दुनिया 200 साल बाद

दो सौ साल बाद 37, अमड़ातला गली की तलाश…

चायपत्ती वाले का कहना था कि इमारत पहले किसी मुसलमान की थी जिससे चायपत्ती वाले मारवाड़ी ने खरीद कर जमींदोज कर दिया और नई बनवाई। कौन जाने उस मुसलमान ने भी किसी और से न खरीदी रही हो। जो पता इतिहास में ‘अमड़ातला की गली 37 अंक’ के नाम से दर्ज हो ही चुका है, वहां 27 मकानों के बीच 37वां खोजना वैसे भी बेवकूफी ही होती। क्‍या करते हम मालिक से मिल के!

Continue Reading →
1826 के झरोखे से

हिंदुस्तानियों के हित के हेत : इस कागज के प्रकाशक का इश्तेहार

सब लोग पराये सुख सुखी होते हैं जैसे पराए धन धनी होना ओ अपनी रहते पराई आंख देखना वैसे ही जिस गुणमें जिसकी पैठ न हो उसको उसके रसका स्‍वाद मिलना कठिन ही है और हिंदुस्‍तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं कि पराई चाल देखकर अपनी यहां तक भुले हैं कि परायोंमें जो बुद्धिमन्‍त है वे अपनी तो बनी बनाइ है पर पराई पर भले बुरेका वराव करने का वाना बान्‍धते हैं

Continue Reading →