दिल्ली में इंडिया गेट के गोल चक्कर से पंडारा रोड की तरफ मुड़ते ही दाहिने हाथ पर बीकानेर हाउस है। कोई चाहे तो गोल चक्कर की अगली निकासी शाहजहां रोड पर भी मुड़ सकता है, तब बीकानेर हाउस बाईं ओर पड़ेगा। यही सुविधाजनक भी है क्योंकि उसी वाले गेट से भीतर हल्दीराम के ठीक सामने वाली इमारत में इनसानी इतिहास और सभ्यता का सबसे शाश्वत विचार कोई तीन दर्जन तस्वीरों की शक्ल में प्रदर्शित है, कि ‘कोई भी विचार अंतिम नहीं होता’। यह विचार वहां अंग्रेजी में ‘No Idea is Final’ लिखा है।
यहां शुरू में तस्वीरें तो 105 थीं, लेकिन ऐन वक्त पर 74 तस्वीरें हटवा दी गईं। अब दिक्कत यह है कि आप जनता से तो जंतर-मंतर छीनकर उसे लुटियंस की दिल्ली से भगा सकते हैं, लेकिन अभिजन का क्या ही कर लीजिएगा! तो दांव उलटा पड़ गया। जिन कमरों से तस्वीरें हटाई गईं, उनकी चटख लाल सूनी दीवारें आगंतुकों से चीख-चीख कर कह रही हैं कि दो दिन पहले यहां क्या हुआ था। उन दीवारों पर बस एक पतली-सी पट्टी बची है, जिस पर भारत के संविधान की प्रस्तावना लिखी हुई है। प्रदर्शनी के छायाकार रेहान वाड्रा- प्रियंका गांधी के सुपुत्र- तीन दिन से इस घटना पर मीडिया को इंटरव्यू देने में बेमन से लगे हुए हैं।
याद पड़ता है कि आज से कोई 180 साल पहले कार्ल मार्क्स ने अपनी किताब द जर्मन आइडियोलॉजी में एक काम की बात कही थी। वे लिखते हैं: ‘हर युग में सत्ताधारी तबके के विचारों का ही राज होता है यानी जो वर्ग समाज में भौतिक चीजों पर राज करता है वही समाज की वैचारिकता पर भी राज करता है।‘ भौतिक राज का ही नतीजा है कि लुटियंस दिल्ली से विरोध का प्रदर्शनस्थल पहले मिटाया गया। जब उससे काम नहीं चला, तो प्रदर्शन की तस्वीरों को दीवारों से हटवा दिया ताकि विचार फैलने से रोके जा सकें। फिर भी, तस्वीरों के हटने की कहानी संविधान की प्रस्तावना के बीच सुर्ख हो उठी। क्या विचारों को मिटाये जाने की कहानियां भी कभी मिटाई जा सकती हैं?

बीकानेर हाउस में रेहान की प्रदर्शनी आज शाम खत्म हो जाएगी। दिल्ली का मिजाज ऐसा है कि कोई चीज प्रतिबंधित की जाती है तो तत्काल बवाल कट जाता है। अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले के नारे उठने लगते हैं। रेहान ने ऐसा बिलकुल नहीं किया। उन्होंने प्रशासन की बात मानी और बची-खुची तस्वीरों से ही प्रदर्शनी निकाल ली। हो सकता है रेहान हटवायी गई तस्वीरों को कहीं और बाद में दिखावें। वे नारामिजाज युवा नहीं हैं। बहुत सौम्य हैं। बातचीत में वे कहते हैं, ‘मेरी कला ही मेरी राजनीति है’।
राजनीतिक खानदान का होकर रचनात्मक होना इस देश में बड़ा बोझ है। मरहूम राजीव गांधी से लेकर राहुल गांधी तक अनिच्छा के बावजूद परिस्थितिवश इस बोझ को उठा चुके हैं। लोग भी मानकर चलते हैं कि नेता का बेटा तो नेता ही बनेगा। कम से कम दसेक साल से तो ऐसी अटकलें रेहान और उसकी बहन को लेकर लग ही रही हैं। शायद 2015 की बात है जब रेहान अचानक अपने मामा राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी पहुंचे थे। वहां ग्रामीणों के साथ उन्होंने एक रात बितायी, खाना खाया। तब बड़ा हल्ला हुआ था।
