‘कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, दिल्ली का मौसम बदलने वाला है। 1 नवंबर को मिलते हैं’ – नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को अपने वॉट्सएप चैनल पर जारी किए एक वीडियो के नीचे यह कैप्शन लगाया। उसी रात दिल्ली के मौसम ने अचानक करवट ली। आधी रात बादल गरजे, जबरदस्त बिजली कड़की, और दूसरे दिन जमकर पानी बरसता रहा। दिल्लीवालों ने स्वेटर निकालने की तैयारी कर ही ली थी, कि अगले दिन दोबारा धूप खिल गई। महज चौबीस घंटे के लिए बदले मौसम के निशान अब भी रामलीला मैदान में पानी भरे गड्ढों और कीचड़ की शक्ल में बाकी हैं, जहां से ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ का नारा बुलंद हुआ है।
क्या वोट बचने से देश बच जाता है? बड़े जज रहे मार्कण्डेय काटजू ने यह बात बड़े विस्तार से पूछी है। यह कठिन सवाल है। उस दिन विजयादशमी पर सरसंघचालक मोहन भागवत भी ऐसा ही कुछ कह रहे थे, कि सरकार बदलने से परिस्थितियां नहीं बदलती हैं। फिर भी, अगर आपको सरकार बदलनी ही है तो उसके लिए ढाई साल का वक्त शेष है ही लोकसभा चुनाव में। फिर, क्या यह शर्म की बात नहीं होनी चाहिए कि विपक्ष के निर्वाचित प्रतिनिधियों को आधे रास्ते ‘मॉक’ संसद लगानी पड़ रही है? यह काम तो स्कूली बालक और छात्र-युवा करते थे कभी, ताकि संसदीय कार्यवाही और लोकतांत्रिक पद्धतियों की झलक पा सकें। ‘जनता की अदालत’ तो नक्सली लगाते थे कभी, जिनकी आस्था लोकतांत्रिक संस्थाओं में नहीं थी। यह काम संसदीय पार्टियां क्योंकर करने लगीं?
क्या सरकार बदलने और इंसाफ दिलवाने के संस्थागत दरवाजे संसदीय दलों के लिए वाकई बंद हो चुके हैं? हो सकता है राहुल गांधी को ऐसा लग रहा हो कि अब बदलाव सड़क से ही आएगा। इस अहसास पर कोई नीति-निर्णय देना नहीं बनता। जब सत्ता दाएं भागती है तो ठहरे हुए मध्यमार्गी भी बाएं चलते दिखते हैं। बैठे-बिठाये बाएं चलता दिखने में किसी को क्या दिक्कत! हां, वाकई बाएं जाने में थोड़ी समस्या है। वाममार्गी होने में फिसलनें दरअसल बहुत हैं। कदम-कदम पर फूंक के पैर रखना होता है वरना भले से भला क्रांतिकारी भी संदिग्ध हो जाता है। मसलन, राहुल गांधी, जिन्होंने हाल ही में उद्योग घराने टाटा के बचाव में निर्मला सीतारमण को संबोधित कर के अपने सदिच्छाधारियों को संदेह में डाल दिया है। वे सोच रहे हैं कि वोट बचाना, देश बचाना और एक उद्योगपति को बचाना, क्या ये तीनों बातें एक साथ संभव हैं? फिर से सब धान बाईस पसेरी तौला जाएगा क्या?


मोदी और अदाणी के प्रसंग में राहुल गांधी अकसर ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ शब्द बोलते हैं। यह बात अकसर लोगों को समझ में नहीं आती। इसे समझने के लिए आइए चलते हैं टाटा के बनाये-बसाये शहर जमशेदपुर, जिसे लोग टाटा ही कहते हैं। यहां शहर और टाटा कंपनी एक-दूसरे का पर्याय हैं। एक जमाने में यहां एक कंपनी हुआ करती थी इंडियन स्टील ऐंड वायर प्रोडक्ट्स लिमिटेड। लोग इसे तार कंपनी कहा करते थे क्योंकि ये तार बनाती थी। बात कम से कम सौ साल पुरानी तो है ही, जब सरदार इंदर सिंह नाम के एक शख्स पंजाब से जमशेदपुर आए और टाटा कंपनी की मदद से उन्होंने 1920 में यहां एकदम टिस्को के बगल में अपनी तार कंपनी लगाई।
इंदर सिंह का पूरा धंधा दो चीजों पर टिका था- टाटा की मदद और पंजाबी मजदूरों का अनुशासन। उन्हें लगता था कि पंजाब से सिख मजदूर रखने पर उन्हें असंतोष नहीं झेलना पड़ेगा। वे बड़े कड़े मालिक थे। उन्होंने अपने यहां मजदूर यूनियन नहीं बनने दी थी। वे कहते थे, ‘मैं जानता हूं कि मेरे कर्मचारियों के लिए क्या भला-बुरा है। उनके हित में कोई और फैसले ले यह मैं कतई बरदाश्त नहीं करूंगा।‘ उनके इस रवैये से कभी भी मजदूरों को उनसे लगाव नहीं हो पाया। इस बीच पंजाब से 1939 में एक शख्स जमशेदपुर अचानक पहुंचा, जिसका नाम था हजारा सिंह। कहानी यहीं से बदलना शुरू हुई।
