1826 के झरोखे से

जब लाट साहब गंगाजी से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले…

सन् 1826 में गवर्नर जनरल लार्ड एमहर्स्‍टने उत्तर भारतकी एक लम्‍बी यात्रा की थी। उस समय रेल तो थी नहीं, अच्‍छी सड़कें भी न थीं। आमद-रफ्तका एक सर्व प्रधान मार्ग था पतित पावनी गंगाकी धारा। अधिकांश यात्री तथा व्‍यापारी गंगाजीसे ही नावों द्वारा आते-जाते और माल भेजते थे। लार्ड एमहर्स्‍टने भी इसी जल मार्ग द्वारा यात्राकी थी।

वे सोमवार तारीख 31 जुलाई सन् 1826 को प्रात: काल कलकत्ते से रवाना हुए। साथमें लेडी एमहर्स्‍ट, उनकी पुत्री, मुसाहब और संगी-साथी थे। लार्ड एमहर्स्‍टके साथ तीन सौ नावें गई थीं। इस यात्रा में उन्‍हें एक वर्ष सवा दो महीने लगे थे। वे 10 अक्‍टूबर सन् 1827 को लौटकर कलकत्ते पहुंचे थे। ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ में उनकी यात्रा, दरबार और लोगों से मिलने-जुलने की खबरें बराबर छपा करती थीं। अवधके बादशाहसे उनकी भेंट किस ठाट-बाटसे हुई, उसका वर्णन सुनने योग्‍य है।



28 नवम्‍बर सन् 1826 के ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ में लखनऊमें लाट साहबकी खातिरदारीकी तैयारियों का वर्णन है:

‘’लखनौमें गवरनर बहादुर की स्‍वागत के लिए कानपुर तक अवध‍ बिहारी बादशाह आप ही यात्रा करेंगे इसके पहिले से प्रति दिन सोने चांदी की पादार्थों और पालकी और हौदे झालरदार और सुनहरे चित्रकार और पशमीने की बिदरीकी बिदरियां और उत्तम उत्तम कपड़ों की गठरियां लोग दिखला भला रहे हैं और बादशाही शागिर्द पेशों की उरदियों को सजनेके लिए काम काजियों को हुकुम हुआ और हाफिज़ अली खांको चार पारचे की खिलअत हुई औ चांदी और लकड़ी के अमारी और हौदे और गद्दी के हाथी और झालरदार पालकी और अच्‍छे घोड़ों समेत और हाजरी के असबाबके साथ मीर अली दारोगे स्‍वाधीन जो उस दारोगे ने भी जड़ावर पाया और वह हाजरी बनानेवालों का दारोगा है ए सब नवाब गवरनर बहादुर के वहां भेजे गए और मौलवी खलीलुद्दीन खां सुलतानी वकील लार्ड साहिब की सैन्‍य से बादशाह के समीप नवाय मातमुद्दौला के उपलक्षसे पहुंच चौदह पारचे की खिलअत पाई और कुछ ही दिन में लार्ड साहब की लशकर को जाने का हुकुम पाया और 20 रबीं अलौवल को खबर लगी कि कानपुर को डेरा भेजा गया हुकुम हुआ कि कानपुर के नीचेकी गंगाके इस पार बादशाही डेरा पड़े और बादशाही डेरे के एक मनजिल उधर और डेरे पड़ें और रिसालैदारों को परवानगी हुई कि अपने अपने सवारों को साथ लिए एकट्ठे करो।‘’

12 दिसम्‍बर के ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ में भेंटका हाल इस प्रकार दिया है:

‘’19 नवम्‍बरको अवध बिहारी बादशाह के आवने की तोपें छूटीं उस दिन तीसरे पहर को ष्‍टर्लिंग साहिब ओ हेल साहिब ओ मेजर फिक्‍डल साहिब ओ रेविनशा साहिब लार्ड साहिब की ओरसे अवध बिहारी की छावनी में जाकर के बड़े साहिबका सलाम कहा और मोर होके लार्ड साहिब के साथ हाजिरी करने का नेवता किया।

