शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जून को दोबारा जो भीड़ जमा हुई, अबकी टिक गई। खुद को कॉकरोच कहने वाले नौजवान रात भर बैठे रहे, अब भी बैठे हैं। उधर देश भर में 21 जून को नीट की दोबारा परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी भी जागते रहे। अखबारों ने जो खबरें चलाईं, उनमें दोनों घटनाओं के शीर्षक में एक ही शब्द का प्रयोग हुआ- ‘छावनी’! उदाहरण देखिए- ‘छावनी बने राजस्थान के 27 शहर’, ‘छावनी बना जबलपुर’, ‘जंतर-मंतर बना छावनी’।
हर बार कहीं कुछ संवेदनशील होता है तो वहां अचानक ‘छावनी’ क्यों बन जाती है? और ये अखबार वाले सकारात्मक लहजे में इसकी मुनादी क्यों करते हैं? आखिर इसका मतलब क्या है? छावनियों से बाहर रहने वाले इस देश के सवा अरब से ज्यादा लोगों को नहीं पता कि छावनी की जिंदगी कैसी होती है, जब तक कि उनके अपने शहर में किसी दिन कोई जगह छावनी नहीं बना दी जाती। जैसे आज!
कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनके पुश्तैनी घर कभी जहां थे वहां छावनी बन गई। अब वे लौटकर घर गए हैं तो हलकान हैं। मसलन, कानपुर के पाल साहब जिंदगी भर गुजरात रहे। अर्धसैन्यबल में नौकरी किए। बेटा-बेटी की शादी कर दिए। पिता भी बीते बरस गुजर गए। तब उन्हें अपने पुश्तैनी घर की याद आई और वे कानपुर लौटे। सोचा घर ठीक करवा दें, बनवा दें। सब करवा दिया। बस सामने वाली सड़क सारा मिजाज बिगाड़े रही क्योंकि वह सड़क क्या, कायदे से खड़ंजा भी नहीं है। कहानी यहां से शुरू होती है।
वे चाहते हैं कि बस सड़क बन जाए। सड़क बनवाए कौन? देश में कुल 61 अधिसूचित छावनियां हैं। इनका प्रशासन रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले छावनी बोर्ड करते हैं। इन बोर्डों में विधिवत चुनाव होते हैं जिनमें नागरिकों और फौज के लोगों की बराबर नुमाइंदगी होती है। आधे चुने गए होते हैं, आधे पदेन। चुने गए प्रतिनिधियों का कार्यकाल पांच साल होता है। तो जाहिर है कोई काम पड़ेगा तो आदमी उसी के पास जाएगा। कनपुरिया साहब को भी जाना चाहिए था, लेकिन मामला यही फंसा हुआ है क्योंकि देश की छावनियों में छह साल से चुनाव ही नहीं हुआ है।
कौन-कौन जानता है ये बात? शायद केवल वही नागरिक, जो छावनी में रहते हैं। आखिरी चुनाव 2015 में हुआ था। यानी 2020 में पिछले प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म हो गया। अब सारी जिंदगी सेना के भरोसे। और सेना किसकी सुने भला? तो साहब जब-जब पीआरओ के पास गए, उन्हें आश्वासन देकर ठरका दिया गया। फिर एक दिन उन्होंने सैन्य स्टेशन के सीईओ से टाइम मांगा। उसने टाइम दिया। वे सुबह उसके दफ्तर पहुंच गए। दिन भर बैठे रहे, सीईओ नहीं आया। फोन, मैसेज, सब आजमाए।
आखिरकार अपने बच्चे को गोद में लिए सीईओ नमूदार हुआ। उसने कहा कि आज बहुत थकान हो गई है, कल आना। साहब का सब्र हलक से निकलने को था, पर उन्होंने जबान संभाल ली। कुछ अटपट निकल जाता तो लेने के देने पड़ जाते। उन्होंने सम्मान से प्रतिवाद जताया। उसने फिर कहा- कल आना। वो कल कभी नहीं आया क्योंकि सीईओ के ऊपर कलेक्टर या किसी और मंत्री या मुख्यमंत्री तक का कोई दबाव नहीं होता है।

इंदौर के पास महू छावनी है। संविधान लिखने वाले लोगों में सबसे प्रमुख माने जाने वाले बाबासाहब अंबेडकर यहीं पैदा हुए थे। यहीं आज संविधान पानी मांग रहा है। वार्ड नंबर आठ में रहने वाले शर्माजी नाली की गंदगी से परेशान हैं। वे कई बार छावनी परिषद के लोगों से कह चुके हैं लेकिन कोई असर नहीं हुआ। इसी छावनी में रहने वाले एक अन्य सज्जन कहते हैं कि उनका घर उनके बढ़ते परिवार के हिसाब से छोटा पड़ रहा है। बच्चों को अपनी जगह की जरूरत होती है, लेकिन वे एक और मंजिल नहीं बना पा रहे क्योंकि छावनी परिषद का कानून उसकी इजाज़त नहीं देता।
छावनी परिषदों के मामले में पिछले करीब पच्चीस साल से कानूनी लड़ाइयां लड़ने वाले झांसी छावनी परिषद के वकील अनिल बख्शी के अनुसार छावनी अधिनियम की धारा 13 की उपधारा 4 के तहत एक साल से ज्यादा बोर्ड भंग नहीं किया जा सकता। इसके खिलाफ देश भर की छावनी परिषदों के लोग कोर्ट जा चुके हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पिछले साल दिसंबर में इससेसंबंधित एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को झाड़ लगाई थी। अदालत ने सरकार की इस बात के लिए आलोचना की कि उसने 2020 के बाद से छावनियों के चुनाव क्यों नहीं करवाए। सरकार कहती है कि अब वह छावनियों को सामान्य नागरिक प्रशासन में लाने की तैयारी कर रही है इसलिए उसे लागू करने में वक्त लग रहा है। दिलचस्प है कि इस देरी के चक्कर में हर दिन बाकी देश छावनी बनता जा रहा है, जहां चुनाव के होने और न होने का फर्क मिटता जा रहा है।
महू छावनी के लोग अब ज्यादा शिकायत नहीं करते। वे डरते हैं कि छावनी परिषद के अधिकारी या कर्मचारी कोई भी गलती पकड़ कर उनके ऊपर कार्रवाई कर सकते हैं। ऐसे में लोग अब अपनी दुश्वारियों पर आगे आकर बात भी नहीं करना चाहते। उधर कानपुर के साहब को थोड़ी राहत मिल गई है- इसलिए नहीं कि वे अर्धसैन्यबल से अवकाश प्राप्त हैं! ये तो उनके लिए और खतरे की बात है। उन्होंने यह बात सीईओ और दूसरे फौजी अफसरों से जानबूझ के छुपा रखी है कि कहीं विभागीय ओहदे की नपाई न होने लगे और रही-सही नागरिक वाली इज्जत भी चली जाए।
असल में उन्हें पता चला है कि उत्तर प्रदेश की विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना का मकान भी उसी छावनी में है और उनके घर के आगे एक शाश्वत कूड़े का पहाड़ लगा हुआ है। हट ही नहीं रहा। वे आते हैं और चले जाते हैं पर घूरा वहीं पड़ा रहता है। अब, जब स्पीकर का ही कूड़ा नहीं हट पा रहा तो मतदाता की सड़क की कौन पूछे!
