दुनिया 200 साल बाद

वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…

इस साल सितंबर का महीना ऐसे ऐसे नायाब तोहफे लेकर आया कि सदियों पुरानी कब्रों में पड़े इतिहास के किरदार अपने जिक्र के लिए मचल उठे हैं। ब्रिक्‍स के नाम से विदेशी सत्ताधीशों की दिल्‍ली में हुई कारोबारी दावत अभी खत्‍म ही हुई थी कि भारत में हिंदी साहित्य के सर्वमान्‍य मंच-फंड प्रबंधक एक वयोवृद्ध कवि ने हथियारों के एक शिवसैनिक सौदागर की संस्‍था से 21 लाख रुपये का ‘सम्‍मान’ ले लिया। अब यहां वहां जहां तहां धवलकेशी कविवर की लानत मलामत में कसीदे पढ़े जा रहे हैं।

इस समाज में अस्‍सी पार कर चुका कोई मनुष्‍य बेवजह ही सम्‍माननीय हो जाता है, इसलिए उसके किसी भी हिलडुल पर श्रद्धासुमन अर्पित करना कोई खटकने जैसी चीज नहीं होनी चाहिए। आखिर एक बुजुर्ग का सम्‍मान ही तो हुआ है, चाहे कोई करे! हिंदी के गोल में ज्‍यादातर लोग इस बात को समझते हैं। वे समझदार हैं, जो बिना बधाई का अतिरेक रचे या तो सम्‍मान समारोह की केवल फोटो चिपका रहे हैं या सम्‍मानित कवि का उद्बोधन। ये भले लोग हैं- बिलकुल हिंदी की सम्‍मान परंपरा का मूक अवगाहन करने वाली रेवड़।   

कुछ लोग हैरत में भी हैं। नाराज हैं। उत्तेजित हैं। एक कवि, जिसने सत्ता के खिलाफ शुरू हुए पुरस्‍कार वापसी अभियान में दस साल पहले अहम शिरकत की थी, आज उसी सत्तातंत्र के तस्‍कर के आगे क्‍यों और कैसे बिछ गया? यह सवाल पूछा जा रहा है। रुसवाई यहां तक पहुंची हुई है कि पिछले दो-ढाई दशक के दौरान हिंदी के वाजपेय यज्ञ में अपनी समिधा देकर उसके पुण्‍य खा-पचा चुके एकाध ब्राह्मण भी फिरंट हो गए हैं। इन लोगों की समझ पर शक बनता है। इसके दो कारण हैं। एक, इनके असंतोष का अनचाहा प्रभाव और दूसरे, उसके पीछे की ऐतिहासिक नासमझी। पहले प्रभाव की बात।

‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ के संपादक को आयोजन से दो दिन पहले श्रीकांत वर्मा ट्रस्‍ट की आयोजन समिति से एक सदस्‍य का फोन आया। उन्‍होंने बहुत जिच की थी- ’आइए, सहमत न हों तब भी आइए, जो कहना है कहिए, लिखिए। आखिर दो चार बातें होंगी तभी तो इस बारे में सब जानेंगे’। यह जनसंपर्क की पुरानी रीति है- बदनाम हुए तो क्‍या नाम न हुआ! उन्‍होंने दिल्‍ली के कुछ शाश्‍वत असहमतों की सूची गिनवाई जिन्‍हें फोन कर कर के बुलावा भेजा जा रहा था। वे चाहते थे कि सम्‍मान पर चर्चा हो, गालियां पड़ें।

वह हो रहा है। अर्थात्, वर्मा परिवार का उद्देश्‍य सम्‍मान से असहमत लोग ही पूरा किए दे रहे हैं। फिर मोगैम्‍बो क्‍यों न खुश हो! बहरहाल, प्रसंगवश बता दें कि अभिषेक वर्मा जो शिवसेना के सत्ताधारी धड़े के मुख्य राष्‍ट्रीय समन्‍वयक और जेल में सपत्‍नीक कुछ समय काट चुके कुख्‍यात हथियार सौदागर हैं, अपने गृहजिले बिलासपुर में 23 सितंबर को होने वाले ‘घर वापसी कार्यक्रम’ में मुख्‍य अतिथि बनकर जा रहे हैं। वे इतने शालीन और सभ्‍य हैं कि उन्‍होंने इस सूचना को साझा करते हुए यह नहीं लिखा है कि हिंदू धर्म में किसकी घर वापसी करवाई जानी है। हो सकता है इसी भाषाई शालीनता और सम्‍भ्रान्‍तता ने अशोक वाजपेयी को प्रभावित किया हो। कुलीनों की अपवित्र एकताओं का सूत्र वैसे भी एक जटिल रहस्‍य है।        



कवि और सत्तातंत्र के बीच रिश्‍ते पर जो लोग रह-रह के असहज हो जाते हैं वे हिंदी के अश्‍लील इतिहास को भूल जाते हैं। तात्‍कालिक संदर्भ को ही देखें, तो श्रीकांत वर्मा केवल कवि नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सबसे अंधेरे दिनों में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के सांसद भी थे। जिस वक्‍त पूरा अदबी समाज इंदिरा गांधी की निरंकुशता और इमरजेंसी के खिलाफ खड़ा था, श्रीकांत वर्मा कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनकर श्रीमती गांधी के करीबी सहयोगी बन जाते हैं और अपने अंतिम दिनों तक सत्ता के साथ नत्‍थी रहते हैं। इंदिरा गांधी की 1980 में वापसी में वर्मा की भूमिका अहम थी।

कवि-सत्ता के अश्‍लील युग्‍म से निकली साहित्यिक विरासत के नाम पर गढ़ा गाया सम्‍मान अगर उसी सत्ता का लाभार्थी और चाकर रहा नौकरशाह कवि नहीं ले, तो और कौन? इसीलिए अशोक वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा सम्‍मान के सर्वोपयुक्‍त दावेदार और उम्‍मीदवार दिखते हैं। इसमें कहीं कोई विसंगति नहीं है। इस तथ्‍य को सार्वजनिक तौर पर बताते हुए अशोक वाजपेयी को शुभकामना दी जानी चाहिए, यही एक कायदा हो सकता है, लेकिन बड़ी तस्‍वीर इसे समझने में थोड़ा और मददगार हो सकती है।  

थोड़ा पीछे चलते हैं और हिंदी के शुरुआती बीजों को खंगालते हैं। इसी महीने हिंदी दिवस बीता है। उससे पांच दिन पहले हिंदी के पिता या जनक कहे जाने वाले भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र की जन्‍मतिथि थी। हिंदीवाले भारतेन्‍दु का बड़ा सम्‍मान करते हैं कि उन्‍होंने इस समाज को एक नई भाषा दी। उसे स्‍थापित किया। भारतेन्‍दु का अपने समय की सत्ता के साथ कैसा रिश्‍ता था, क्‍या इस पर कभी खुलकर बात हुई है?   

भारतेन्‍दु ने संस्‍कृत की जगह खड़ी बोली को अपनाने का जो आग्रह किया, वह उनकी सामाजिक स्थिति से अनिवार्यत: जुड़ी हुई पहल थी। वे जाति से बनिया थे। उस समय की सामाजिक व्‍यवस्‍था ऐसी थी कि ब्राह्मण पंडित लोग अपने संरक्षण के लिए धनीमानी बनियों पर आश्रित हुआ करते थे। यह आश्रय ऐसा था कि भारतेन्‍दु जैसे रईस संरक्षक की बात ब्राह्मण नहीं टाल सकते थे। इसके कई उदाहरण हैं। जब एडिनबरा के ड्यूक 1870 में भारत आए तो भारतेन्‍दु ने बनारस के पंडितों को उनकी श्रद्धा-सेवा के लिए संगठित किया, कविताएं लिखवाईं और बदले में नजराना दिलवाया। बनारस में भारतेन्‍दु ने अंग्रेजी सत्ता के राजकुमार का ऐसा सेवा सत्‍कार किया कि बदले में उन्‍हें महज बीस साल की उम्र में नगर का कमिश्‍नर और मानद मजिस्‍ट्रेट बना दिया गया।      

कई मौकों पर ब्रिटिश सत्ता के प्रति भारतेन्‍दु ने अपनी वफादारी खुलकर जाहिर की। वास्‍तव में, यह सत्ता के प्रति अपनी वफादारी को साबित करने की होड़ भी थी क्‍योंकि उनके बरअक्‍स शहर में हिंदी के एक और संरक्षक राजा शिवप्रसाद सिंह ‘सितारा-ए-हिंद’ थे जिनकी हिंदी के ऊपर उर्दू का प्रभाव था, लेकिन भारतेन्‍दु हिंदी में उर्दू-मिश्रण के घोर विरोधी रहे। भारतेन्‍दु को लगता था कि अंग्रेजी सत्ता को प्रभावित कर के वे शिवप्रसाद सिंह के मुकाबले अपनी वाली हिंदी को लागू करवा ले जाएंगे।

1870 में एडिनबरा के ड्यूक के सेवा सत्‍कार के बाद अगले ही साल 1871 में लॉर्ड मेयो की हत्‍या हुई, तब भारतेन्‍दु ने सार्वजनिक रूप से इस पर दुख प्रकट किया। फिर 1875 में प्रिंस ऑफ वेल्‍स भारत आए तो उनके सम्‍मान में भारतेन्‍दु ने कविताएं लिखकर उन्‍हें समर्पित कीं। वे हर साल महारानी विक्‍टोरिया का जन्‍मदिन मनाते रहे। 1882 में महारानी की मिस्र में विजय पर भारतेन्‍दु ने एक वीरगाथा काव्‍य लिखा। ये सब कुछ वे अंशत: इसलिए कर रहे थे ताकि उनके भाषाई और साहित्यिक प्रतिद्वंद्वियों पर अंग्रेजी सत्ता गैर-वाजिब ध्‍यान न दे। ऐसा बनारस के दरबार में 1870 में हो चुका था, जिससे चिढ़कर भारतेन्‍दु ने कुछेक आलोचनात्‍मक और व्‍यंग्‍यात्‍मक संपादकीय लिख मारे थे।

कहने का आशय है कि भारतेन्‍दु का साहित्यिक अवदान और तत्‍कालीन सत्ता के प्रति उनका रुझान, दोनों में कोई संगत नहीं दिखती। अंग्रेजों के प्रति उनके रवैये में जो झोलझाल है, उसके पीछे का एक अहम कारण शिवप्रसाद सिंह के साथ प्रतिस्‍पर्धा में निहित था जो खुद अंग्रेजों के भक्‍त थे। होता यह था कि अपने प्रतिद्वंद्वी के रुझान के हिसाब से भारतेन्‍दु अपना रुझान सत्ता के प्रति तय करते थे। उसकी कोई स्‍वतंत्र राजनीतिक समझदारी नहीं थी कि वे कब सत्ता के चारण की तरह व्‍यवहार कर रहे थे और कब उसकी आलोचना में लिख रहे थे। उन्‍हें इसके लाभ मिले, तो नुकसान भी हुआ।



हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्‍यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्‍दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्‍वभाव है।

इस स्‍वभाव के सबसे बड़े प्रतिनिधि चेहरे एक साथ श्रीकांत वर्मा ट्रस्‍ट के मंच पर बस दिख गए हैं। ध्‍यान दीजिए कि पुरुषोत्तम अग्रवाल हों चाहे अरुण कमल, ममता कालिया, या विनोद भारद्वाज, इन सभी की राजनैतिक प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा करने का कोई लेशमात्र अर्थ नहीं बनता। यह तो फिर भी अभिषेक वर्मा का आयोजन था जो आज से तीस साल पहले ही भारत का सबसे युवा अरबपति बन गया था। याद पड़ता है कि राजधानी के एक मामूली से बिल्‍डर के अखबारी विज्ञापन में कभी कालिया दम्‍पत्ति की तस्‍वीर प्रकाशित हुई थी। बिल्‍डर, तस्‍कर, नेता, व्‍यापारी ये सब तबके हमेशा से साहित्‍यकारों और भाषासेवियों के संरक्षक रहे हैं।  

