दुनिया 200 साल बाद

राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!

बड़ी उहापोह है कि पहले समाचार लिखा जाए या उसकी टीका! दरअसल, कभी-कभार ऐसा होता है कि जो सूचना देखने में सामान्‍य लगती है वह उपयुक्‍त परिप्रेक्ष्‍य में रखे जाने पर असामान्‍य बन जाती है। कभी ऐसा भी होता है कि जो बात सतह पर असामान्‍य लग के चौंकाती है वह संदर्भयुक्‍त व्‍याख्‍या से अतिसामान्‍य सिद्ध हो जाती है। जैसे, दस दिन पहले दिल्‍ली में हिंदी साहित्य के वयोवृद्ध कवि अशोक वाजपेयी का हथियारों के एक सौदागर के हाथों सम्‍मान लेना!

तमाम लोग श्रीकांत वर्मा सम्‍मान आयोजन पर अब तक चौंके हुए हैं कि जाने क्‍या हो गया, पर हमने तो भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र के जमाने से चली आ रही सम्‍मान-रीत के परिप्रेक्ष्‍य से ही समझ लिया था कि यह हिंदीवालों का औसत स्‍वभाव है। वे सम्‍मान आदि लेने-देने के लिए कहीं भी, कितना भी, गिर पड़ सकते हैं। कुछ ऐसी ही दृढ़ राय भारतेन्‍दु ने अपने समय में काशीवासियों के बारे में बना रखी थी, जिसे ‘देखी तुमरी कासी’ में पढ़ा जा सकता है। काशी की उनकी इस महानिंदा में एक ईमानदारी जरूर रही कि वे अपने जैसे अमीरों को कम से कम झूठा तो मानते थे। ये चार पंक्तियां देखिए:

लोग निकम्मे भंगी गंजड़ लुच्चे बे-बिसवासी
महा आलसी झूठे शुहदे बे-फिकरे बदमासी…
अमीर सब झूठे और निंदक करें घात विश्वासी
सिपारसी डरपुकने सिट्टई बोलैं बात अकासी…।

काशी के लोगों के बारे में उनकी जैसी सामान्‍य राय अपने जीवन में बनी, कालान्‍तर में उसे सबसे पहले तोड़ने वाले उनके परिवार के ही करीबी राय साहब लोग रहे (मोदीमार्गी राय साहब नहीं, वो तो गाजीपुर के हैं)। काशी की ‘सामान्‍यता में असामान्‍य’ की चमक बिखेरने वालों की आरंभिक फेहरिस्‍त में राय कृष्‍णदास एक बड़े नामी शख्सियत रहे, जिनके अवदान के बगैर भारतेन्‍दु, आधुनिक हिंदी या समकालीन काशी पर बात नहीं हो सकती। इन्‍हीं राय साहब ने अपने खर्चे से भारत कला भवन की नींव 1920 में रखी थी, जो 1926 में यानी आज से सौ साल पहले सेंट्रल हिंदू स्‍कूल के परिसर में आया और नागरी प्रचारिणी सभा के परिसर से होते हुए अंतत: साठ के दशक में काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय का अंग बना, जब नेहरूजी ने नए भवन का उद्घाटन किया।


बनारस का भुला दिया गया मनीषी जिसने ज्ञान को सहेजना सिखाया


जरा ठहर कर इस भवन की सुदीर्घ बौद्धिक परंपरा को देखिए- भारत कला भवन के पहले अध्‍यक्ष रहे गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर, तो आज भारत कला भवन के अध्‍यक्ष भौतिकीविद् श्रीरूप रायचौधरी भी एक बंगाली विद्वान हैं; पीछे जाकर देखिए तो भारतेन्‍दु की पैतृक जड़ें बंगाल में ही मिलती हैं; बाकी, गुरुदेव से लेकर अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, शैलेन्द्र नाथ डे, नंदलाल बोस, अज्ञेयजी, केपी जायसवाल और मैथिलीशरण गुप्‍त जैसी विभूतियां राय कृष्णदास के बीएचयू स्थित ‘सीता निवास’ में आकर ठहरती थीं।

त्रासद है कि महज तीन महीने पहले नब्‍बे साल पुराने इस निवास को तोड़ दिया गया। काशी की कला और विद्वत परंपरा का वह स्‍तंभ विकास की आंधी में ढह गया, जिसके चूने-गारे में राष्‍ट्रीय स्‍मृतियां पैबस्‍त थीं। हां, राय साहब का भारत कला भवन अब भी बचा हुआ है और हर साल उनकी स्‍मृति में व्‍याख्‍यान करवाता है। अबकी इक्‍कीसवां राय कृष्‍णदास व्‍याख्‍यान हुआ 25 सितम्‍बर को। इस सप्‍ताह का समाचार इसी आयोजन में छुपा है।



