दुनिया 200 साल बाद

होरमुज़ पर टिकी किसानों की उम्मीद कहीं टूट न जाए!

ऐसा कम ही देखा गया है कि जंग दुनिया के किसी एक हिस्‍से में छिड़ी हो और किसी दूसरे कोने में लोगों की जबान पर वहां की एक नहर का नाम बैठ गया हो। होरमुज़ के साथ बीते एक साल में यह घटा है, जो किसी के लिए स्‍ट्रेट है, किसी के लिए जलडमरूमध्‍य, किसी के लिए जलसंधि तो किसी के लिए तेल और खाद की उम्‍मीद…!

होरमुज़ तो खुल गया है भाई साहब? उम्‍मीद तो है?” लगातार तीन दिन से हो रही बारिश के बीच देर रात ग्‍यारह बजे इंदौर शहर से 45 किलोमीटर दूर अपने गांव लौट रहे पटेलजी ने बेसाख्‍ता यह सवाल पूछा था। पड़ोस के गांव के सरपंच शर्माजी के साथ वे सुबह से ही खाद-पानी के चक्‍कर में निकले हुए थे। पटेलजी नेता आदमी हैं। बड़े किसान हैं, लेकिन परेशान हैं कि अगर पिछले सीजन की बचाई हुई खाद निपट गई तो काम कैसे चलेगा।

याद हो कि पिछले साल नवंबर-दिसंबर के दौरान खाद के लिए सरकारी बिक्री केंद्र के बाहर दो दिन लाइन में लगने के बाद मध्‍य प्रदेश के टीकमगढ़ और गुना में दो किसानों की जान चली गई थी। उससे दो-तीन महीने पहले ही खाद के लिए लूटमार और दंगे जैसी हालत बन गई थी। अब सरकार ने इससे निपटने की जो व्‍यवस्‍था की है वह और बुरे दिन लेकर आ रही है, ऐसा पटेल की बातों से जान पड़ा।

दिक्‍कत ये है कि वे गहराते संकट को मानने को तैयार नहीं हैं, ‘’पर जहाज तो निकले हैं न उधर से?” अब जहाज की कौन जवाबदारी ले, पर इतना तय है कि पटेलजी को एक बीघा पर गिन के एक बोरी खाद ही मिल पा रही है। सभी किसानों का यही हाल है। कोटा तय है। एक बीघा फसल में डेढ़ सौ किलो खाद लगती है, लेकिन सरकार पैंतालीस किलो की एक बोरी दे रही है। बाकी 105 किलो? ‘’कालाबाजारी तो चल ही रही है, बाकी हम बड़े किसान हैं तो पिछले साल का पुराना खाद रखा ही है…’’, पटेल जी धीरे से कहते हैं। वे बताते हैं कि बरसात में तो खाद की जरूरत नहीं है लेकिन अभी से लेने लगेंगे तो समय पर अपनी पूर्ति हो जाएगी। यही उनकी निश्चिंतता का सबब है।

बाकी कहानी ये है कि मध्‍य प्रदेश में सरकार ने किसानों की आइडी बना दी है। जब किसान खाद लेने शासकीय विक्रय केंद्र पर जाएगा तो उसकी जमीन देखकर उसे खाद दी जाएगी। हर बीघे पर पैंतालीस किलो की एक बोरी। पांच किलो की कटौती पिछले साल ही हुई है। वह बताते हैं, ‘’एसा अभी सुनने में आ रिया हे कि अभी आपको ई-टोकन से खाद मिलेगा गोरमेंट के हिसाब से, इसके बाद आपको एक मेसेज डालना पड़ेगा कि मेरे को ओर आवश्‍यकता है। आपको ओर दे दिया जाएगा। फिर आपके पटवारी ने आपकी फसल कोन सी चढ़ाई… अगर आपने केला चढ़वा दिया है तो केले के किसान को ज्‍यादा खाद मिलेगी… फसल के हिसाब से।‘’



