देश के दिल में दिल्ली। दिल्ली के दिल में कनॉट प्लेस। दिल्ली के दिल पर फिलहाल नई पीढ़ी की नई वाली हिंदी की जो अश्लील चाबुक चल रही है उसने 339 साल पहले गला घोंट कर मारे गए शायर ज़ाफ़र ज़टल्ली को जिंदा कर दिया है, जिन्होंने ‘हिंदी’ की पहली ग़ज़ल लिखी थी।
ऐसा नहीं है कि आंदोलन कर रही जेन-ज़ी हिंदी में कोई नए शब्द लेकर आई है। उसने बस उन पुराने शब्दों को चौराहे पर, फिज़ाओं में और सबकी ज़बान पर लाकर सरेआम रख दिया है जिन्हें अब तक अश्लील, वर्जित और असंसदीय माना जाता था। आप इंस्टाग्राम खोलिए, एक से एक नारे और एक से एक पिंगल सुनने-देखने को मिलेंगे जिन्हें आज तक इस देश में खुलकर कभी किसी इंकलाबी कार्रवाई में नहीं बरता गया था। दोस्त-यारों के बीच हंसी ठिठोली या मार-झगड़े के दौरान गाली-गलौज की बात अलग है। विडम्बना है कि यही शब्द अब सरकार-विरोधी जुटान को ताकत दे रहे हैं।
ज़टल्ली शायद सबसे पहले शख्स रहे होंगे जिन्होंने न सिर्फ ऐसी भाषा की ताकत समझी थी, बल्कि उसे मुगलिया सल्तनत के खिलाफ़ बरता भी था और उसकी कीमत भी चुकायी थी। उनके लिखे ये दो हर्फ़ आज भी निजाम के खिलाफ ‘वर्जित’ शब्दों की ताकत को बयां कर रहे हैं:
अगरचे हुम कुड़ाओ करकटस्त
बहिंदी-दशिंदी जु़बां
वा लेकिन किसी ने भली ये कही
जिसे पियु चाहे सुहागन वही
यानी, ये हिंदी भाषा देखने में भले कूड़ा-करकट लगे पर कहते हैं न कि जिसे चाहा उसी के हो गए सगे। जंतर-मंतर पर नई पीढ़ी की निर्बाध अभिव्यक्ति यूं ही नहीं सबका ध्यान खींच रही, बेशक खुलकर अब तक किसी ने इस पर कुछ नहीं कहा है। सोचा जाए तो सत्ताधारियों को कितना बुरा लग रहा होगा जब चालीस की उम्र पार कर चुके लोगों को ही यह अजीब लग रहा है। बहरहाल…
जानना ज़रूरी है कि ज़टल्ली से पहले ‘हिंदी’ नाम की भाषा नहीं थी। ज़टल्ली ने ही स्थानीय भाषाओं के ताने-बाने में फ़ारसी को पिरोकर पहली ग़ज़ल लिखी थी और उसे ‘हिंदी’ कहा था, गोया वे इस धरती के साथ उसका मजबूत रिश्ता जताना चाह रहे हों। ज़टल्ली दिल्ली के पास एक शहर नारनौल में एक सैयद परिवार में पैदा हुए थे। उनका नाम मीर मुहम्मद ज़ाफर था। शुरुआती जीवन उन्होंने दिल्ली में ही गुज़ारा, जिसके बाद वे दक्कन चले गए।
वे अमीर खुसरो की तरह अराजनीतिक नहीं थे। खुसरो को कोई सत्ता के संदर्भ में निष्ठावान भी कह सकता है, चूंकि सात अलहदा शासकों के राज में वे ठीकठाक बने रहे। इसके उलट जटल्ली मुगल सल्तनत के तीखे आलोचक थे, जिन्होंने प्राय: चुभने वाले तीखे और अश्लील व्यंग्य लिखे जिनके शीर्षक चौंकाने वाले होते थे, जैसे ‘गांडूनामा’। ये व्यंग्य उनकी नज़र में शासक द्वारा प्रजा के साथ किए जाने वाले बरताव पर आलोचनात्मक टिप्पणी होते थे। हालत यह थी कि वे मुगल शासक औरंगजेब की आँख का काँटा बनने से बाल-बाल बच गए थे। मसलन:
गया इख़लास आलम से गज़ब ये दौर आया है
डरे है ख़ल्क जालिम से अजब ये दौर आया है
न यारों में रही यारी न भाइयों में वफादारी
मोहब्बत उठ गई सारी अजब ये दौर आया है
सिपाही हक नहीं पावें, नी उठ-उठ चौकियाँ जावें
कर्ज़ बनियों से ले खावें अजब ये दौर आया है।
दरअसल, जिस तरह की हल्की-फुल्की नज़्म उनके समय तक लिखी गई थीं उनके मुकाबले शायरों को अब ज्यादा गहरे और इंकलाबी मसलों पर लिखने की ज़रूरत पड़ रही थी। जाहिर है, फिर भाषा में भी उतनी ही जटिलता अपने आप आ जानी थी। जैसे आज सरकार के खिलाफ गुस्सा जितना गहरा है, उसे जाहिर करने वाली भाषा भी उतनी ही तल्ख होनी है।
