हमारी पहली सुबह किसी ने हमसे एक बहुत ही दिलचस्प बात कही थी! उनका कहना था कि बंगाल का आदमी बहुत जटिल होता है और इतनी आसानी से अपने मन की बात नहीं कहता। अगर यह सच है तो पहले लिखी सारी बातें गलत हैं और हम ठहरे निरे मूढ़। पर ये बात कही किसने थी? कौन है वो जिसने हमारे आते ही अबकी चुनाव कलकत्ते की नींद में खलल पड़ने की आहट दे दी थी?
जोयिता बसु खान उनका नाम है। मरहूम उस्ताद राशिद खान की हमसफर, जिनसे मिलने कलकत्ते की पहली सुबह हम नाकतल्ला निकल लिए थे।
राशिद भाई अपने दिल के बहुत करीब थे। हमारी पीढ़ी में जितने भी शास्त्रीय गायक हुए हैं उनमें राशिद खान सबसे अलबेले, सबसे सरल, सबसे संजीदा और सबसे दिलकश जान पड़ते थे। दो साल पहले अचानक जनवरी की एक सुबह जब उनकी मौत की खबर आई तो दिल धक से रह गया। इतनी कम उम्र में भी कोई जाता है भला? तब से ही साध लगी थी उनके यहां जाने की। मुलाकातें पहले भी हुई थीं दिल्ली और बनारस में, लेकिन तफ़सील से मुलाकात की योजना मन में ही दबी रह गई थी।
वे संकटमोचन संगीत समारोह में गाने आते थे। जैसे सब आते हैं बजरंगबली के दरबार में खाली हाथ। कुछ तो था ऐसा उनकी आवाज में, शायद बारह पीढ़ी पहले हुए तानसेन की पुरखई का बचा-खुचा डीएनए, जो रामपुर-सहसवां घराने की तीसरी पीढ़ी के इस कलाकार को दूसरों से इतना अलग बनाता था। दूसरों से, मतलब अन्य बंगालियों से भी, जिसे लेकर जोयिता हमेशा परेशान रहती हैं क्योंकि बंगालियों के बारे में उनकी राय थोड़ा अलहदा है। सोलह साल की उम्र में जोयिता थीं और राशिद भाई केवल इक्कीस के जब इन्होंने शादी की। वो दिन और उनकी आखिरी सांस तक राशिद भाई को किसी बच्चे की तरह पालपोस कर जोयिता ने बड़ा किया। दोनों के व्यक्तित्व को आप देखें तो मां-बेटे की उपमा से कुछ कम नहीं समझ आता। राशिद खान के उस्ताद बनने में उनकी आवाज, हुनर, गायकी के अलावा अगर किसी और चीज को जोड़ा जाएगा तो वो उनकी पत्नी जोयिता हैं।
जोयिता खूब बातें करती हैं। बेधड़क। हमें उनसे मिलने से पहले इसका पता नहीं था। इसीलिए नाकतल्ला की उनकी बड़ी-सी हवेली के बड़े-से गेट से भीतर घुसने पर हमें एक बार को भ्रम हुआ कि तेजी से सामने आई जो महिला विनम्रता से भैया प्रणाम कह कर अभिवादन कर रही थी कहीं वही तो नहीं। ना, वो तो सोनी थी। उसने हमें पहचान लिया था। शायद महाराजजी ने उसे पहले ही बता दिया था कि भैया लोग आने वाले हैं।
सोनी अभी अभी यहां काम पर लगी है। झारखंड से आई है। उसके बच्चे वहीं रांची में हैं। झारखंड से पहले अलवर में थी। ब्याह कर गई थी वहां और अत्याचारी पति के पाले पड़ गई। किसी तरह उस नरक से दो साल पहले उसे पीयूसीएल की कविता श्रीवास्तव ने निकाला और झारखंड भिजवा दिया। वहां से महाराजजी ने उसे राशिद भाई के यहां कुछ माह पहले काम पर लगवा दिया। महाराजजी मने अपने ऐक्टिविस्ट-ज्योतिष दोस्त और जोयिता के निजी संकटमोचक, जिनकी पहल पर पहले सोनी अपनी घुटन भरी जिंदगी से मुक्त हुई और अब राशिद भाई का बचा हुआ परिवार बुरी रूहों से निजात पा रहा है। उन दिक्कतों से, जिन्होंने राशिद भाई के जाने के बाद से या शायद पहले से ही इस परिवार को घेर रखा था। महाराजजी ने ही हमारी हलकी पैरवी की थी जोयिता से, वरना बंगाली भद्रलोक के भीतर दुनियादारी के इतने ऊंचे मुकाम पर बैठे एक चमकदार शख्स से मिलना अपनी किस्मत में कहां!