समकालीन उदाहरण ही देख लीजिए। हिंदवी से लेकर रेख्‍ता तक साहित्यिक मंचों का समूचा गुलदस्‍ता एक उद्योगपति के पैसे से बना है। अभी कुछ साल पहले ‘नई धारा’ नाम की एक पत्रिका की पटना रेजिडेंसी को लेकर कुछ बवाल हुआ था, उसे अशोका युनिवर्सिटी के प्रबंधन में शामिल उद्योगपति चलाते हैं। वैसे ही आजकल तक्षशिला नाम की एक संस्‍था बहुत तेजी से अपने पैर साहित्‍य, पुरस्‍कार, वजीफों में फैला रही है। उसे चलाने वाले लोग भी अशोका युनिवर्सिटी से जुड़े हुए कॉरपोरेट और कंपनी चलाने वाले लोग हैं। देश भर में जितने भी साहित्यिक महोत्‍सव हो रहे हैं, उन सबका कंपनियों और कॉरपोरेट के पैसों से जुड़ाव है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल सौदागरों को साहित्‍य से जोड़ने में कभी अग्रणी रहा है। अब सब इसी लीक पर हैं।

इसीलिए, श्रीकांत वर्मा ट्रस्‍ट का अशोक वाजपेयी सम्‍मान इस देशकाल में कोई अपवाद या विचलन नहीं है। वह तो हिंदी जगत का स्‍थापित नियम है, कवि जिसके आदी हैं। उनके डीएनए में ही आपराधिक बनियों का संरक्षण है। हर कवि इस बात को जानता है। कुछ तो लिखते भी हैं। हां, मानते बहुत कम हैं। जिन मुक्तिबोध का नाम बार-बार लेकर वाजपेयी अपनी वैचारिकता को सहलाते रहते हैं, वे खुद ‘अंधेरे में’ कह के गए हैं:

भई वाह!
उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक जगमगाते कवि-गण
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान
यहां तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमाजी उस्ताद
बनता है बलवन
हाय, हाय!!
यहां ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय।
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छिपे हुए उद्देश्य
यहां निखर आए हैं,
यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।

श्रीकांत वर्मा खुद कवि थे, सो वे मुक्तिबोध के पहचाने ‘मृत-दल’ का स्‍वभाव जानते थे। अशोक वाजपेयी ने वर्मा की जितनी भी कविताओं के टुकड़े उस दिन मंच से उद्धृत किए थे, निश्चित ही उनमें ‘एक मुर्दे का बयान’ नहीं रही होगी। हो भी नहीं सकती थी। एक नौकरशाह कवि मरते दम तक इस कविता को कहने की विनम्रता नहीं ला सकता।

इसलिए अशोक वाजपेयी को शुभकामना सहित उनके सम्‍मान में ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ की ओर से श्रीकांत वर्मा की ही कविता समर्पित!  

मैं एक अदृश्य दुनिया में, न जाने क्या कुछ कर रहा हूं।
मेरे पास कुछ भी नहीं है-
न मेरी कविताएं हैं, न मेरे पाठक हैं
न मेरा अंधकार है
यहाँ तक की मेरी सिगरेटें भी नहीं हैं।
मैं ग़लत समय की कविताएं लिखता हुआ
नक़ली सिगरेट पी रहा हूं।
मैं एक अदृश्य दुनिया में जी रहा हूं
और अपने को टटोल कह सकता हूं
दावे के साथ
मैं एक साथ ही मुर्दा भी हूं और ऊदबिलाव भी।
मैं एक बासी दुनिया की मिट्टी में
दबा हुआ
अपने को खोद रहा हूं।

मैं एक बिल्ली की शक्ल में छिपा हुआ चूहा हूं
औरों को टोहता हुआ
अपनों से डरा हुआ बैठा हूं
मैं अपने को टटोल कह सकता हूं दावे के साथ
मैं गलत समय की कविताएं लिखता हुआ
एक बासी दुनिया में
मर गया था।

मैं एक कवि था। मैं एक झूठ था।
मैं एक बीमा कंपनी का एजेंट था।
मैं एक सड़ा हुआ प्रेम था
मैं एक मिथ्या कर्तव्य था
मौक़ा पड़ने पर नेपोलियन था
मौक़ा पड़ने पर शहीद था।

मैं एक ग़लत बीवी का नेपोलियन था।
मैं एक
ग़लत जनता का शहीद था!