दो सौ साल बाद 37, अमड़ातला गली की तलाश…
चायपत्ती वाले का कहना था कि इमारत पहले किसी मुसलमान की थी जिससे चायपत्ती वाले मारवाड़ी ने खरीद कर जमींदोज कर दिया और नई बनवाई। कौन जाने उस मुसलमान ने भी किसी और से न खरीदी रही हो। जो पता इतिहास में ‘अमड़ातला की गली 37 अंक’ के नाम से दर्ज हो ही चुका है, वहां 27 मकानों के बीच 37वां खोजना वैसे भी बेवकूफी ही होती। क्या करते हम मालिक से मिल के!
