1826 के झरोखे से

‘उजियाली के घमंड’ में चूर ‘बहुत मोटे ओ बड़े’ लोगों के किस्से

उदन्‍त मार्तण्‍ड में सम्‍पन्‍न लोगों की धन सम्‍पदा से लेकर उनके शारीरिक वैभव पर कटाक्ष भी छपते थे। दिलचस्‍प यह था कि समूचे वर्णन के बाद अंतिम पंक्ति में सम्‍पादक अपना पिंगल मार देते थे। ऐसे ही दो उदाहरण 1826 के भादो और अश्विन अंक से प्रस्‍तुत हैं, जिन्‍हें श्री ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी ने ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित किया था। ये दो कहानियाँ जिन दो व्यक्तियों के बारे में हैं, उनमें मोटे आदमी की मृत्यु 1809 और राजा की 1826 में हुई थी- जिस वर्ष उदन्त मार्तण्ड शुरू हुआ था।

भादों सुदी 11 के ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ में एक समाचार छपा था ‘बहुत मोटे ओ बड़े आदमी’:

‘’विलायत में एक बड़े आदमी साहिब कि जिनका शरीर तौल में दो सौ साढ़े सतरह सेर वा पांच मन साढ़े सतरह सेर लोगों के देखने में आया। विलायत में लोग कहते हैं कि ऐसा बड़ा आदमी कभी देखने सुने में नहीं आया पर यहां इसके आगे भी बड़े आदमी थे।।

अंगरेजी 1809 साल की 28 जूनको डेनियल लाम्‍बोर्ट नामके साहिब जिसकी अवस्‍था चालीस बरस की थी ओ उनने उसी अवस्था में चोला छोड़ा उनकी मोटाई कहां तक कहिए कि वे जिस कोठरी में मरे उस कोठरी से उनको निकालते एक दरवाजा ओ एक खिड़की जो वहां थी उसको तोड़ के दूसरे दरवाजे में मिलानी पड़ी थी। उनका शरीर तीन सौ उनहत्तर सेर वा नौ मन नौ सेर तौल में था यहां बंगालियों में कोई भागवान ऐसा मोटा न देखनेमें आया हिंदुस्‍तानियों में एक बाबू नंदराम बैजनाथ की कोठी में मुनीम बाबू रामप्रसाद ओ कुछ थोड़े बहुत बाबू नंदूसाह जी भी मोटे हैं पर तौल की बिध बिना तौले नहीं मिलती पर अकिलके इससे भी मोटे बहुत देखने में आते हैं।‘’

आश्विन सुदी 3 के अंकमें ‘राज्‍यसंपदा’ शीर्षकके अन्‍तर्गत पुर्तगालके राजाकी धन-सम्‍पत्ति का वर्णन है, वह भी सुन लीजिए:


1600 कैरट के हीरे का मालिक पुर्तगाली राजा जॉन VI, जिसने नेपोलियन को चकमा दिया था

‘’पुरानोंमें लिखा है कि वेणु राजाके बड़ा धन था पर धर्मका लेश नहीं। वैसा तो काहे को पर देश काल पात्र। पुर्त्तगेज बादशाह ऐश्‍वर्य जो अंग्रेजी कागजों में लिखता है वह भी गिनने गूथने से बाहर ही है काहे से कि जब से उस राज की बढ़ती हुई तबसे दिन दूनी ओर रात चौगुनी ही होती गई और उसका पसेव भी नहीं उठा। जैसा लोग कहते हैं कि मैं मरि जैहों पर तोहि न भंजै हों। और की कौन चाले बादशाह आप अपने रोकड़ की विधि न मिला सके इस लिए कुछ उस राज की प्रभुता का वर्णन करने में आता है। बादशाह अपने गेह के एक भुंइघरे में जहां बयार भी न पैठ सके रोकड़ की पेटियां सदा सुची रहती हैं विशेष करके बड़े बादशाह जो कुछ दिन हुए संसार से उठ गये ओ कुछ भी छाती पर धर के ले न गए वे संचय करनेमें एक ही प्रबीन ओ सब पेटियों की ताली अपने हाथ रखते ओ जवाहिर की पेटियों को पल भर भी आँखों के ओट न करते थे यहां तक की यक्ष के से टुक वहाँ से न सरकते ओ उस विभव को देख कलेजे को ठंडा किया करते इस सम्‍पद होनेका मूल यह है कि सोना चांदी हीरे की खान उन के अधिकार में है और उस राज में कभी खटका नहीं हुआ। एक बेर जेनरेल बोनापार्टने मारे लोभ के उस सब अधिकार पर अपना अधिकार कर लिया पर बड़े बादशाह ने जेनरेल के आवते आवते अमिरेका के मुलुक के जो ब्रेजिल में जो वहाँ का बादशाह इसका बेटा है झटपट सब रोकड़ ओ जवाहिर जहाजों पर लाद लाद ले जा टल बैठा। जब इधर से बोनापार्ट के पैर टले तबसे अपने जहाँ का तहाँ आन बैठा। इस राज की जो आमदनी थी इसमें एक चित्ती न उठती थी इस आमदनी के सिवा दश हजार रुपया रसोईका खरच प्रजासे नित्‍य उगाहा जाता था। सोई भर उठा करता यहां तक कि खरच होने के डर से लड़के को साथ बिठाल कर नहीं खिलाते। पर घोड़े की सवारी का इसको शौक था उसमें अपने जो कुछ उठाता हो सो सही काहे से कि यह बादशाह विलायत भर में एक ही घोड़ाचढ़ा था। अब इस बादशाह की मां ने एक परब हीरे का दिया था उसका विशेष लिखा चाहिए कि जिससे उस राज्‍य की विभव लोग जानें कि वह परब हीरे का तोल में विलायती 1600 बिखा अथवा यहाँ का आध सेर का डले का ढला है ऐसा परब आजकल के जौहरियों ने कहीं देखने की कौन बात है सपने में भी न सुना होगा और न किसी बादशाह के यहां है। और बड़े हीरे के परब जिस बादशाह के वहां है व‍ह लिखते हैं। रूसके बादशाह के यहां एक 106 बिखेका एक हीरा है। फरासीसों के यहां 136 बिखेका एक परब है। तसकनी में 149 बिखे का एक टुकड़ा है। ईरान की बादशाहत में जो एक परब हीरे का 493 बिखे का है उसका मोल पुर्त्तकेसी रतनपारखे दो पद्म आंकते हैं ओर अंगरेजी ओ फरासीसी जौहरी पचास करोड़ लगावते हैं। बड़े बादशाह की कुरती में एक बोताम हीरे का चार करोड़ रुपये का लगा था और एक हीरे की परब गिरजे को भेट की। वह जब गिरजा करने के समय निकाल के रखा जाता है तब उसकी छटा से घर का घर उजियाला हो जाता है। अब इतना ही मन को खेद होता है कि लोग यहां की उजियाली का घमंड रखते हैं परलोक की अंधियाली गेल पर एक दीया चिकनई का भी नहीं बालते।।‘’      


(आवरण चित्र पहली कहानी में वर्णित विलायत के डेनियल लैम्बर्ट का है)