‘’फिर अवध बिहारी बादशाह के जाने के लिए कानपुर के तले गंगा में नावों की पुल बंदी हुई और बादशाह बड़े ठाट से गंगा पार हो गवरनर जेनरल बहादुर के सन्निध गए। लार्ड एमहर्स्‍ट जब कानपुर पहुंचे थे उस समय जैसे सिपाहों का दोहरा परा बंधा था वैसे ही बादशाह के कानपुर जाने में भी परा बंधा था। बादशाह जब पुरमें पैठे तब लार्ड एमहर्स्‍ट अपने आमात्‍यों को ले करके हाथी की सवारी पर ग्राण्‍ट साहिब की कोठीसे थोड़ी दूर आगे बढ़ रहे थे ओ साथ के तुर्क सवार चारों ओर से परा बांधे हुए खड़े थे। इस उपरांत बादशाह एक तख्‍त खांकी सवारी पर उतर ऊपर ही से ऊपर बड़े साहिब के हाथी पर हो बैठे ओर बड़े साहिब से मिला भेंटी हुई फिर वार्तालाप होते ग्राण्‍ट साहिबकी कोठीको गए लखनौ के बादशाहके साथ नवाब मोहसन दौला और उनके सोलह आदमी मुसाहिब साथ थे। लार्ड साहिब ने उस दिन वहां के सब काम वाले आपलटनिए साहिबों को हाजरी का नेवता दिया और 81 आदमियों ने एक मेजमें बैठके भोजन किया। भोजन हुए उपरांत बादशाह को बढ़िया कपड़े ओ दोशाले और भांत भांतके आभरण और रत्‍न करके खचित ओ जटित एक्‍यावन थार आगे धरा ओ उनके पोते के बस थार और सब भाइयों को बीस बीस थार के लेखे दिया गया। फिर लार्ड साहिब उठ आके बादशाह की उंगली में बड़े मोल की एक अंगुठी पहिना दी और सब मुसाहिबों को भी यथा योग पारितोषिक दिया। फिर अतर ओ पान के सम्‍मान हुए पर बादशाह अपनी छावनीको लौट आए।

‘’उसके सवेरे होके बादशाह के मुसाहिब लोग भी लार्ड साहिब की कोठीमें जा करके बादशाह का सलाम कह बादशाह को छावनी में हाजरी करने का नेवता दिया। तिसपर बड़े साहिब आप घोड़े पर सवार हो और बड़े साहिब के समीपी सब साहिबान अपने अपने हुद्दों के आभूषणों करके भूषित हो हो पचास हाथियों पर चढ़चढ़ दल बांधे हुए चले और 81 पलटन के सब सवार वा एक हजार सवार और बड़े साहिबके तैनाती सवार अपने अपने मेलकी मिसिल बांध के बड़े ठाट से ठट् ठट् के चले। जब लार्ड साहिब गंगा पार गए उस समय बादशाहने गवरनर बहादुरको अपने हाथीके हौदेपर चढ़ा लिया इस समय की शोभा एक तो बादशाही हाथी के सोनहरे हौदे की झलक और सब साहिबों के आभूषणों की दमक ओ हजार सवारों की कुर्तियां ओ हथियारों की चमक और सभों की एक मंद गति और दोनों ओर तोपों की ध्‍वनि इस कौतुक को देख कर के किस को टकटकी न लगी ओ अपनी गति न भूली ओर चिंतामणि की सुध न आई होगी। पहिले लार्ड साहिब को सुलतानी बानात के डेरे में ले गए वहां तीन मुख्‍यासन बिछे थे उस तीनों में से बिचले आसन में गवरनर जेनरेल बैठे ओ दाहिने बादशाह ओ बाएं वामांगी लेड़ी एमहर्स्‍ट साहिबा बैठीं। थोड़ी सी देर में उस डेरे के एक ओरका पर्दा उठाया गया ओ देखने में आया कि दूसरे एक विचित्र डेरे में एक मेज सौ साहिबों की पंगत बैठने योग लगी है। इस पीछे सभी जुड़ मिल के रिल पिल के भोजन करके लार्ड साहिब गमनोन्‍मुख हुए उस समय एक्‍यावन थार बड़े मोलों की पदार्थ उनको और उनके मुसाहिबों को भी यथा योग सौगात दी।‘’


(उदन्त मार्तण्ड के उद्धृत अंशों के अतिरिक्त शेष भाषा श्री ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी की हैइस यात्रा के दौरान लखनऊ दरबार का विवरण अगले अंक में क्रमश:)