दुनिया 200 साल बाद

क्योंकि ब्‍योंड़े के टूट जाने पर किला देर तक नहीं बचता…

बंगाल चुनाव से ठीक पहले कलकत्ते के लिए बनारस से हम लोग वैसी ही भीषण गर्मी और उमस में निकले, जैसे कभी नवाब वाजिद अली शाह अवध पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद काशिराज के महल में दस दिन गुजार कर 25 अप्रैल 1856 को कलकत्ते निकले थे। फर्क बस इतना था कि वे पानी के जहाज से गए थे, हम ट्रेन की स्‍लीपर बोगी से जा रहे थे।

वाजिद अली शाह जब लखनऊ से निकले थे, तब उन्‍होंने एक ठुमरी रची थी- जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहो हाल के हमपे क्‍या गुजरी। अपना हाल कुछ और ही था। न तो लखनऊ का गम था, न ही बनारस का दुख, लेकिन कलकत्ते को लेकर मन में एक संशय जरूर था कि इसके बाद वहां जाने किस हाल में जाना पड़े। क्‍या जाने यही अपनी अंतिम यात्रा न हो! दरअसल, पिछली यात्रा के बाद से बहुत पानी हुगली में बह चुका था। पिछली बार पूरा शहर सोया हुआ आश्‍वस्‍त-सा लग रहा था कि चुनाव में यहां ऐसा कुछ नहीं होगा जिससे शहर की बची-खुची सूरत और सीरत बदल जाए। अबकी, मन में डर था। हावड़ा उतरने के बाद वह संशय खीझ में बदल गया जब स्‍टेशन से होटल पहुंचने के लिए एक गाड़ी करने में माथे का पसीना रिसकर मूलाधार तक पहुंच गया। कलकत्ता इतना कठिन तो नहीं होना चाहिए! था भी नहीं! आखिर, यह आपाधापी, यह भ्रम क्‍यों फैला पड़ा है? इतनी अव्‍यवस्‍था अचानक महीने डेढ़ महीने में कैसे हो गई?

आज, चुनाव के करीब महीने भर बाद समझ में आता है कि वह किसकी आहट थी। वह आगत की आहट थी, जिसका पता 4 मई को आए नतीजों में चला। महज बीस दिन हुए हैं और वह आहट आज हावड़ा स्‍टेशन से रेहड़ी-पटरी वालों को दरबदर किए जाने की मौन चीख में पैबस्‍त हो चुकी है; हॉग मार्केट में मुसलमानों की दुकानों पर चले बुलडोजर की दहाड़ में गुंजायमान है; बंगाल के हर स्‍कूल में सुबह जबरन वंदे मातरम् गवाये जाने के फरमान में दर्ज है। वह आहट हमने काफी पहले सुन ली थी। वह जो बेचैनी 2011 के जैसी इस बार हुई थी, उसका कोई न कोई आधार तो था ही।

क्‍या यह इत्तेफाक है कि 29 अप्रैल को हुए अंतिम मतदान से ठीक पहले नरेंद्र मोदी बनारस चले गए थे? उस दिन के बारे में बनारस के पुराने पत्रकार अजय राय ने 27 अप्रैल को ही लिखा था: ‘’जब मतदान हो रहा होगा तब मोक्षनगरी में वे बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद लेने जाएंगे जुलूस लेकर। अबकी वे मोक्षभूमि महाश्मशान काशी में भी लाइव तपस्या करने आ रहे हैं। याद रखना चाहिए कि काशी में जिसकी साधना सफल हो जाती है वह एकाकार हो जाता है। उसके पास कुछ नहीं बचता- न मत्स्य और न मत्सर।‘’

काशी में किए ‘नारी वंदन’ ने बंगाल की साधना का सुफल तो उन्‍हें दे डाला, लेकिन मत्‍स्‍य और मत्‍सर का कुछ नहीं बिगड़ा! सदिच्‍छाओं का कुछ नहीं किया जा सकता। खासकर, जब वे सियासी हों। सदिच्‍छाओं के खतरे पर एक बहुत कारगर प्रसंग डॉ. मोतीचंद्र ने ‘काशी का इतिहास’ में दिया है, जिसे बंगाल के संदर्भ में पलट कर आज पढ़ा जाना चाहिए। बात बनारस के गाहड़वाल राजा जयचंद्र की है, जो गोविंदचंद्र का पौत्र था। डॉ. भंडारकर के हवाले से मोतीचंद्र जी लिखते हैं, ‘’जयचंद्र की मुसलमानों के प्रति सहानुभूति का कारण संयोगिता-हरण है जिससे गाहड़वालों और चौहानों में जानी दुश्‍मनी पैदा हो गई।‘’ वे लिखते हैं कि मुसलमानों से जयचंद्र की मित्रता का उल्‍लेख ‘जयचंद्र-प्रबंध’ में भी मिलता है। इसके आगे की कहानी योगिनीपुर में शहाबुद्दीन गोरी द्वारा पृथ्‍वीराज चौहान की फतह से जुड़ी है, लेकिन असल सबक उसके बाद का है:

