जिस देश की आबादी के दस फीसद के पास भी पासपोर्ट नहीं है वहां पासपोर्ट पर बहस चल रही है। भारत सरकार के विदेश विभाग ने जैसे ही कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, टीवी के परदों में आग लग गई। क्या ये हतप्रभ, चिंतित बमुश्किल तमाम दस फीसद अभिजन 2020 में जिंदा नहीं थे जब इससे थोड़ा ज्यादा, कोई 15 फीसद मुसलमानों की नागरिकता का सवाल फंसा था? क्या ये सब लोग महज दस साल पहले हुए मथुरा के जवाहरबाग कांड को भूल गए, जहां सैकड़ों ग्रामीणों ने कुछ फीसद नहीं, बल्कि सभी भारतीयों की नागरिकता के सवाल पर गोली खा ली थी?
यही महीना था जून का 2016 में, जब मथुरा के जवाहरबाग में गोली चली थी, आग लगी थी। वह आग लगी नहीं, लगाई गई थी, चूंकि हाइकोर्ट ने पार्क को खाली कराने के संबंध में ‘उचित कार्रवाई’ करने का आदेश प्रशासन को दिया था। पार्क में सैकड़ों सत्याग्रही डेरा डाले हुए थे। सत्याग्रहियों के नेता थे उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के रामवृक्ष यादव। किसी को याद है?
भारत में बीते दस साल से नागरिकता का सवाल बार-बार बहस के केंद्र में आया है। पहले नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के नाम पर बवाल हुआ। उसके बाद मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण (एसआइआर) का सवाल सुप्रीम कोर्ट तक गया। चूंकि दोनों मामलों पर बहस मुसलमानों के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दी गई थी, तो बेचैनी उतनी सतह पर नहीं थी। अबकी देश का अभिजन फंसा है जिसका कोई धर्म नहीं, तो संपादकीय लिखे जा रहे हैं।
बरसों पहले से रामवृक्ष यादव यही सवाल गांव-गांव में उठा रहे थे। वे लगातार कहते आए थे कि इस देश के प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति और मुख्यमंत्रियों तक कोई भी देश का नागरिक नहीं है। सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें सनकी मानता था। मथुरा के प्रशासन ने उन्हें नक्सली माना। मीडिया ने मास्टरमाइंड। ऐसा नहीं है कि यादव ने हवा में ये बातें कही थीं। उनका हर दावा कागज पर था। कोई 14 मुकदमे उन्होंने किए हुए थे। नागरिकता का एक मुकदमा उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर भी था, जिसमें 2 जून 2016 के बाद भी तारीखें लगातार पड़ रही थीं। रामवृक्ष को इस बात का अंदेशा था कि कुछ न कुछ जल्द ही घटने वाला है।

रामवृक्ष ने सरकार के विभिन्न विभागों और अफसरों को अपने संगठन स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह की ओर से लिखे पत्रों में बार-बार यह मांग की थी कि सरकार को नागरिकता से जुड़े सारे ऐतिहासिक दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए ताकि हमें पता चल सके कि ‘’हम कौन हैं’’। वे खुद को इस देश का ‘प्रथम नागरिक’ कहते थे। उनका दावा था कि आधुनिक भारत में नागरिकता की कानूनी स्थिति एक ‘फर्जीवाड़ा’ है। आज यही बात दबी जबान वे तमाम बड़े-बड़े लोग कह रहे हैं जिन्हें पढ़ा-लिखा माना जाता है। अब भी देर नहीं हुई है, इन लोगों को रामवृक्ष यादव की लिखी किताब ‘विधिक सत्याग्रह’ पढ़ लेनी चाहिए।
