1826 के झरोखे से

ठट्ठे की बात : मुरदे की जोरू और एक खानदानी मुकदमा

उदन्‍त मार्तण्‍ड में कभी-कभी बड़ी मनोरंजक बातें छपा करती थीं। उदाहरण के लिए आषाढ़ वदी 1 संवत 1883 के मार्तण्‍ड में प्रकाशित हुआ था- ‘फरासीस देशकी खबर’।

‘’कहते हैं कि बादशाह गरदी के रौले में एक ठौर बहुतेरे आदमी मारे गए थे। एक दिन एक आदमी ने एक मुरदे की जोरूको उस जगह जाते देखा ओ ठंढी सांस लेके यह बोला कि परमेश्‍वर की इच्‍छा ऐसी ही थी तेरा स्‍वामी संसारसे उठ गया इसमें क्षमा के सेवाय कोई उपाय नहीं है तू अपने जी को समझाव। उसने उतर (उत्तर) किया कि इसमें क्‍या सन्‍देह है जो होना था सो हो चुका मैं यह देखने आई हूं कि घरकी कुंजी उसकी खलीती में है या नहीं। कुंजी न पाऊं तो घर कैसे जाऊं। वह सुन कर एक टक लगा रहा।‘’   

इसी तरह, उदन्‍त मार्तण्‍ड में अदालतों की दशा पर एक मज़ाक आषाढ़ वदी 8 संवत 1883 को प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था- ‘ठट्ठे की बात’।

‘’एक यशी वकील वकालत का काम करते करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह काम सौंप के आप सुचित (सुचित्त) हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्‍न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलानेका पुराना ओ संगीन मुकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ। यह सुन कर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्‍यानाश किया। उस मोकद्दमें से हमारे बाप बढ़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाके दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली भांत अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पोते परोतों तक पलोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे।‘’