अवध में लॉर्ड एमहर्स्ट के ठाट बाट से हुए स्वागत के विवरण से पता चलता है कि तहजीब के मामले में अवध के नवाब कोई कसर नहीं रखते थे, भले ही सामने दुश्मन क्यों न हो। फिर, अवध की बादशाहत तो अंग्रेजों के सौ साल पुराने अहदनामे से बंधी हुई थी ही। बावजूद इसके, अवध के नवाबों को अहद से विश्वासघात पसंद नहीं था। इसीलिए जो गंगा नदी 1826 में एमहर्स्ट को कलकत्ते से अवध ले गई, वही तीस साल बाद अवध से नवाब वाजिद अली शाह के कलकत्ते में निर्वासन का सबब बनी।
कलकत्ते में वाजिद अली शाह की खुशबू लेनी हो तो मटियाबुर्ज जाना चाहिए, जहां नवाब ने अपने आखिरी साल बिताए और शहर के भीतर एक छोटा सा अदद लखनऊ बसा डाला। आज भी यहां आप किसी से दो बात कर लें तो भूल जाएंगे कि बंगाल में हैं। वाजिद अली शाह के बनवाये यहां के सिब्तैनाबाद इमामबाड़े में कोई पांच साल से काम कर रहे अली अख्तर आबदी से बात कर के लगता है कि बंदा लखनऊ का होगा। पूछने पर वे कहते हैं, “तालीम का फर्क है हुजूर! हम यहीं कलकत्ते में पैदा हुए, लेकिन हमें सुनकर लोग कहते हैं कि लखनऊ का होगा, इलाहाबाद का होगा। ये तालीम से आया है। हम ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं।”
ये दो बातें एक साथ, तालीम का होना और ज्यादा पढ़ा लिखा न होना, इसी को अंग्रेज समझ नहीं पाए जब वाजिद अली शाह ने अपना ताज सिर से उतार कर जनरल ओटरम के सुपुर्द कर दिया, लेकिन नए अहदनामे पर दस्तखत नहीं कर के दिया। उनका कहना था कि ताज दे सकते हैं, सिर नहीं। उनकी ऐसी विरोधाभासी शख़्सियत को समझ पाना अंग्रेजों के बस में था भी नहीं, कि कोई शख़्स बादशाह होते हुए भी बादशाहत से गाफिल कैसे हो सकता है- ऐसी रहस्यमय बादशाहत, कि लखनऊ से निकाला गया तो उसने जहां गया वहीं लखनऊ बसा दिया!
मटियाबुर्ज की मुख्य सड़क पर कलकत्ता नगर निगम का बस स्टैंड अब भी वाजिद अली शाह के नाम पर है, बेशक उसके ऊपर शुभेंदु अधिकारी की होर्डिंग लग चुकी है। उन्हीं के इमामबाड़े में उनकी कब्र है। ताजिये हैं। पर छत का हाल बुरा है। अख्तर साहब बताते हैं कि कभी भी छत गिर सकती है। काम चल रहा है। मरम्मत का काम नगर निगम ही करवा रहा है। सिब्तैनाबाद ट्रस्ट ने भी कुछ साल पहले यहां की रंगत दुरुस्त करने में दिलचस्पी लेनी शुरू की, जब चार साल पहले वाजिद अली शाह का दो सौवां जन्मवर्ष मनाया गया। इसीलिए मुहर्रम के दौरान आजकल इसके भीतर जाने पर पाबंदी लगी हुई है।
