जिक्र कलकत्ते का हो या बनारस का, दिल पे हाय हाय नुमा तीर लग ही जाता है। फिर कलकत्ते में बैठकर बनारस की बातें करना, वो भी उस्ताद के ठिकाने पर, आय हाय! बनारस वाली गाड़ी की याद हो आई।
जिस दिन देश में इमरजेंसी लगाई गई थी उससे कोई तीन माह पहले बनारस के लोगों को एक तोहफा मिला था। दिल्ली तक पहली सीधी रेलगाड़ी चलाई गई थी। नाम था काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस। भला हो पंडित कमलापति त्रिपाठी का कि उनके रेलवे मंत्री रहते हुए बनारस को ये सौगात मिली। हर कोई चाहता है कि घर जाने के लिए सीधी सवारी हो। पंडित जी भी यही चाहते थे। उनका निजी सैलून तक इसी गाड़ी में हुआ करता था। बनारस के लोग इसे काशी का गौरव कहते नहीं अघाते थे। तब किसी के पास दिल्ली से बनारस अप डाउन सत्रह सत्रह घंटे के सब्र की कोई कमी नहीं थी।
पचास साल हो गए इस बात को। अब तो सामने वंदे भारत और तेजस हैं। पंडित जी की आत्मा कलपती होगी जहां कहीं भी होगी- बनारस का हाल देख के तो अलग ही बात है, अपनी चलाई गाड़ी के प्रति बनारस के लोगों की उपेक्षा का प्रश्न ज्यादा गहरा है। एक श्रीवास्तव जी का परिवार इसी गाड़ी से बनारस जा रहा था होली के पहले और रस्ते भर श्रीवास्तव जी और उनकी बिटिया इस बात पर कलप रहे थे कि काश गरीब रथ या शिवगंगा में टिकट मिल जाता तो थोड़ा जल्दी पहुंच जाते। श्रीवास्तव जी की पत्नी इस कलपने का शिकार बन जा रही थीं रह रह के। जब जब उनको नींद आ रही थी उनके पतिदेव ताना मार रहे थे कि देखिए, असली समय और किराया तो यही वसूल रही हैं सो के। उन्होंने वंदे भारत का अफसोस नहीं जताया जिससे ऐसा लगा कि वे उसमें प्रायः चलने वाले तबके के आदमी नहीं होंगे।
काशी विश्वनाथ में ज्यादातर लोग उस दिन हर दिन की तरह बनारस और आसपास के ही थे। सबके चेहरे पर और बातों में इस गाड़ी से चलने की मजबूरी थी, जिसमें एक अजीब सी प्रशंसा भी भरी हुई थी कि कहीं मिले न मिले, कासी बिसनाथ में तो टिकटवा मिल ही जाता है। श्रीवास्तव जी को इस पर भी ऐतराज था। उनका कहना था कि टिकट तो गरीब रथ में भी मिल जाता है, ऐसे क्या!
मजबूरी, अफसोस और ऐतराज के बीच सबको एक बात का सुकून था कि चलो, जितने भी लोग हैं सब बनरसे के हैं। ये एक अदृश्य सा भरोसा था जिसमें किसी पराये के बगल में होने के प्रति शायद डर, संदेह या ऐसा ही कुछ शामिल रहा हो। कुछ देर पहले ही जब परिवार दिल्ली में घूमने के अपने अनुभवों पर बात कर रहा था तब श्रीवास्तव जी की बिटिया ने उनसे पूछा कि पापा, इंडिया गेट पर इतने मुसलमान क्यों थे। बाप ने इस सवाल को उड़ा दिया बस ये कह के- बै! बिटिया बड़ी है, उसने चुप होने से पहले मद्धम स्वर में जाने किसको संबोधित टिप्पणी हवा में कर दी- लेकिन इन लोगों का नेटवर्क बहुत तगड़ा है न!