उससे कोई साल भर पहले एक अखबार ने खबर छाप दी थी कि राहुल गांधी अपनी बहन के बच्चों को गोद लेने वाले हैं ताकि उनके नाम में गांधी लगा रहे और खानदान की राजनीतिक विरासत कायम रहे। प्रियंका गांधी ने मजबूती से इसका खंडन किया और मीडिया संस्थान को कानूनी नोटिस भिजवाया था। फिर 2024 के आम चुनाव में जब रेहान और उसकी बहन वोट देते दिखाई दिए तब भी मीडिया ने हल्ला मचाया, गोया दोनों राजनीति में उतरने वाले हों।
हर नेता के बच्चों के साथ यह सवाल लगा ही रहता है कि वे सक्रिय राजनीति में कब आएंगे। कोई नहीं पूछता कि वे जो कर रहे हैं वह क्यों कर रहे हैं; जो कह रहे हैं वह क्यों कह रहे हैं। नेतापुत्रों की रचनात्मकता, वैचारिकता और समझदारी को लेकर इस देश में कभी कोई सार्वजनिक जिज्ञासा नहीं दिखती, लेकिन रेहान की परिपक्व बातें जिज्ञासा पैदा करती हैं जब वे कहते हैं कि ‘मंच पर तो सब जा ही रहे हैं, मैं पृष्ठभूमि में रहकर काम करना पसंद करता हूं’।
हमने उनसे पूछा कि इस देश में गांधी परिवार से होने का मतलब ही है कि आप राजनीति से बच नहीं सकते, फिर कब तक आप बच पाएंगे। उनका जवाब साफ था, ‘कौन जानता है आगे परिस्थिति क्या बनेगी। जैसी परिस्थिति मांग करेगी वैसा सोचा जाएगा। कोई भी विचार फाइनल नहीं होता।‘
‘कोई भी विचार फाइनल नहीं होता’, इस विचार पर पहुंचने में किसी को कितनी उम्र लग सकती है? रेहान तो केवल 26 बरस के हैं- आजकल की भाषा में ज़ेन जी! जरा अपने आसपास देखिए, अपने विचारों को अंतिम सत्य और अपने वजूद को अंतिम प्रमाण, मानने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा उनमें देखी जा रही है जिनकी उम्र सबसे ज्यादा है और जो सबसे जिम्मेदार जगहों पर बैठे हैं? क्या उम्र बढ़ने का वैचारिक जड़ता के साथ कोई जैविक रिश्ता है? कौन जाने!
बहरहाल, हमारी अक्टूबर-कथा दिल्ली से शुरू हुई थी और इसी शहर पर निपटेगी, जिसके बारे में बनारस के डॉ. लेनिन लगातार कहते रहते हैं कि ‘दिल्ली चरित्रहीन है’। इस बात को शुरू में दिए गए मार्क्स के उद्धरण के साथ मिलाकर पढ़िए। बात गई बन में, सोचो अपने मन में! जो नहीं समझे उनके लिए दिल्ली की एक छोटी-सी कहानी।
एक राजा हुआ करता था अनंगपाल तोमर। उसका राज दिल्ली, हरियाणा, पंजाब से लेकर हिमाचल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक था। कायदे से वह चक्रवर्ती था। एक दिन वह शिकार खेलने गया। वहां उसने देखा कि एक बकरी के छौने को भेड़िये ने दबोच रखा है। राजा हताश हो गया। तभी बकरी ने पलटवार किया और अपने बच्चे को छीन लिया। भेड़िया भाग खड़ा हुआ। फिर बकरी राजा की ओर पलटी और बोली, ‘अच्छा, तुम ही वो क्षत्रिय राजा हो जिसका काम अपनी प्रजा की रक्षा करना है!’ राजा हतप्रभ था। उसने अपनी राजधानी अनंगपुर लौटकर राजगुरु को पूरी कहानी सुनाई।
