान ने बड़ी मासूमियत से पूछा था- भइया, ये जी ट्वेंटी फिर से होने जा रहा है क्या?
बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया
बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।
चढ़ती बारिश है, सांप काट ले तो क्या करें? एक प्राचीन नुस्खा
‘उदन्त मार्तण्ड’ के 7 नवम्बर 1826 के अंक में सांप के विष की औषधि प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक था- ‘सर्प दंशन विष उतारने की ओषधि’। इसे नीचे अविकल प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित करने वाले ब्रजेन्द्रनाथ बनर्जी ने साथ में अपनी टिप्पणी लिखी है कि ‘’मालूम नहीं यह औषधि कहां तक उपयोगी है’’!
‘वंदे भारत’ के अजनबी
दिल्ली के पंजाबी बनियों, हापुड़ के एक चौधरी साहब और कुछ मद्रासी श्रद्धालुओं की यह कहानी बताती है कि खाये पीये अघाये सभ्य समाज के भीतर भी कैसे कुछ लोगों को बेगाना और अजनबी बना कर खारिज कर दिया जाता है। बात बनारस की ही है, जहां अशोक ने अपने उत्पीड़न की अर्जी दी थी और जहां से श्रद्धालुओं की एक पार्टी दिल्ली की ट्रेन में चढ़ी।
बनारस से अशोक बनवासी की चिट्ठी
इस कहानी की तस्वीर में दिख रही दुखियारों की भीड़ में अशोक बनवासी कोई भी हो सकता है। आप गौर से देखें तो उसे पहचान भी सकते हैं। उसकी दी हुई चिट्ठी को नीचे जस का तस छापा जा रहा है। यह कहानी अकेले अशोक की नहीं, उन सैकड़ों लोगों की हो सकती है जिन्हें केवल उनकी पैदाइश के चलते अपराधी मान लिया जाता है।
मटियाबुर्ज: होने और न होने के बीच
कलकत्ते में वाजिद अली शाह की खुशबू लेनी हो तो मटियाबुर्ज जाना चाहिए, जहां नवाब ने अपने आखिरी साल बिताए और शहर के भीतर एक छोटा सा अदद लखनऊ बसा डाला। आज भी यहां आप किसी से दो बात कर लें तो भूल जाएंगे कि बंगाल में हैं।