हजारा सिंह का मूल नाम बन्ता सिंह था। वे होशियारपुर के रहने वाले थे और भगत सिंह के संगठन नौजवान भारत सभा के सदस्य थे। सभा ने उन्हें कुछ क्रांतिकारी सदस्यों सहित ऊटी में एक बैंक लूटने भेजा था। लूट की रकम तो सभा के पास पहुंच गई लेकिन क्रांतिकारियों की जीप चला रहे बन्ता सिंह गिरफ्तार हो गए। उन्हें कैद हुई। रिहा होने के बाद वे पंजाब जाना चाहे, लेकिन अंग्रेज सरकार ने उन्हें सूबे में घुसने से रोक दिया। तब पुलिस के मुखबिरों की आंख में धूल झोंकने के लिए उन्हें अपना नाम हजारा सिंह रखना पड़ा था। यह वही समय था जब विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। हजारा सिंह को संगठन ने मद्रास से जमशेदपुर जाने को कह दिया। इस बीच सरदार इंदर सिंह ने अपना कमाया धन अंग्रेज सेना की सेवा में खूब लगाया। 1939-45 के बीच ‘युद्ध प्रयासों’ में योगदान के लिए इंदर सिंह को बाद में ‘सर’ की उपाधि मिली, लेकिन हजारा सिंह बहुत पहले इस दुनिया से जा चुके थे।
कहानी यह है कि मार्च 1939 में जमशेदपुर जाकर हजारा सिंह ने इंदर सिंह की तार कंपनी के मजदूरों को एकजुट किया और उनकी यूनियन बनवाई। प्रबंधन के शोषण के खिलाफ श्रम कानूनों को लागू करने की मांग के लिए 1 जुलाई, 1939 को एक भारी रैली रखी गई। वहां उन्होंने मजदूरों की आम हड़ताल का आवाहन किया। प्रबंधन ने हड़ताल को गैर-कानूनी करार दे दिया और बाहर से मजदूर लाकर मशीनें चालू रखने की रणनीति बना ली। मजदूर झुकने को तैयार नहीं थे। हजारा सिंह बोले के उनकी लाश से गुजरकर बाहरी घुसपैठिये कारखाने के भीतर जा पाएंगे। फिर पुलिस आई। बहसाबहसी हुई। दिन में दो बजे बाहरी मजदूरों को भरे एक गाड़ी कारखाने पहुंची। हजारा सिंह वहीं अपने एक साथी प्यारा सिंह के साथ लेट गए।
गाड़ी को कंपनी का एक कर्मचारी ज़ोरा सिंह चला रहा था और उसके बगल में कंपनी का इंजीनियर अमर सिंह नारंग बैठा था। जब दो लोगों को इन्होंने सामने लेटा देखा, तो जोरा सिंह ने गाड़ी आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और नारंग के रोकने के बावजूद नीचे उतर गया। मजबूरी में नारंग भी उतर गया। तभी कंपनी के मालिक इंदर सिंह के बेटे बलदेव सिंह ने नारंग को संकेत किया और वह दोबारा गाढ़ी में चढ़ गया। उसने नीचे लेटे हजारा सिंह और प्यारा सिंह के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी।
जमशेदपुर का मौखिक इतिहास बताता है कि जब तेज रफ्तार गाड़ी ने दोनों को कुचला और हड्डियों के चटकने की आवाज आई, तो साथ ही में हजारा सिंह के मुंह से आखिरी दो शब्द निकले- ‘इंकलाब जिंदाबाद’! यह टाटा की जागीर जमशेदपुर के मजदूर आंदोलन के पहले शहीद की अंतिम पुकार थी। दो मजदूरों की हत्या के जिम्मेदार बलदेव सिंह को आठ साल बाद स्वतंत्र भारत का पहला रक्षामंत्री बना दिया गया। कालान्तर में उनकी तार कंपनी को टाटा स्टील ने ले लिया।

यह केवल मौखिक इतिहास नहीं है, दिलीप सिमियन की किताब द पॉलिटिक्स ऑफ लेबर अंडर लेट कोलोनियलिज्म औरअरविंद विद्रोही की किताब ‘जमशेदपुर मजदूर आंदोलन के विस्मृत जन’ में आंखों देखा इतिहास चश्मदीदों के मार्फत दर्ज है। क्या नेहरूजी या कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को इस बात की खबर नहीं रही होगी कि वे जिस आदमी को रक्षामंत्री बनाने जा रहे हैं वह क्या है? हो सकता है राहुल गांधी न जानते हों।
हजारा सिंह तो फिर भी भगत सिंह के साथी थे, कम्युनिस्ट थे, पर प्रोफेसर अब्दुल बारी का क्या? वे तो कांग्रेसी थे। खुद कांग्रेस ने 1937 में उन्हें मजदूरों को संगठित करने के लिए जमशेदपुर भेजा था। प्रोफेसर बारी ने मजदूरों के सवाल पर टाटाओं से कभी समझौता नहीं किया और करोड़ों रुपये के लाभ मजदूरों को दिलवाए। 1947 में जब उनकी हत्या हुई तो उनके पटना के घर पर उनके पास केवल एक रुपया मिला था। गांधीजी के मुताबिक ‘इंसानों में राजा’ रहे प्रोफेसर बारी को टिस्को प्रबंधन द्वारा बरसों बदनाम किए जाने का सिलसिला टाटा के आपराधिक इतिहास का एक छुपा हुआ अध्याय है। टाटा ने जमशेदपुर में प्रोफेसर बारी के इकलौते बचे प्रतीक बारी मैदान को अपने कारखाने के परिसर में मिला लिया। राहुल गांधी को एक बार उसे देखकर आना चाहिए। केवल यह जानने के लिए कि टाटा को कांग्रेस के महानतम मजदूर नेता प्रोफेसर बारी से क्या दिक्कत थी, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के 18 साल तक निदेशक रहे रूसी लाला की किताब द क्रिएशन ