दुनिया 200 साल बाद

सड़क के रिश्‍ते

दो दिन हुए हमें कलकत्ते में आए। शहर में बसंत उतरा हुआ सा महसूस होता है लेकिन गर्मी की आहट भी सुनाई दे रही है। सियालदह स्टेशन के बाहर निकलते ही टोकरियों में बिकते जामरूल पर नजर पड़ती है। जामरूल मने बंगाल का जामुन। बगल में सुंदर सुंदर हरे अमरूद भी बिक रहे हैं। कोयल बोल रही है, कौवे भी। हमेशा की तरह उनके स्वर में सड़क पर चलने वाली विविध किस्म की गाड़ियों की आवाज और ट्राम की खटखट मिलकर उस समवेत कोलाहल को जन्म दे रही है, जो कोलकाता कहलाता है

किसी भी शहर को दिल्ली से देखना समझना धोखा दे सकता है। मसलन, दिल्ली में आप अखबार पढ़ते हैं तो यही सोच कर आए होंगे कि कलकत्ते की ट्रामें तो बंद हो गई होंगी। ऐसे समाचार खूब छपे थे पिछले साल। एक रिपोर्टर ने तो आउटलुक पत्रिका में बाकायदा ट्राम का लंबा चौड़ा मर्सिया लिख मारा था। इत्‍तेफ़ाक देखिए कि रफ़ी अहमद किदवई मार्ग पर हम जहां रुके थे, ट्राम की पटरी सड़क पर पहले की तरह न सिर्फ बिछी हुई थी बल्कि ट्राम बाकायदा पूर्ववत चलती दिखी। मन को सुकून मिला।

उदन्‍त मार्त्तण्‍ड के दो सौ साल पुराने छापा घर की खोज में हम लोग तीसरे दिन ट्राम से ही निकले थे जो धरमतल्‍ला पर आकर ठहर गई थी। केवल छह रुपये में। उसके कंडक्‍टर मंडल दा से बात हुई थी। उन्‍होंने बताया कि केवल दो रूटों पर ट्राम चल रही है। एक गरियाबंद से धरमतल्‍ला तक और दूसरी कॉलेज स्‍ट्रीट पर। कॉलेज स्‍ट्रीट तो हम सातवें दिन गए और चार किलोमीटर पैदल मार दिए किदवई मार्ग इस उम्‍मीद में कि ट्राम आएगी तो उछल कर बैठ जाएंगे। ट्राम थी कि नहीं आई तो नहीं ही आई।

भले दो एक सही, लेकिन जहां पटरियां हैं वहां ट्राम चल रही है या जहां जहां ट्राम चल रही है वहां पटरियां उखड़ी हुई नहीं हैं। यही क्या कम संतोष की बात नहीं है! हो सकता है इस संतोष के ये आखिरी दिन हों। अब तो शहर में पीली टैक्सियां भी कम होती जा रही हैं। उनकी आधी जगह मारुति की डिज़ायर ने घेर ली है। अच्‍छी बात है कि पीली टैक्‍सी चलाने वाली ही ज्‍यादातर अब कैब चला रहे हैं और उसी अंदाज में कि कोई हाथ मार के खाली गाड़ी रोक दे तो वे मना नहीं करते। इन नई कारों पर भी ‘नो रिफ्यूजल’ लिखा हुआ है। इससे भी अच्‍छी बात है कि सूबे की सरकार ने इनके लिए ‘यात्री साथी’ नाम का एक ऐप बना दिया है। ज्‍यादातर गाड़ीवालों के पास ओला या उबर के साथ यही ऐप दिखा लेकिन पहले की तरह तगादा कर के बिना मीटर के चलना अब भी सुहाता है। गाड़ीवालों को भी और सवारियों को भी।

सारथी और सवारी के इस अनौपचारिक रिश्‍ते की जड़ें यहां काफी गहरी हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि सारथी बंगाली है या बाहरी। सड़क और पटरी की जिंदगी के प्रति उसके मन में आपको करुणा हमेशा ही दिख जाएगी। सियालदह स्‍टेशन से किदवई मार्ग जाने के लिए हम जिस पीली टैक्सी में चढ़े उसके सारथी से बातचीत का यह टुकड़ा अंदाजा दे सकता है। हमने पूछा था- दादा, चुनाव का क्‍या माहौल है? जवाब आया- कलकत्ते का आदमी कभी भाजपा को नहीं जितवाएगा। हमने पूछा क्यों। वे बाहर पटरी पर लेटे बैठे लोगों की ओर उंगली दिखा के बोले कि भाजपा आ गया तो ये सब गरीब गुरबा को सड़क से हटा देगा।

ऐसे मामले सियासी गुणा गणित से पूरी तरह नहीं समझे जा सकते। किसकी जिंदगी किसके साथ कैसे कैसे जुड़ी हुई है चलती हुई सड़क पर इसे समझने के लिए दिल टटोलना पड़ता है। दिल टटोलने में समय लगता है और आजकल समय किसके पास है भला। हमारे पास बेशक था। यात्रा के सातवें दिन न्‍यू मार्केट में खालसा रेस्‍टोरेंट के बाहर हाथरिक्‍शा खड़ा कर के सुस्‍ताते हुए शम्‍भूजी मिले। कभी खालसा की कहानी भी लिखी जाएगी जहां से हम रात का भोजन कर के तुरंत निकले ही थे कि शम्‍भू से नजर मिल गई और उन्‍होंने बरबस पूछ दिया कहां जाना है। वे हमें ले चलने को तैयार भी थे। हम ही अचकचा रहे थे। इसी बहाने बातचीत शुरू हुई तो उन्‍होंने गर्व से बताया कि हाथरिक्‍शे का लाइसेंस पूरे बंगाल का होता है। उसे कोई रोक नहीं सकता। ये कहते हुए शम्‍भूजी किसी अदृश्‍य सुख से आश्‍वस्‍त दिखे।

