दुनिया 200 साल बाद

वर्मा परिवार के वाजपेय यज्ञ में एक समिधा अपनी भी…

हिंदी भाषा में सत्ता के प्रति व्‍यवहार, विचार और लेखन की यह उभयवृत्ति भारतेन्‍दु का डाला हुआ मूल बीज है। उसी बीज से हिंदी के तमाम पौधे, पादप, बरगद, उनकी शाखा-प्रशाखाएं निकली हैं। अशोक वाजपेयी अपवाद नहीं हैं। नामवर सिंह भी नहीं थे। राजेंद्र यादव भी नहीं। सबने अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से सत्ता के सुख लिए, चारण बने, तो बागी भी रहे। यही हिंदी का मूल स्‍वभाव है।

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1826 के झरोखे से

दो सौ साल पहले विलायती कपड़े से शुरू हुई एक कहानी

अभी तो जी20 का जोर-जबर ही ठंडा नहीं पड़ा है, फिर ये नया नाम ब्रिक्‍स किसी की जबान पर कैसे चढ़ सकता है इतनी जल्‍दी! ये बात इससे समझ पड़ती है कि उस दिन शास्‍त्री भवन के पास पेड़ के नीचे बाल काटने वाले फुरकान ने बड़ी मासूमियत से पूछा था- भइया, ये जी ट्वेंटी फिर से होने जा रहा है क्‍या?

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दुनिया 200 साल बाद

बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया

Sayaji Rao Gaekwad Central Library, BHU

बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।

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1826 के झरोखे से

चढ़ती बारिश है, सांप काट ले तो क्या करें? एक प्राचीन नुस्खा

Snake Charmers in Kolkata, 1945, by Norman Herfort

‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ के 7 नवम्‍बर 1826 के अंक में सांप के विष की औषधि प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक था- ‘सर्प दंशन विष उतारने की ओषधि’। इसे नीचे अविकल प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित करने वाले ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी ने साथ में अपनी टिप्‍पणी लिखी है कि ‘’मालूम नहीं यह औषधि कहां तक उपयोगी है’’!

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दुनिया 200 साल बाद

‘वंदे भारत’ के अजनबी

दिल्‍ली के पंजाबी बनियों, हापुड़ के एक चौधरी साहब और कुछ मद्रासी श्रद्धालुओं की यह कहानी बताती है कि खाये पीये अघाये सभ्‍य समाज के भीतर भी कैसे कुछ लोगों को बेगाना और अजनबी बना कर खारिज कर दिया जाता है। बात बनारस की ही है, जहां अशोक ने अपने उत्‍पीड़न की अर्जी दी थी और जहां से श्रद्धालुओं की एक पार्टी दिल्‍ली की ट्रेन में चढ़ी।

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दुनिया 200 साल बाद

बनारस से अशोक बनवासी की चिट्ठी

इस कहानी की तस्‍वीर में दिख रही दुखियारों की भीड़ में अशोक बनवासी कोई भी हो सकता है। आप गौर से देखें तो उसे पहचान भी सकते हैं। उसकी दी हुई चिट्ठी को नीचे जस का तस छापा जा रहा है। यह कहानी अकेले अशोक की नहीं, उन सैकड़ों लोगों की हो सकती है जिन्‍हें केवल उनकी पैदाइश के चलते अपराधी मान लिया जाता है।

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दुनिया 200 साल बाद

मटियाबुर्ज: होने और न होने के बीच

कलकत्ते में वाजिद अली शाह की खुशबू लेनी हो तो मटियाबुर्ज जाना चाहिए, जहां नवाब ने अपने आखिरी साल बिताए और शहर के भीतर एक छोटा सा अदद लखनऊ बसा डाला। आज भी यहां आप किसी से दो बात कर लें तो भूल जाएंगे कि बंगाल में हैं।

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1826 के झरोखे से

जब लाट साहब गंगाजी से उत्तर भारत की यात्रा पर निकले…

AI generated illustration

इस यात्रा में उन्‍हें एक वर्ष सवा दो महीने लगे थे। वे 10 अक्‍टूबर सन् 1827 को लौटकर कलकत्ते पहुंचे थे। ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ में उनकी यात्रा, दरबार और लोगों से मिलने-जुलने की खबरें बराबर छपा करती थीं।

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दुनिया 200 साल बाद

दिल्‍ली सल्‍तनत बनाम ‘नई हिंदी’ : ज़टल्‍ली से Gen-Z तक

A Gen-Z Placard at Jantar Mantar, Delhi

आप इंस्‍टाग्राम खोलिए, एक से एक नारे और एक से एक पिंगल सुनने-देखने को मिलेंगे जिन्‍हें आज तक इस देश में खुलकर कभी किसी इंकलाबी कार्रवाई में नहीं बरता गया था। दोस्‍त-यारों के बीच हंसी ठिठोली या मार-झगड़े के दौरान गाली-गलौज की बात अलग है। विडम्‍बना है कि यही शब्‍द अब सरकार-विरोधी जुटान को ताकत दे रहे हैं।  

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दुनिया 200 साल बाद

होरमुज़ पर टिकी किसानों की उम्मीद कहीं टूट न जाए!

Fertilizer Cebter in Mahu, MP

ऐसा कम ही देखा गया है कि जंग दुनिया के किसी एक हिस्‍से में छिड़ी हो और किसी दूसरे कोने में लोगों की जबान पर वहां की एक नहर का नाम बैठ गया हो। होरमुज़ के साथ बीते एक साल में यह घटा है, जो किसी के लिए स्‍ट्रेट है, किसी के लिए जलडमरूमध्‍य, किसी के लिए जलसंधि तो किसी के लिए तेल और खाद की उम्‍मीद…!

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