बाहर से ही आली जान के दर्शन होते हैं। उनके कमरे और तख्त की झलक मिल पाती है। मटियाबुर्ज में टहलते हुए आपको गैर महसूस नहीं होता। यहां का आदमी आपको किसी नजर से नहीं देखता। किसी अनजान मुसाफिर को भटकता देख खुद औरतें बता देती हैं कि रास्ता कहां है। सड़क पर लगी खाने पीने की दुकानें लखनऊ के वजीरगंज और अमीनाबाद की गलियों की याद दिलाती हैं। कबाब, गोश्त, चाय, और तरह तरह की पुरानी दुकानों के बीच अजय हींग कचौड़ी वाला समौसे और चना चूर बेच रहा है। बार बार उसके पास ग्राहक आकर कचौड़ी मांग रहे हैं। सबको वो एक ही जवाब देता है, ‘कचौड़ी नमाज के बाद मिलेगी!’ लहजे से वो भी अवध का ही लगता है। मांगने वाले भी। बेशक वे न हों।
कुछ होने और वह न होने, कुछ दिखने और कुछ और होने के बीच की यह दुविधा ऐसी है कि आप एकबारगी खुद को नवाब के सामने पेश हुए जनरल ओटरम वाली उलझन में फंसा पाएंगे। मसलन, एक सज्जन यहां के गाड़ी चलाते हैं। मूल रूप से राजस्थान के अलवर से हैं। बीस साल से यहीं हैं। अब अपने मां बाप को भी यहीं ले आए हैं। कहते हैं कि गांव में कोई जमीन या खेती नहीं है, जो है सब यहीं है। हां, बीवी राजस्थान की ही है क्योंकि बंगाली औरत से उन्हें कभी प्रेम नहीं हुआ। नहीं हुआ तो अच्छा ही हुआ, ऐसा कहने के पीछे की उनकी अपनी एक खास वजह है जो उनके अनुभव से निकली है। जबान उनकी भी यूपी वाली ही है।
वे बताते हैं कि राजस्थान से हजारों राजपूत यहां आ के बसे हैं। इसको भी कोई सौ एक साल हो रहा है। फिर वे बताने लग जाते हैं कि कैसे उन्होंने आज तक मछली नहीं खायी लेकिन बिरयानी बिला नागा रोज़ खाते हैं। सुबह डाल बाटी चूरमा नाश्ते में लेते हैं। ये शहर वाले क्या जानें खाना क्या होता है! ऐसा कहते हुए उनकी जबान थोड़ी बिहारी, थोड़ी लिंगनिरपेक्ष बंगाली, थोड़ी खड़ीवाली राजस्थानी का मिश्रण लगती है। ऐसी जबान कलकत्ते का आदमी तो नहीं बोलता।
क्या नाम है आपका? हमने पूछा। ओरिजिनल बताएं या नकली? उन्होंने पूछा। अब नाम में क्या ही असली नकली हो सकता था भला! अरे, असली ही बताइए, नकली क्या होता है! उन्होंने एक के बाद अपने दो नाम बताए। दोनों में कोई तुक नहीं थी। कोई रिश्ता नहीं। थोड़ी देर पहले किसी का फोन आया था, उस पर उन्होंने दूरी तरफ वाले से बेसाख्ता कहा था- अरे बोल देना गुड्डू भाई ने कहा था, अल्लाह का करम है! ये एक तीसरा नाम था जो उन्होंने खुद से नहीं बताया, बस हमने सुन लिया था। हां, अल्लाह के हवाले से देखें, तो इसमें उनका बताया एक नाम बेशक फिट होता था। पर दूसरा? कोई नहीं, गुड्डू भाई ही ठीक है याद रखने के लिए।
आखिर मटियाबुर्ज को भी तो लोग मटियाबुरुज कहते हैं और सरकारी बसों पर मटियाब्रुज लिखा रहता है। क्या फर्क पड़ जाता है? अय्यारों, फनकारों और पॉकेटमारों की इस धरती पर कुछ होने और वह न होने के बीच इतनी अर्थछवियां कैद हैं जिसे समझना डलहौज़ी से लेकर एमहर्स्ट तक किसी के लिए भी मुमकिन नहीं, चाहे वे भारत के कितने ही दौरे कर लेते।
इसीलिए, अंग्रेज चले गए पर वाजिद अली शाह दिलों से लेकर इमारतों में हमेशा के लिए बस गए।
