दुनिया 200 साल बाद

दालमंडी: काशी विध्‍वंस का सबसे संगीन अध्‍याय

मामला केवल दालमंडी को तो़ड़ने तक सीमित नहीं है। आगे रेवड़ी तालाब के पुनर्निर्माण का भी ठेका निकल चुका है। वह भी मुस्लिम बहुल इलाका है। इस सब की जड़ में काशी को क्‍योटो बनाने वाली केंद्रीय परियोजना है, जिसकी पहली कील बनारस की छाती में 2019 में गड़ी थी जब विश्‍वनाथ मंदिर को गंगा से सीधे जोड़ने के लिए करीब ढाई सौ विग्रहों, इतने ही भवनों और एक समूची सभ्‍यता को हमेशा के लिए मिटा दिया गया था जिसमें गलियां थीं, चौक चौराहे थे, पुस्‍तकालय थे और प्राचीन देवालय थे।

Continue Reading →
दुनिया 200 साल बाद

काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस : कलकत्ता वाया बनारस

लड़के ने ऊपर से मुंडी बाहर निकालते हुए कहा, अंकल अंदर की कहानी है। मैं पॉलिटिक्स पर बात नहीं करता, लेकिन खेल हुआ है। मैं वहीं का हूं, जानता हूं। बाकी, मंदिर तो बहुत भव्य बना है। योगी मोदी नहीं बनवाते तो ऐसा स्वरूप निकल के नहीं आता। इस पर श्रीवास्तव जी कुछ नहीं बोले। उनकी बिटिया ने चुपके से बाप से कहा, लगता है भैया भाजपाई हैं! बै…

Continue Reading →
दुनिया 200 साल बाद

उस्‍ताद के उजड़े दयार पर तीन घंटे

रवींद्रनाथ को पढ़ने के लिए आपको शांति निकेतन में जाना होगा। समेट दिया कोने में। रवींद्रनाथजी वहीं बैठे हैं। पेड़ के नीचे। आप कल्‍चर की बात कर रहे हैं, यहां छोटा बच्‍चा गाली से बात करना शुरू करता है। कल्‍चर गायब हो चुका है। कुछ नहीं है। यहां का हालत बहुत खराब है। आप जिन लोगों से बात कर रहे हैं न, वो दिन में गांजा पीते हैं और रात में शराब पीते हैं। काम क्‍या करते हैं, पॉलिटिक्‍स…

Continue Reading →
दुनिया 200 साल बाद

सड़क के रिश्‍ते

ऐसा लगता है कि पूरा शहर किसी आश्वस्ति के लंबे बहकावे में है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कलकत्ता दरअसल अतियों का शहर है। या कहें कि बंगाल अतियों की धरती है। अपने बिद्यार्थी दादा कहते हैं कि इस जमीन ने जितने बिप्‍लवी पैदा किए उतने ही क्‍लर्क भी पैदा किए हैं। यानी, यहां बदलाव किसी एक चरम पर जाकर ही होता है वरना लंबे समय तक यथास्थिति बनी रहती है। फिलहाल शहर के लोगों से बात कर के लगता है कि वे यथास्थिति के मूड में हैं।

Continue Reading →
दुनिया 200 साल बाद

दो सौ साल बाद 37, अमड़ातला गली की तलाश…

चायपत्ती वाले का कहना था कि इमारत पहले किसी मुसलमान की थी जिससे चायपत्ती वाले मारवाड़ी ने खरीद कर जमींदोज कर दिया और नई बनवाई। कौन जाने उस मुसलमान ने भी किसी और से न खरीदी रही हो। जो पता इतिहास में ‘अमड़ातला की गली 37 अंक’ के नाम से दर्ज हो ही चुका है, वहां 27 मकानों के बीच 37वां खोजना वैसे भी बेवकूफी ही होती। क्‍या करते हम मालिक से मिल के!

Continue Reading →