’प्रबंध में आगे चलकर कहा गया है कि पृथ्‍वीराज की मृत्‍यु के बाद जयचंद्र बहुत प्रसन्‍न हुआ और उसने नगर में आनंदोत्‍सव मनाने की आज्ञा दी। इस अवसर पर जयचंद्र का मंत्री तीन दिनों तक राजदरबार नहीं गया। चौथे दिन उसने राजरदबार में उपस्थित होकर राजा से आनंदोत्‍सव का कारण पूछा। जब उसे कारण का पता चला तो उसने कहा कि पृथ्‍वीराज की मृत्‍यु पर मातम मनाने का अवसर था, खुशियां मनाने का नहीं। जयचंद्र ने मंत्री के इस विचार का कारण पूछा तब उसने कहा- ‘’एक दरवाजा है जिसके किवाड़ और ब्‍योंड़े लोहे के हैं, ब्‍योंड़े के टूट जाने पर किवाड़ जबरदस्‍ती खुलने को बाध्‍य हो जाते हैं, उसके बाद किले का क्‍या होगा? राजन् पृथ्‍वीराज दरवाजे के ब्‍योंड़े के समान थे और उनके पतन पर यह खुशियां मनाना ठीक नहीं है। आज पृथ्‍वीराज पर जो विपत्ति पड़ी है वह शायद कल आप पर भी आ सकती है।’’

इस प्रसंग पर डॉ. मोतीचंद्र ने अपनी टिप्‍पणी की है: ‘’मंत्री का पृथ्‍वीराज के हारने और मृत्‍यु के बाद जयचंद्र को संदेश भारतीय ऐतिहासिक साहित्‍य की अमूल्‍य निधि है। उससे पता चलता है कि उस समय भी ऐसे मंत्री थे जो इस बात को देख रहे थे कि किस तरह उत्तरी भारत का दरवाजा विदेशियों के लिए प्रशस्‍त होता जा रहा था। उन्‍होंने इसे रोकने का प्रयत्‍न भी किया, पर शायद समय और तत्‍कालीन राजनीतिक अवस्‍था उनके विरुद्ध थी।‘’     

यहां जयचंद्र को आप चाहें तो ममता बनर्जी मान लें, जो अतीत में कांग्रेस से अलग होने के बाद भाजपा के गठबंधन के सहारे सत्ता में रहीं। पहले एनडीए का हिस्‍सा रहते हुए और फिर 2011 में वाम सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाकर बंगाल की सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार ने कांग्रेस और वामदलों का जिस तरीके से विधिवत खात्‍मा किया, उन्‍हें बिलकुल भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उससे बनी परिस्थिति एक दिन उनको ही खा जाएगी। उन्‍होंने दरअसल धार्मिक राजनीति को एकतरफा ढंग से बढ़ावा देकर और समानधर्मा दलों के लिए लोकतांत्रिक जगह को खत्‍म कर के दरवाजे के ब्‍योंड़े को ही तोड़ दिया था, जिसके बाद बंगाल का किवाड़ खुलने को बाध्‍य हो गया था। बस समय की बात थी।

अबकी उन्‍हें भी अहसास हो गया था, शायद इसीलिए उन्‍होंने भारतीय जनता पार्टी को लगातार ‘बाहरी’ और ‘जमींदार’ बताकर चुनाव प्रचार किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल के लिए ‘विदेशी’ भाजपा को रोकने वाली ‘देसी’ ताकतों की जमीन छिन चुकी थी जबकि उसे बढ़ाने वाली विभाजनकारी हवा समूचे बंगाल को घेर चुकी थी। फिर दुर्ग द्वार टूट गया। ममता बनर्जी को अपनी हार का भरोसा ही नहीं हुआ। उन्‍होंने कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया।

ठीक वैसे ही जैसे बनारस के राजा जयचंद्र को नहीं हुआ था। उसे अपनों ने ही दगा दिया था। इसलिए वह कर भी क्‍या सकता था। युद्ध में अपनी हार देख कर राजा ने अपना हाथी यमुना में घुसा दिया। उसके साथ उसका बड़ा बेटा भी शहाबुद्दीन के हाथों युद्ध में मारा गया। इस तरह 1194 ईसवी में बनारस का साम्राज्‍य तकरीबन चकनाचूर हो गया, हालांकि अगले तीन-चार साल तक जयचंद्र के बेटे हरिश्‍चंद्र का बनारस के आसपास थोड़ा-मोड़ा वैभव बचा रहा।