जोयिता से सामने मिलने पर लगता ही नहीं कि उनकी जिंदगी में कुछ गड़बड़ चल रहा होगा गोकि समूचे मकान में एक अनुपस्थिति-सी अखरती है। ऐसा लगता है कि कोई विराट खालीपन उस हवेली को भीतर और बाहर से घेरे हुए है। वह खालीपन बाहर पड़े सूखे पत्तों, बेहद तरतीब से सजाए गए बैठक के कमरे की उदास सफेद दीवारों और एक कोने में अनायास पड़े कलश, फूल-पत्तों और पूजा-हवन की कुछ रंगीन सामग्री से मिलकर सांय सांय कर रहा है। यह खालीपन जोयिता की अनुपस्थिति से और गहराता जाता है, जब तक कि वे पौन घंटे हमें बैठाकर सोनी के हाथ से चाय पानी पिलाने के बाद खुद प्रकट नहीं हो जातीं। थोड़ा हम ही नियत समय से पहले आ गए थे। फिर थोड़ी देरी उनकी तरफ से भी बनती ही थी। बहरहाल वे आईं और बंगाल पर बातचीत का सिरा संकटमोचन के बहाने बनारस से उठा। फिर उन्होंने कहा, बनारस मेरा पसंदीदा शहर है।
बनारस को सबसे पुराना शहर कहते हैं। बंगाल भी लगभग उतना ही पुराना होगा। जिसे बनारसियत या बनारसीपन की संस्कृति कहते हैं वैसा ही कुछ तत्त्व बांग्ला संस्कृति में भी होगा। जैसे हम बाहरी लोग मानकर चलते हैं कि बंगाली आदमी थोड़ा बहुत संगीत, कविता करता होगा। थोड़ा बहुत रवींद्रनाथ ठाकुर को पढ़ता होगा। नहीं! उन्होंने सीधे कह दिया- नहीं।
‘नहीं है, खत्म हो गया सब। अभी आप दीदी की कविताएं पढ़िए। बच्चे वही सब सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। हम्बा हम्बा, रम्बा रम्बा, बम्बा बम्बा। ये कोई कविता है? आप कौन सी दुनिया से आए हैं? आप तो एलियन हैं पश्चिम बंगाल में! क्या कन्टेन्ट लिखती है दीदी, ओह हो। मुझे दो चार किताबें दी थीं। मैंने कहा बांग्ला तो पढ़ने नहीं आती मुझे। करूंगी क्या?’
रवींद्रनाथ नहीं पढ़ाया जाता यहां के स्कूलों में? जोयिता बोलीं कि रवींद्रनाथ को पढ़ने के लिए आपको शांति निकेतन में जाना होगा। समेट दिया कोने में। रवींद्रनाथजी वहीं बैठे हैं। पेड़ के नीचे। आप कल्चर की बात कर रहे हैं, यहां छोटा बच्चा गाली से बात करना शुरू करता है। कल्चर गायब हो चुका है। कुछ नहीं है। यहां का हालत बहुत खराब है। आप जिन लोगों से बात कर रहे हैं न, वो दिन में गांजा पीते हैं और रात में शराब पीते हैं। काम क्या करते हैं, पॉलिटिक्स…
बीच में राशिद खान एकेडमी से किसी का फोन आ गया और जोयिता कल होने वाली किसी मीटिंग के लिए उसे ब्रीफ करने लगीं। फिफ्थ नोट नाम की यह संगीत एकेडमी जोयिता ही चलाती रही हैं। एकेडमी उन्हीं के नाम से जानी जाती है। राशिद भाई की तालीम देने में कोई खास दिलचस्पी कभी नहीं रही थी। वे कहती हैं कि तालीम देना बिलकुल अलग बात है। मैंने देखा है अपने मामा ससुर और दूसरे लोगों को कि कैसे इतने सौ सालों बाद भी खूबसूरत ढंग से वे संगीत सिखाते हैं। कहीं कोई डाक्युमेंटेशन नहीं, सब कुछ स्मृति में होता है। परंपराबद्ध। भातखण्डे से संगीत सीखकर निकलना आसान बात है लेकिन जो घरानेदार सीख होती है वो दूसरी बात है। राशिद की इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। खुद अपने बेटे के साथ वो नहीं बैठे कभी।
फोन काट कर वे वापस बंगालियों पर लौटीं- और ये सब जिंदगी के सारे क्षेत्रों में घुस चुका है। यहां बारहवीं के बाद अच्छे घर के बच्चे नहीं रुकते। विदेश भेज देंगे। दिल्ली, पुणे, बंगलोर, मद्रास, सब भरा हुआ है। कश्मीर चले जा रहे हैं बच्चे पढ़ने के लिए, यहां नहीं रहेंगे। मेरे बाबू का स्कूल का दोस्त, उसने छोड़ दिया। बोला मैं नहीं पढ़ूंगा यहां। कानपुर चले गए लोग।
लेकिन ये जो पब्लिक स्पेस का कल्चर है कलकत्ता में? जैसे रात में लोग सड़क किनारे कैरम खेल रहे थे। रेडियो बज रहा था। ये सब बाहर के लोगों को खींचता है। वे बोलीं- पास जा के सुने थे? तो आप असली काम नहीं किए। कैरम क्लब्स हैं। उनके पास कोई काम तो है नहीं बेचारों के पास। दीदी ने बनाकर दिया है न। पहले भी थे। सीपीएम के जमाने में भी तो काम नहीं करते थे। ये तो अभी जेनेटिक हो गया है। उनके बच्चे हैं न। मां-बाप को काम करते नहीं देखा तो बच्चे कैसे करेंगे?
फिर किसी का फोन आ गया… हम सोच रहे थे कि कलकत्ते में सड़क की जो संस्कृति हमें खींचती है, जिसे हम लोगों के रिश्तों का आईना मानकर चलते हैं, क्या वह बंगाल का महज एक पुराना गुप्त रोग है जिसे बेकारी या बेरोजगारी भी कहते हैं! थोड़ा और गोता मारना जरूरी था। इतने से काम नहीं चलेगा।
