पर्यावरण पर पालेबाजी से आखिर किसकी जान पहले बच जाएगी?
जिन्हें जनजातियों के पर्यावरण की चिंता थी, उन्हें तो दिल्ली के प्रेस क्लब में सुनने के लिए कायदे से तीस लोग भी नहीं आए थे। इन्होंने जो चिट्ठी भेजी है प्रधान जज को पिछली 22 तारीख को, वो शायद उन्हें मिल गई होगी। उस पर देश भर से 340 लोगों के दस्तखत हैं, लेकिन वे उसे क्यों पढ़ेंगे?