श्रीवास्तव जी पुराने मिजाज के आदमी हैं। सत्ताईस साल अपनी जिंदगी के उन्होंने सहारा इंडिया को दे दिए। जब बेटी बड़ी हुई और उसकी पढ़ाई लिखाई के लिए सहारे का असली समय आया, कंपनी डूब गई और मालिकान जेल चले गए। लंबा तजुर्बा था, तो अभी भी काम आ रहा है और जिंदगी फुटकर कामों से चल जा रही है। साल भर में बेटी की नौकरी लग जाएगी तो शायद राहत रहे। फिलहाल, दो दिन दिल्ली रह कर लौट रहे हैं और उनकी बात में रह रह कर ‘दिल्ली की हवा’ और ‘जमाना बदल गया’ जैसे टुकड़े गिर रहे हैं।
उनको पंडित कमलापति त्रिपाठी बराबर याद हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने नाम लिया बाकायदे और कहा कि ये गाड़ी तो वही चलवाए थे। फिर सांस छोड़ते हुए बोले कि भाई जमाना बदल गया है, अब किसी के पास टाइम कहां कि इससे चले, लेकिन ठीक है, मिल तो जा रहा है कम से कम। बिटिया ने टोका- आज मेट्रो से आए होते तो ट्रेन छूटने की नौबत नहीं आती। इनको ऑटो से आने की पड़ी थी। वो तो हम लोग किसी तरह पहुंच गए। बाप ने हिकारत से देखते हुए फिर इस बात को एक शब्द में उड़ा दिया- बै!

उनकी चिंता दूसरी थी। वो ऑटोवाले से इसलिए खफा थे कि उसने स्टेशन के अंदर आने के पैंतीस रुपए अलग से ले लिए थे। बेटी का कहना था क्या तीस पैंतीस रुपया, इससे तो सस्ती मेट्रो ही होती। अरे यार, डायरेक्ट नहीं है कोई मेट्रो बदरपुर से.. बेकार का बात! श्रीवास्तव जी झल्ला गए थे मेट्रो मेट्रो सुन के। लड़की ने फिर जवाब दिया, सेंट्रल सेक्टेरियट से बदलते हैं, दो ट्रेन लेना होता है बस। दोनों की बात पर अब तक बराबर सिर हिला रही उसकी मां ने तिरछी नजर से मुस्कुराते हुए तीर मारा- सब जान गई हैं दिल्ली के बार में एक ही दिन में। इसके बाद थोड़ा तनाव सा हो गया।
ऊपर वाली बर्थ पर इंटर में पढ़ने जैसा दिखने वाला एक छरहरा लड़का था। उसका फोन बजा। उसने उठाते ही कहा जय हिंद सर। फोन रखने के बाद हुई बातचीत में बताने लगा कि सेना की तैयारी कर रहा है दिल्ली में रह के। सेना की भी तैयारी होती है? हम लोग तो दौड़ते थे बस। अरे अंकल, इंस्टीट्यूट चलता है। उसमें पढ़ाई भी होती है। ओह… इसीलिए जय हिंद बोले थे क्या? मां बाप को भी जय हिंद बोलते हो? नहीं, नहीं। वो तो मेरे सर थे। घर में थोड़े…
अच्छा… मने कौन सी पढ़ाई? इंटर का सिलेबस चल रहा है। एनडीए का फॉर्म भर दिए हैं। बस, हो जाएगा तो चले जाएंगे। उसके बाद? फिर क्या, युद्ध करेंगे। काहे भाई? बेमतलब? लड़का तेज था तर्क में। बोला, बंदूक है तो उसका इस्तेमाल भी होते रहना चाहिए। युद्ध तो जरूरी है न! लड़की की इस बात में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखी। उसकी मां ने पूछा, आप बनारस में कहां से? लड़के ने उत्साह से बताया, मैं बनारस नहीं अयोध्या से हूं, बनारस तो भैया भाभी के पास जा रहा हूं। उसकी आंखों में चमक थी।
लेकिन गजब हुआ भाई साहब अयोध्या में भी अबकी, समझे नहीं आया क्या हुआ। लड़के की बात बीच में ही कट गई। श्रीवास्तव जी ने अयोध्या को लपक लिया। बताइए, मंदिर बनवा कर भी जीत नहीं पाए। आखिर हुआ क्या? लड़के ने ऊपर से मुंडी बाहर निकालते हुए कहा, अंकल अंदर की कहानी है। मैं पॉलिटिक्स पर बात नहीं करता, लेकिन खेल हुआ है। मैं वहीं का हूं, जानता हूं। बाकी, मंदिर तो बहुत भव्य बना है। योगी मोदी नहीं बनवाते तो ऐसा स्वरूप निकल के नहीं आता। इस पर श्रीवास्तव जी कुछ नहीं बोले। उनकी बिटिया ने चुपके से बाप से कहा, लगता है भैया भाजपाई हैं! बै…