राजगुरु ने ध्यान लगाया और बोला कि वह जगह तो शक्तिपीठ है। बकरी शक्ति का प्रतीक थी। इसलिए वहां अपनी राजधानी बसा लो। राजा ने वैसा ही किया। वह जगह दिल्ली की महरौली थी। राजा ने वहां तोमर साम्राज्य की राजधानी लाल कोट बनाई और दिल्ली बस गई। अब अनंगपाल चाहता था कि उसका दिल्ली पर स्थायी राज रहे। कोई उसे जीत न पाए। उसने राजगुरु से ऐसा कुछ जुगाड़ करने को कहा। राजगुरु ने राजा के पूर्वज युधिष्ठिर और यक्ष के संवाद की उसे याद दिलाई, कि बेटा कुछ भी शाश्वत नहीं है, सब भंगुर है। तब राजा ने जिच की कि कुछ तो ऐसा करिए कि उसकी राजधानी उसके पास लंबे समय तक टिकी रह सके। तब राजगुरु ने अथर्ववेद में वर्णित अभिचारों को पढ़ा और राजा को एक कीलक अनुष्ठान करवाने की सलाह दी।
बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुष्ठान हुआ। राजगुरु ने एक पवित्र कील जमीन में गाड़ दी और राजा को बताया कि उसने शेषनाग के सिर में कील स्थिर कर दी है जिससे शेषनाग अगर हिलेगा और धरती डोलेगी तब भी दिल्ली की राजधानी अपनी जगह पर कायम रहेगी और राज्य का राज्य कायम रहेगा। राजा को बड़ा अचरज हुआ कि कुछ फुट लंबी कील से शेषनाग को कैसे बेधा जा सकता है। उसने सैनिकों को वहीं पर फिर से खुदाई करने का आदेश दिया जहां कील गड़ी थी। खुदाई होते ही वहां से खून का फव्वारा बह निकला। राजा घबराया। उसने राजगुरु से मामला दुरुस्त करने को कहा। ब्राह्मण ने कंधे उचका दिए और बोला, ‘कील को उखाड़कर तुमने सब गंवा दिया, राजन! अपनी प्रजा और साम्राज्य को बचाने के लिए उस बकरी जैसी शक्ति चाहिए होती है, तंत्र-मंत्र करवाना तो अज्ञानियों और दुर्बलों के काम हैं।‘
उसके बाद ब्राह्मण राजगुरु ने दो पंक्तियां कहीं, जो दिल्ली के लोक इतिहास का शाश्वत सच बन गईं: ‘किल्ली तो ढिल्ली भई, तोमर हुआ मतिहीन’। हजार साल से ज्यादा हुए, दिल्ली के चक्रवर्ती राजाओं को ‘मतिहीन’ या ‘मतहीन’ मानने का आधार वह कील आज भी लोक स्मृति में पैबस्त है। शायद महरौली में आज भी वह कील कहीं होगी। जो किल्ली ढिल्ली हुई, तो तोमरों की राजधानी का नाम भी ढिल्ली या ढिल्लिकापुरी पड़ गया। राष्ट्रीय संग्रहालय में 1383 का एक अभिलेख इसकी पुष्टि करता है:
देशोऽस्ति हरियानाख्यो पॄथिव्यां स्वर्गसन्निभः
ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता’।
ढीली कील वाली किंवदंती ‘पृथ्वीराज रासो’ में भी कुछ ऐसे आती है जिसका अर्थ है- अनंगपाल ने ढिल्ली में किल्ली गाड़ दी और इस कथा को इतिहास से कभी नहीं मिटाया जा सकता:
हुं गड्डि गयौ किल्ली सज्जीव हल्लाय करी ढिल्ली सईव
फिरि व्यास कहै सुनि अनंगराइ भवितव्य बात मेटी न जाइ’।
रेहान वाड्रा की बीकानेर हाउस में लगी प्रदर्शनी इसी कहानी को दरअसल तस्वीरों के माध्यम से सुनाना चाह रही थी कि सत्ता और विचार कभी किसी के स्थायी नहीं होते, पर राजा तो फिर से मतिहीन निकला!
