आज 14 जून हो गया। छह जून को जंतर-मंतर पर इस देश के शिक्षा मंत्री की ‘तेरहवीं’ की जो मीयाद कॉकरोचों ने रखी थी वह बीत गई। इस्तीफा नहीं हुआ। अल्टीमेटम की मीयाद अब बदल चुकी है। अब वे फिर आएंगे। 20 जून को। आखिर रोशनी खोजने वापस वहीं लौट-लौट कर कौन आता है? जिसको सर्टिफिकेट चाहिए…! इस बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं उस्ताद फ़रीद अयाज़…
मक्खी और परवाने का किस्सा है। मक्खियों ने दावा किया किंग ऑफ परवाना से, कि भई हमारे भी पर हैं, हम भी उड़ना जानते हैं, हम भी तुम्हीं जैसे हैं, तो आप हमको परवाना मान लो। तो शाह परवाना ने कहा कि भई जाओ और रोशनी की तलाश करो! जाओ, और रोशनी की तलाश करो। परवाने का काम सिर्फ रोशनी की तलाश करना है।
तो वो मक्खियां उड़ीं। मक्खियों को दस पन्द्रह मिनट में गांव देहातों में इधर-उधर गईं और जाकर फौरन फर्र से वापस आईं। कहीं कि जी फलाने गांव में रोशनी हो रही है, फलाने में दीया जल रहा है, फलाने में आग जल रही है, वहां पर चिता जल रही है। भर भर भर भर आ के बैठ गईं। अब मक्खियों ने बादशाह से कहा कि जी वो आप फैसला कीजिए। कह रहे कि फैसला क्या करें? कहने लगीं कि जब वो आएंगे तो, जब आपके परवाने आएंगे तो पता चलेगा कि वो कामयाब रहे कि हम कामयाब।
तो परवानों का बादशाह कहता है कि बेटा फैसला तो हो चुका। मक्खियों ने पूछा, जी क्या फैसला हो चुका? बादशाह ने कहा, उल्लू के पट्ठों, जिसको रोशनी मिल गई है उसको वापस आने की क्या जरूरत है। जो रोशनी जिसने पा ली वो तो कुरबान हो गया, वो तो एक हो गया, लेकिन जिनको सर्टिफिकेट चाहिए था… जिनको सर्टिफिकेट चाहिए था…!
तो… इस वक्त हम सर्टिफिकेट का काम कर रहे हैं!
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