बगल में साइड वाली सीट पर सास बहू और पांच साल का बच्चा बैठे थे। बहू लगातार गांव को याद कर रही थी। उसको दिल्ली की हवा पानी से शिकायत थी। बच्चा रह रह के सूखी खांसी खास रहा था और पानी वाले पैकेट में बंद चिप्स, केक आदि बदल बदल के खाए जा रहा था। श्रीवास्तव जी बच्चे की खांसी पर टिप्पणी कर दिए थे, उसी से बात चालू हो गई थी। अब बनारस में भी कहां कुछ बचा? सब तोड़ ताड़ दिया, भीड़ इतना है कि हम लोग बाबा विश्वनाथ का दर्शन ही नहीं कर पाते। अरे पापा, इंदौर में जो गंदे पानी से लोग मर गए वो? लड़की बोली। श्रीवास्तव जी ने याद दिलाया कि इंदौर तो सबसे स्वच्छ शहर था। इतने में फौजी कट छात्र नीचे उतर आया और बताने लगा कि ये सब तो हर जगह है अंकल, अपने अनुशासन और समझदारी का मामला है। आप देखो मैं दिल्ली में हूं लेकिन शान सात बजे के पहले घर में घुस जाता हूं, बहुत डर लगता है। सेफ्टी नहीं है।
लेकिन दिल्ली में जो लड़कियां सिगरेट पीती हैं वो कितना खराब है बताओ! अचानक इस बात को कहते हुए श्रीवास्तव जी की बेटी बहुत चिंतित दिखी। बताने लगी कि बीएचयू में वो एक लड़की को कन्वोकेशन से पहले साड़ी पहने हुए सिगरेट पीते देखी थी, कितना खराब लगा था। बताइए, कोई इज्जत और सम्मान ही नहीं है विद्या का! हां, लड़कियों को नहीं पीना चाहिए सिगरेट, लड़के ने कहा।
जमाना बदल रहा है भाई, श्रीवास्तव जी बोले। अब मां बाप इंटर तक ही तो बच्चों को सम्भाल सकते हैं। बाहर जा के बच्चे कहां उठ बैठ रहे हैं, क्या कर रहे हैं कौन जाने। मेरी फैमिली में भाई साहब सन छिहत्तर में इंटरकास्ट शादी हुई थी, वो पहली थी। लड़की मीणा थी। दोनों अफसर। वैसे, मीणा बहुत काबिल होते हैं, पता नहीं क्या बात है। खैर, उन दोनों का जीवन बढ़िया चला। हम लोग इसके खिलाफ थोड़े हैं, लड़की अगर किसी को चुन ले दूसरी कास्ट से तो शादी करवाना ही पड़ेगा। बस समस्या ये है कि अपनी जाति के लोग अब खत्म होते जा रहे हैं हर जगह से। ट्रांसफर वाला जो लिस्ट आता है अधिकारियों का उठा के देख लीजिए, पचास में सत्रह मीणा दिखेंगे, और श्रीवास्तव? हा हा… पचास सीट है उसमें जनरल और उसमें भी श्रीवास्तव, कहां जगह है, बताइए! अपने ही मेहनत कर के आदमी कुछ कर ले तो कर ले, नहीं तो हम लोगों के लिए कहां कुछ बचा है।
पापा की यही बात हमको अच्छी नहीं लगती, हर समय अपनी कास्ट की बात करते रहते हैं, लड़की ने ऐतराज किया। पिता थोड़ा बिदके- जो सच्चाई है वो तो है, तुम लोग के पास प्राइवेट में पढ़ने के अलावा क्या रास्ता है बताओ? लड़की उखड़ गई- तो प्राइवेट में अच्छी पढ़ाई भी तो होती है। आप ही बताइए, आप लोग के टाइम बीएचयू में कोई प्रोफेसर पढ़ाता था क्या? और अब तो इतनी क्वालिटी गिर गई है। केवल मुहर का नाम रह गया है। इसलिए कोटा वोटा वाली बात ठीक नहीं। कास्ट से कुछ नहीं होता। जिसको पढ़ना है प्राइवेट में पढ़े। हां, बस हमको आग किसी से दिक्कत है तो वो मुसलमान से है। भगवान बचाए… हम तो बस दूर से ही…। है न पापा! श्रीवास्तव जी एकदम से चुप मार गए। उनकी पत्नी अब भी सो रही थीं। लड़का बिना कुछ बोले मुस्कुराते हुए उठ के अपनी छरहरी देह सीधी करने लगा। साइड वाली सीट पर रील देख रही बहू के मोबाइल से अचानक एक आवाज चीखी, फ़ाह…। केक कुतर रहा उसका बच्चा घबरा कर सूखी खांसी खांसने लगा।