नतीजतन, ज़टल्ली की ग़ज़लें साहसिक और इंकलाबी ख़यालों को पेश करने लगीं जो राजशाही के विरुद्ध थे। उन्होंने एक नई साहित्यिक परंपरा का सूत्रपात किया। उनके तख़ल्लुस ‘ज़टल्ली’ का अर्थ था ‘जो बकवास करता है’, यानी शाही दरबार का वह विदूषक जो राजा के मुँह पर सच बोलने की ताकत रखता है। ज़टल्ली की मिश्रित किस्म का तब तक कोई नाम नहीं था। वह बेहद सरल व ज़मीनी भाषा थी, लेकिन कभी-कभार वे खुद उसे ‘हिंदी’ कहते थे।
ज़टल्ली की अधिकांश उकसाऊ, अश्लील और ‘बकवास’ कही जाने वाली शायरी उनके एक संग्रह ‘ज़टलनामा’ में संग्रहित है। बहादुरशाह प्रथम के दौर पर लिखी उनकी एक शायरी देखिए, जो राजदरबार में व्यभिचार पर सीधा हमला थी:
बादशाही है बहादुरशाह की
बन बनाकर गांड़ मरवा खेलिए
पीर से, और बाप से, उस्ताद से
छुप छुपाकर गांड़ मरवा खेलिए।

भाषा को यदि एक ओर रख दें, तो हिंदी के बनने से बहुत पहले सत्ता पर ऐसे ही तीखे व्यंग्यात्मक हमलों के लिए कश्मीर के कवि और विद्वान क्षेमेन्द्र जाने गए थे। वे दसवीं-ग्यारहवीं सदी के दौरान कश्मीर के एक संपन्न और रसूखदार परिवार में हुए। उन्होंने अभिनवगुप्त के साथ साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इसके अलावा वे वैष्णव और बौद्ध दर्शन के अध्येता भी थे। वे संस्कृत में लिखते थे। क्षेमेन्द्र के मुख्य प्रहसन हैं ‘नर्ममाला’, ‘कलाविलास’ और ‘देशोपदेश’।
क्षेमेन्द्र अपने प्रहसनों में जो दुनिया दिखाते हैं, वह संस्कृत काव्य में दर्शाए गए सुंदर, अभिजात्य और सुसंस्कृत जगत से कोसों दूर है। वे समाज के ऊपर चढ़ा चमकदार मुलम्मा उतार कर तलछट की गंदगी को दिखलाते हैं। उन्होंने जितने किस्म के लोगों का मजाक बनाया है उसकी सूची बहुत लंबी है- प्रशासनिक अधिकारी, साधु, भिक्षु, भिक्षुणियां, डॉक्टर, भविष्वक्ता, गुरु, विधवाएं, सर्जन, व्यापारी, गायक और मनोरंजन करने वाले अन्य लोग, सुनार, वकील, परिजन, विजातीय, खलपात्र, कंजूस, दरबारीगण और गणिकाएं (विशेष रूप से), सारिकाएं, परजीवी लम्पट, विद्यार्थी, वृद्ध पुरुषों की पत्नियां, कवि, कीमियागर, जुआरी, मूर्ख, भक्त, वीणावादक, सेवानिवृत्त लोग, विद्वज्जन, लेखक, आदि। यहां तक कि क्षेमेन्द्र ने भगवानों को भी नहीं बख्शा है। ऐसा लगता है कि क्षेमेन्द्र सबके खिलाफ खड़े हैं- सबके खिलाफ, सिवाय राजाओं के। क्षेमेन्द्र सामाजिक समानता के प्रवक्ता नहीं थे, लेकिन ताकतवर लोगों के झूठ, शोषण और पाखंड का उनके द्वारा किया निष्ठुर चित्रण एक शक्तिशाली प्रत्याख्यान रचता है।
क्षेमेन्द्र से लेकर Gen-Z तक, सत्ता के खिलाफ अभिव्यक्ति के प्रयोग में आया विकास सही है या गलत, यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है। फिर भी एक बात तो तय है कि नई उम्र के आंदोलनकारी जैसे नारे गढ़ रहे हैं, अपने ही पोस्ट किए वीडियो पर जैसी भाषा बोल रहे हैं, वह इस देश में पिछले दशक के दौरान भाषा, नैतिक शिक्षा और सार्वजनिक व्यवहार के शिक्षण पर अपने आप ही एक गंभीर टिप्पणी है। और जाहिर है, इस सब की जिम्मेदार शिक्षा नीति को तय करने वाली केंद्र की सत्ता ही है, जिसे आज खुलकर दिल्ली में गालियां सुननी पड़ रही हैं।
ये नज़ारा भी दिल्ली की सल्तनत को ही देखना बदा था, जहां कभी बादशाह फर्रुख़सियर ने ज़टल्ली को बस एक शेर लिखने के दोष में तस्माकशी से मार डाला था। भूलना नहीं चाहिए कि यही वह बादशाह था जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी को यहां व्यापार करने की मंजूरी दी। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है।
