दुनिया 200 साल बाद

राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!

Bharat Kala Bhawan

क्‍या यह समाचार सामान्‍य है कि बनारस के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार एक संग्रहालय को दे‍ दिए, घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्‍मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्‍मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था!

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दुनिया 200 साल बाद

वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…

हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्‍यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्‍दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्‍वभाव है।

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