रावण के राज में सीता का अपहरण हो जाता है। राम के राज में सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। अग्निपरीक्षा भी गारंटी नहीं देती। राज किसी का भी हो, भोगती तो जनता ही है। इस देश में राजकाज और लोगों के रिश्ते की कहानी, मने कोउ नृप होय हमै ही हानी…! इसीलिए अग्निपरीक्षा में पास होने के बावजूद सीता को जान देनी पड़ जाती है। जब नागरिकता का सवाल पूछने पर रामवृक्ष यादव को गोली मार दी गई, तो बेचारा एक दिहाड़ी मजदूर अमीनुल हक क्या कर लेता?
असम में कामरूप के फॉरेन ट्रिब्यूनल संख्या 4 (मेट्रोपोलिटन) ने 28 फरवरी 2019 को अमीनुल हक को ‘’विदेशी’’ बता दिया था। गरीब आदमी की आखिरी उम्मीद अदालत, सो इस दिहाड़ी मजदूर को भी न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। उसने असम के उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की। दावा किया कि वह भारत का नागरिक है।
अपने दावे के समर्थन में अमीनुल पंद्रह कागजात लेकर अदालत पहुंचा था। इसमें पैन कार्ड, वोटर कार्ड, वोटर लिस्ट, 1951 के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की कंप्यूटर मुद्रित प्रति जिसमें उसके पिता और दादा के नाम थे, और साथ में 1973 में खरीदी गई जमीन की बिक्री का मूल कागजात। अदालत ने सब कुछ देखा समझा। फिर जज साहिबान ने फैसला सुनाया कि पेश किए गए कागजात साक्ष्य के रूप में न्यायिक प्रक्रिया में या तो संज्ञेय नहीं हैं या फिर याचिकाकर्ता की नागरिकता को साबित करने में अपर्याप्त हैं। नतीजतन, अमीनुल की याचिका रद्द कर दी गई।
अदालत के फैसले की टिप्पणी का करीबी तर्जुमा कुछ ऐसा दिखता है, ‘’भले ही याचिकाकर्ता ने साक्ष्य के रूप में 15 कागजात पेश किए हैं, पर ये कागजात उसे यह स्थापित करने में मदद करते नहीं प्रतीत होते कि फॉरेनर्स ऐक्ट, 1946 की धारा 9 के अंतर्गत आवश्यक जवाबदेही के बोझ से खुद को मुक्त कर पाने में वह समर्थ है।‘’
अमीनुल के ऊपर ‘’जवाबदेही का यह बोझ’’ किसने डाला? भारत सरकार ने। भारत की सरकार को असम के लोगों पर इतना नियंत्रण कैसे हासिल हुआ? जाहिर है, अंग्रेजों का राज जाने के बाद अपने आप 15 अगस्त 1947 को असम भारत का हिस्सा बन गया क्योंकि अंग्रेजी राज में वह गवर्नर के प्रांत के तौर पर सीधे नियंत्रित होता था। कैसे? अंग्रेजों ने 1912 में असम को एक अलग राज्य बनाया था जिसकी प्रशासनिक राजधानी शिलांग में थी। 1937 में असम को अपनी विधानसभा मिली। तो क्या असम के ऊपर भारत सरकार के सीधे नियंत्रण की कहानी का इतना ही अतीत है, कि वह अंग्रेजों से पास होते हुए भारत की सरकार के पास जस का तस चला आया? क्या इसीलिए भारत की अदालत किसी को भी कह सकती है कि वह असम का नागरिक यानी भारत का नागरिक नहीं? असम पर अंग्रेजों का दावा क्या आसमान से टपका था? नहीं।
आज जिसे हम असम के नाम से जानते हैं, ठीक दो सौ साल पहले अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने अहोमी साम्राज्य से उसे धोखे से कब्जाया था। छह सौ साल पुरानी अहोमी राजशाही से बर्मा के लोगों को बाहर खदेड़ने का वादा करने के बाद अंग्रेज अपनी जबान से पलट गए थे। अहोम लोगों की सम्प्रभुता तो तभी खत्म हो गई थी। उसी समय अगर कोई दावा करता कि मैं सम्प्रभु अहोम हूं, तो अंग्रेज उसे लटका देते। हां, दो साल बाद ऐसा हुआ भी था।
1826 की फरवरी में अंग्रेजों और बर्मा की ऐतिहासिक लड़ाई को समाप्त करने के लिए यान्दाबो शांति संधि बर्मा के साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई। इसमें शामिल के शर्त के तहत बर्मा ने असम पर अपना दावा छोड़ कर उसे कंपनी को सौंप दिया। इस संधि के किए जाते वक्त अहोम साम्राज्य का कोई राजप्रतिनिधि या असमिया प्रतिनिधि बातचीत में शामिल ही नहीं किया गया। यानी, ईस्ट इंडिया कंपनी और बर्मा ने मिलकर असम की किस्मत उससे पूछे बगैर तय कर दी।
इसी से खफा होकर दो साल बाद 1828 में अहोम राजशाही के राजकुमार गंधर्व कुंवर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ अहोम विद्रोह छेड़ दिया। यह विद्रोह सीधे-सीधे यान्दाबो संधि के खिलाफ किया गया था। अहोम राजशाही की राजधानी रहे रंगपुर तक विद्रोहियों ने नवंबर 1828 में मार्च कियाकिया, लेकिन अंग्रेजी कंपनी की सेना ने उन्हें हरा दिया और सभी बागियों को कैद कर लिया। राजद्रोह के आरोप में कुंवर को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन अहोम लोगों से शांतिपूर्ण रिश्ता कायम रखने के दबाव में अंग्रेजों ने इसे बाद में सात साल के एकांतवास में बदल दिया।
अंग्रेजी राज से मुक्ति की लड़ाइयों के इतिहास में इसे असम की पहली बगावत माना जाता है जहां मूल निवासियों से कब्जाइयों के खिलाफ अपनी नागरिकता और सम्प्रभुता को बचाने की जंग छेड़ी थी, जो 1826 में धोखे से छीन ली गई थी। आज फिर से दो सौ साल बाद 15 दस्तावेज दिखाकर भी जब एक दिहाड़ी मजदूर को विदेशी ठहरा दिया गया है, तो इसमें उसकी क्या गलती? ये तो राजाओं की आपसी लड़ाई में प्रजा के ऊपर डाले गए बोझ का नतीजा है। राजा के सामने आखिर प्रजा कब कुछ भी अपने हक में साबित कर पाई है?
दो सौ साल की उम्र वाले असम और पचहत्तर साल से ज्यादा उम्र वाले इस भारतीय गणतंत्र में नागरिकता का संकट हास्यास्पद स्तर तक राजाज्ञा और विशेषाधिकार का मामला बन चुका है। असम के मुख्यमंत्री का यह फरमान कि आधार पहचान पत्र अब कुछेक शर्तों के सिवा 18 साल से ऊपर के व्यक्तियों को नहीं दिया जाएगा, इसका उदाहरण है। इसके पीछे की दलील भी वही अवैध नागरिक हैं। जब आधार नागरिकता और डोमिसाइल का प्रमाण ही नहीं है, तो राज्य सरकार उसे बनाने रोककर क्या हासिल कर लेगी?
इसका कोई तर्क बनता है क्या? राजा की मर्जी नहीं तो और क्या है यह? दो सौ साल पहले छिड़ी राजा की मर्जी के खिलाफ बगावत क्या दुहराई जा सकती है आज के भारत में?
(कवर तस्वीर दिल्ली के शहीदी पार्क में स्थापित अहोम विद्रोह का शिल्प है)