बीते शुक्रवार को भारत कला भवन में 21वें राय कृष्‍णदास व्‍याख्‍यान के साथ एक प्रागैतिहासिक वीथिका का उद्घाटन हुआ। एक किताब का लोकार्पण भी हुआ। इस आयोजन के बीच एक और घटना हुई। घटना यह थी कि बनारस में रहने वाले एक मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने अपने तीन अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मान भवन को दान कर दिए। भवन की ओर से जारी एक पन्‍ने और ग्‍यारह पैरा की प्रेस विज्ञप्ति में इसकी सूचना महज चार पंक्तियों के एक पैरा में समेट दी गई।

ध्‍यान देने की बात है कि डॉ. रघुवंशी की उम्र अभी साठ बरस भी नहीं हुई है। अतीत में हमने जिन मुट्ठी भर लोगों को अपने पुरस्‍कार और सम्‍मान संग्रहालयों को देते हुए सुना है, वे सब के सब वयोवृद्ध हैं या मरणोपरान्‍त उनके परिवारों ने ऐसा किया था। यदि कैलाश सत्‍यार्थी को छोड़ दें जो दुनिया का सबसे बड़ा सम्‍मान नोबेल पुरस्‍कार राष्‍ट्रपति को समर्पित कर चुके हैं (और ऐसा करते वक्‍त वे साठ पार हो ही चुके थे), तो समाज सेवा के क्षेत्र में बाबा आम्‍टे और पालम कल्‍याणसुंदरम ही ऐसे दो व्‍यक्ति मिलते हैं जिन्‍होंने अपने सम्‍मान सार्वजनिक संस्‍था में संरक्षित करवाए। इन दोनों ने भी सम्‍मान दान करने के लिए अपनी बनाई संस्‍थाएं ही चुनीं, कोई सरकारी संग्रहालय नहीं। बाकी, खेल से लेकर सेना, शिक्षा और राजनीति तक ऐसे बहुतेरे व्‍यक्तित्‍व मिल जाएंगे, लेकिन मानवाधिकार?

अव्‍वल तो मानवाधिकारों के क्षेत्र में अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार व सम्‍मान पाने वाले भारत में कम से कम दर्जन भर लोग हैं। ज्‍यादा भी हो सकते हैं। डॉ. लेनिन इनमें सबसे वंचित समुदाय मुसहरों के बीच काम करते हैं। इससे उनका दायरा और छोटा हो जाता है। फिर, वे काशीवासी हैं। न दिल्‍ली, न बंबई। अब इस जगह से कैलाश सत्‍यार्थी या अरविंद केजरीवाल या अशोक वाजपेयी या किसी और बड़े नाम की तुलना कर के देखिए! जो अंतर समझ आएगा, वही वह ‘असामान्‍य’ है जो भारतेन्‍दु की दिखायी-समझायी काशी की सामान्‍य छवि के बीच अचानक चमक उठता है।           

इस बात को थोड़ा परंपरा और थोड़ा वर्तमान दोनों के परिप्रेक्ष्‍य में समझा जाय। लेनिन रघुवंशी को दक्षिण कोरिया, जर्मनी और फ्रांस से मिले तीन अंतरराष्‍ट्रीय मानवाधिकार पुरस्‍कार अब भारत कला भवन का हिस्‍सा हैं। इसका वास्‍तविक मतलब क्‍या है? उन्‍हीं के शब्‍दों में:

इन सम्मानों को सार्वजनिक धरोहर के रूप में समर्पित करने का निर्णय इस समझ पर आधारित है कि मानवाधिकार क्षेत्र में मिलने वाला सम्मान केवल किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं होता। इन सम्मानों के पीछे वे लोग हैं जिन्होंने अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई; जिन परिवारों ने न्याय के लिए संघर्ष किया; जिन महिलाओं ने सामाजिक और पारिवारिक दबाव के बावजूद अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई; वे बच्चे और समुदाय जिनका जीवन गरीबी, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार से प्रभावित रहा; तथा वे मानवाधिकार रक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और सहयोगी जिन्होंने संघर्ष को निरंतर आगे बढ़ाया। इसलिए इन पदकों का सार्वजनिक संरक्षण वास्तव में उन संघर्षों की सामूहिक स्मृति का संरक्षण है।

और आगे इस सूत्रीकरण को देखिए, जो डॉ. लेनिन की संस्‍था मानवाधिकार जन निगरानी समिति की सांगठनिक समझदारी है:

इस समर्पण में भारत कला भवन की मूल भावना और मानवाधिकार संघर्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध दिखाई देता है। राय कृष्णदास ने भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण स्मृतियों को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया। उसी व्यापक भावना में डॉ. लेनिन रघुवंशी ने मानवाधिकार संघर्ष से जुड़े अपने महत्वपूर्ण सम्मानों को सार्वजनिक संरक्षण के लिए समर्पित किया है। एक ओर कला और संस्कृति की विरासत है, दूसरी ओर मानव गरिमा और न्याय के लिए संघर्ष की विरासत। दोनों ही हमें यह संदेश देते हैं कि समाज की महत्वपूर्ण स्मृतियों को समय के साथ खोने नहीं देना चाहिए।

काश! यही समझदारी सीता भवन को तोड़ते वक्‍त काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय के प्रशासन की रही होती, बहरहाल… 



मानवाधिकार जन निगरानी समिति की विज्ञप्ति में जिसे ‘भारत कला भवन की मूल भावना’ कहा गया है, वह राय कृष्‍णदास का रोपा हुआ बीज था जिसे सौ साल में गुरुदेव से लेकर मालवीयजी, अज्ञेयजी और सैकड़ों मनीषियों ने सींचा है। उसी से एक बौद्धिक परंपरा बनी है और उस परंपराबोध से उपजा है वह आत्‍मबोध, जिसे डॉ. लेनिन अपने तीन स्‍पष्‍ट सूत्रों में रखते हैं: ‘व्यक्ति से समाज तक, सम्मान से स्मृति तक, और स्मृति से विरासत तक’। अपने जीवन के ठीकठाक सक्रिय वर्षों में इस सूत्र को खुलकर जी लेने का साहस क्‍या कोई साधारण बात है?

अब वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में सोचा जाए- क्‍या यह समाचार सामान्‍य है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार एक विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय को दे‍ दिए, अपने घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में 85 बरस के एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्‍मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्‍मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था। और तकरीबन उसी वय के शिक्षक, समीक्षक, चित्रकार और कहानीकार लोग घोषित आपराधिक अतीत वाले एक हथियार तस्‍कर के पारिवारिक मंच पर नतमस्‍तक थे।

एक और विपर्यय देखिए। काशी, जो खुद में शाश्‍वत अविमुक्‍त है और इस मायने में धरा पर असामान्‍य है, वह भारतेन्‍दु के यहां सामान्‍य ‘कासी’ बन जाती है जिसकी समझौतावादी विरासत हमें दिल्‍ली में अशोक वाजपेयी तक खिंचती दिखाई देती है। डेढ़ सौ साल की इस सामान्‍यता के भीतर हालांकि राय कृष्‍णदास से होते हुए लेनिन तक चली आई सामाजिक-बौद्धिक हस्‍तक्षेपों की एक अनगढ़ परंपरा भी है जो काशी की असामान्‍यता को रह-रह कर प्रकाशित करती है।  

इन्‍हीं विपर्ययों से उपजे तनाव में सामान्‍य-सी दिखने वाली एक कार्रवाई असामान्‍य बनकर उभर उठती है- जिस तरह चौतरफा हिंसाओं के बीच गांधी की करुणा चमकती हो, जैसे अंधेरे के बीच बुद्ध का दीप, जैसे लुटेरों के बीच एक अंगुलीमाल! या फिर, जैसे भारतेन्‍दु की ‘कासी’ के बीच ‘काशी’!

यहीं एक अमेरिकी दार्शनिक बड़े मौजूं हो उठते हैं- स्‍टैनली कावेल, जिनका आठ साल पहले निधन हुआ था और बीते 1 सितम्‍बर को ही वे सौ साल के पूरे हुए हैं। सब बड़े लोगों की जन्‍मशती सब लोगों को याद रहती है। अफसोस, कि कावेल की जन्‍मशती बौद्धिक जगत में बहुतों को याद नहीं रही गोकि वे उतने भी साधारण बौद्धिक भी नहीं थे। उनकी लिखी दो पंक्तियां 25 सितम्‍बर, 2026 को बनारस के भारत कला भवन में घटी एक सामान्‍य-सी लगने वाली घटना की असामान्‍यता को समझने में, और ऐसी ही सैकड़ों दैनंदिन चीजों के महत्त्व को समझने में कारगर हो सकती हैं:    

जिसे हम साधारण मान लेते हैं, उसकी असाधारणता हमारे समक्ष तब तक नहीं खुलती जब तक कि ठीक उसी समय हम असाधारण लगने वाली चीजों की साधारणता के प्रति सचेत न हों।