पटेलजी मानते हैं कि सरकार के पास खाद उपलब्‍ध नहीं है। इसलिए अघोषित कोटा लगा दिया गया है। इसका असर किस पर पड़ रहा है? छूटते ही उनका जवाब आता है- बड़ा किसान! लेकिन कहानी वे छोटे किसानों की सुनाते हैं, ‘’छोटा किसान पर असर ये पड़ रिया हे कि पेहले उसे दो किलोमीटर पांच किलोमीटर खाद लेने जाना पड़ता था गांव में ही। मोटरसाइकिल पर बोरी रख के लाता था। अब उसे पचीस किलोमीटर महू आना पड़ता है। वो एक बोरी के लिए पचीस किलोमीटर आएगा ओर यहां से अपनी बाइक पर एक बोरी ले जाएगा। उसको अगर पांच बोरी चाहिए तो पांच बाइक लेकर आएगा।‘’

पांच बोरी मने पांच आदमी पांच बाइक पर? ‘’ओर क्‍या? उसको तो ले जाना है खाद, केसे ले जाएगा? बसें चल नहीं रहीं, मेजिक पेले चलती थी बंद हो गई। ले जाना तो उसको बाइक से ही हे, अपने पास क्‍या है साधन संसाधन हैं तो गाड़ी से ले जाते हैं। छोटा किसान तो बाइक से ही ले जाएगा न!” वे बताते हैं कि छोटे किसान की दिक्‍कत ये है कि उसको पांच बोरी के लिए पांच बाइक लेकर पचीस किलोमीटर आना पड़ेगा लेकिन बड़े किसान तो अपनी जरूरत की पूर्ति ही नहीं कर पाएंगे। जिसके पास पैसा होगा वो मार्केट से कोटा जमा कर लेगा। बड़ा किसान अगर खाद बचाएगा नहीं तो बरबाद हो जाएगा।         

क्‍या रासायनिक खाद का कोई विकल्‍प हो सकता है? जैसे जैविक खेती? वे कहते हैं, ‘’खाद तो चाहिए न! बिना पेस्टिसाइड के खेती कैसे होगी? इल्‍ली खा जाएगी। मैंने देखा है जिन किसानों ने जैविक खेती की है उन्‍होंने दस साल बाद जमीन बेच दी।‘’ क्‍या उगाया था उन्‍होंने? मक्‍का, ज्‍वार, बाजरा? ‘’मक्‍का बोते हैं। मक्‍का का रकबा बढ़ा है। मक्‍के की रोटी तो खाते ही हैं सब।‘’

और ज्‍वार-बाजरा? पटेलजी बताते हैं कि पांच दस किलो ज्‍वार तो खरीद ही लेते हैं, लेकिन बाजरा खाना दो तीन साल से बंद है। नए बच्‍चों को पसंद नहीं आता क्‍योंकि उसका रंग हलका काला होता है। आपने कब खायी था बाजरा पिछली बार? काफी सोचकर बोले, ‘’बाजरा… शायद शादी ब्‍याह में पिछले साल ही खायी रही होगी। घर पर कब खायी थी याद नहीं, शायद दो तीन साल हो गए।‘’

इस बात पर सब हंस देते हैं। वे खुद भी। कोई घंटे भर खाद, पानी, खेती पर बात चलती है। सरपंच शर्माजी लंबी चुप्‍पी के बाद एक कामयाब वाक्‍य बोलते हैं- ‘’संकट तो सब समझते हैं जी। बीजेपी वाले भी समझ रहे हैं कि केवल किसान बचा हुआ है, लेकिन अभी कोई बोलेगा नहीं साब। सब कुम्‍भकर्ण की नींद में सोया है। हम सब सोये हैं। क्‍योंकि अभी उम्‍मीद है। जिस दिन हम शहर से वापस खाली हाथ आएंगे उस दिन हमारी उम्‍मीद खत्‍म हो जाएगी।‘’