बहरहाल, साठ साल के इस बूढ़े की लाश तक नहीं मिली थी, जब प्रशासन ने दावा किया कि 2 जून 2016 की गोलीबारी में यादव की मौत हो गई है। उनकी बेटी गुड़िया जब अपने पिता की लाश मांगने प्रशासन के पास गई तो उसे यह सूचना दी गई कि उनका अंतिम संस्कार किया जा चुका है। कोई महीने भर बाद आए एक वीडियो में गुड़िया ने यह बात बताई थी।
2 जून 2016 की कहानी भयावह है। शाम चार बजे के बाद पुलिस का पार्क खाली करवाने का ऑपरेशन शुरू हुआ था। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी ने पार्क की चारदीवारी को एक जेसीबी से तोड़ दिया और भीतर घुस गए। भीतर घुसते ही उन्हें घेर लिया गया। यह देखते ही उनके आठ हमराह भाग खड़े हुए। एसपी अकेले रह गए और खेत हो गए। तांडव इसके बाद शुरू हुआ।
एसपी की हत्या के बाद पुलिस का जो ऑपरेशन चला, तो वह अगले 48 घंटे की सफाई के बाद ही रुका। कुल 48 घंटे तक पार्क को बंद रखा गया। जेसीबी की मशीनें चलाई गईं। राख के ढेरों को फिल्टर किया गया। आखिर चल क्या रहा था पार्क के भीतर? इसका सही-सही जवाब पुलिस के अलावा और किसी के पास नहीं है। स्थानीय लोगों का मानना था कि जो भीषण आग लगी थी पार्क में, उसमें जले हुए लोगों की अस्थियों की दो दिनों तक सफाई चलती रही थी।
स्थानीय अखबारों (10 जून 2016, दैनिक जागरण, मथुरा) के मुताबिक उस दिन पुलिस ने 500 राउंड गोली चलाई। मथुरा प्रशासन ने 7 जून 2016 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी जिसमें एसएसपी और डीएम ने बताया कि जिन 19 सत्याग्रहियों की लाशों का पोस्टमॉर्टम हुआ है, उनमें से किसी की भी मौत गोली लगने से नहीं हुई। पांच सौ राउंड गोलियों का रहस्य आज तक कायम है। बलिया, देवरिया से लेकर बस्ती तक तमाम लोग आज भी अपने परिजनों का इंतजार कर रहे हैं। कोई नहीं जानता कि 2 जून 2016 को मथुरा में कितने लोग नागरिकता के सवाल पर दिनदहाड़े मार दिए गए थे।
अचानक 11 जून 2016 की सुबह एक खबर सोशल मीडिया पर उड़ी कि रामवृक्ष यादव जिंदा हैं और इटावा के किसी अस्पताल में भर्ती हैं। दोपहर होते-होते यह खबर गायब हो गई। प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के वजन से जवाहरबाग का सच टीवी परदों पर तब तक दब चुका था। जवाहरबाग कांड को महीने भर से ज्यादा वक्त बीतने के बाद रामवृक्ष यादव की पत्नी कलावती ने इलाहाबाद के मुख्य न्यायाधीश के नाम दस पन्ने का एक विस्तृत ज्ञापन (तस्वीर देखें) भेजा। उसकी एक प्रति उन्होंने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी प्रेषित की थी।

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव 2017 के मार्च में हुआ था। उसके छठे चरण से ठीक पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जवाहरबाग कांड पर दाखिल एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए मामले की जांच सीबीआइ को सौंप दी थी। सीबीआइ ने 66 महीने चली जांच के बाद 800 पन्ने की एक चार्जशीट बनाई जिसमें रामवृक्ष सहित 90 सत्याग्रहियों के ऊपर दंगा, आगजनी और हत्या का दोष मढ़ दिया। तब तक इनमें से 15 आरोपी मर चुके थे। मुकदमे की सुनवाई आज भी गाजियाबाद स्थित सीबीआइ की विशेष अदालत में चल रही है।
इस देश में गरीबों ने अपनी नागरिकता और अपनी सरकार का सवाल उठाया तो गोली चल गई। अमीरों ने तब गरीबों की बात नहीं सुनी, उन्हें भूल गए। इसलिए अब सवाल उनके ऊपर है।
