राय कृष्णदास की कोठी टूट गई पर काशी की परंपरा बच गई!
क्या यह समाचार सामान्य है कि बनारस के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने अपने तीन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार एक संग्रहालय को दे दिए, घर में निजी संपत्ति की तरह नहीं रखे? इसकी पिछले हफ्ते के समाचार से तुलना कर के देखिए, जब जीवन की ढलती शाम में एक बुजुर्ग नौकरशाह कवि ने महज 21 लाख रुपये के सम्मान के लिए पूरी परंपरा, विरासत, आत्मछवि और नैतिकताबोध को ताक पर रख दिया था!
