दुनिया 200 साल बाद

छावनी की जिंदगी, जिंदगी की छावनी…

हर बार कहीं कुछ संवेदनशील होता है तो वहां अचानक ‘छावनी’ क्‍यों बन जाती है? और ये अखबार वाले सकारात्‍मक लहजे में इसकी मुनादी क्‍यों करते हैं? आखिर इसका मतलब क्‍या है? छावनियों से बाहर रहने वाले इस देश के सवा अरब से ज्‍यादा लोगों को नहीं पता कि छावनी की जिंदगी कैसी होती है, जब तक कि उनके अपने शहर में किसी दिन कोई जगह छावनी नहीं बना दी जाती।

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