शम्‍भू बिहार के मुजफ्फरपुर से आए हैं। दस साल से किराये का हाथरिक्‍शा चला रहे हैं। रोज साठ रुपया किराया भरते हैं मालिक को। गांव पर खेत है लेकिन इतना नहीं कि काम चल सके। उनके हिसाब से शहर भर में हजार दो हजार हाथ रिक्‍शे वाले तो होंगे ही। पहले इस काम में बारह आना बाहरी और चार आना बंगाली हुआ करते थे। अब हिसाब उलट गया है। अब बारह आना बंगाली हाथरिक्‍शा चलाता है और चार आना ही बाहरी रह गया है। लेकिन असल सवाल तो ये है कि इसकी सवारी कौन करता है। अव्‍वल तो हाथरिक्‍शे से चलने में समय लगता है। दूसरे कि थोड़ा ज्‍यादा पैसा देकर साधारण रिक्‍शा किया जा सकता है। और तीसरी समस्‍या वो है जिससे हमारे साथी अमन जूझ रहे थे। अपराधबोध। कि आदमी उन्‍हें अपने पैरों से खींच रहा है। ऐसे सवालों से ही सड़क के रिश्‍ते खुल जाते हैं अनायास।

हाथरिक्‍शे से बांग्‍लादेशी आदमी चलना बहुत पसंद करता है। ये बात शम्‍भू ने बताई। बात क्‍या थी किसी रहस्‍या का खुलना था उस शहर में जहां की मार्कुस रोड बीते महीनों में बांग्‍लादेशियों से साफ होकर सन्‍नाटे में बदल चुकी है। ऐसा क्‍या है कि बांग्‍लादेश का आदमी हाथरिक्‍शे से चलता है। शम्‍भू का कहना था कि उन लोगों को अच्‍छा लगता है। बता रहे थे कि दिन भर में मिलने वाली ज्‍यादातर सवारी बांग्‍लादेशियों की ही होती है। भले आजकल वे कम हो गए हों लेकिन लौटेंगे। लौटेंगे मतलब?

शम्‍भू को भरोसा था कि अगले महीने तक ‘सीमा खुल जाएगी’ और पहले की तरह बांग्‍लादेशियों का आना जाना सामान्‍य हो जाएगा। और अगर वे नहीं आए तो? शम्‍भू बोले- तब क्‍या होगा, हम लोग रिक्‍शा जमा कर के अपने घर लौट जाएंगे क्‍योंकि और लोग तो अब इससे चलना पसंद नहीं करता है। शम्‍भू दस साल से हाथरिक्‍शा खींच रहे हैं। उनकी बात को हलके में नहीं लिया जा सकता। बांग्‍लादेशियों को छांट छांट कर सूबे और शहर से खदेड़ने का असर हाथरिक्‍शा चलाने वालों की रोजी पर पड़ेगा यह बात शम्‍भू के अलावा और कौन बता सकता है।

यथास्थिति के हक में ऐसी बातों का कोई ठोस कारण आप निकालने जाएंगे तो नहीं मिलेगा। बस एक विश्‍वास है कि फलाने आएंगे तो गरीब को हटा देंगे या फलाने रहेंगे तो गरीब बचा रहेगा। ऐसी आस्‍थाएं उनके भीतर भी हैं जो शिकायती लहजे में बात करते हैं। दूसरी सुबह हम लोग प्रिंसेप घाट जा रहे थे। नई वाली डिजायर गाड़ी थी जिसे हाथ मार के हमने रोक लिया था। सारथी ने बताया कि सूबे की सत्ता में बैठी पार्टी ने पंद्रह साल पुरानी गाड़ियों को सड़क से हटा दिया और उनकी जगह जिन सफेद गाड़ियों को टैक्सी में लगाया उससे एक एक गाड़ी पर डेढ़ लाख रुपया कमा लिया। यह शिकायत थी लेकिन ऐसी भी नहीं जो बदलाव मांगे। वे नहीं चाहते कि तृणमूल कांग्रेस की सरकार चली जाए।

ऐसा लगता है कि पूरा शहर किसी आश्वस्ति के लंबे बहकावे में है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कलकत्ता दरअसल अतियों का शहर है। या कहें कि बंगाल अतियों की धरती है। अपने बिद्यार्थी दादा कहते हैं कि इस जमीन ने जितने बिप्‍लवी पैदा किए उतने ही क्‍लर्क भी पैदा किए हैं। यानी, यहां बदलाव किसी एक चरम पर जाकर ही होता है वरना लंबे समय तक यथास्थिति बनी रहती है। फिलहाल शहर के लोगों से बात कर के लगता है कि वे यथास्थिति के मूड में हैं।

इस संदर्भ में एक बहुत ही दिलचस्प बात हमारी पहली सुबह किसी ने हमसे कही थी जो ऊपर कही हर बात पर शक पैदा कर दे। उनका कहना था कि बंगाल का आदमी बहुत जटिल होता है और इतनी आसानी से अपने मन की बात नहीं कहता। अगर यह सच है तो ऊपर लिखी सारी बातें गलत हैं और हम ठहरे निरे मूढ़। पर ये बात कही किसने थी? कौन है वो जिसने हमारे आते ही अबकी चुनाव कलकत्ते की नींद में खलल पड़ने की आहट दे दी थी?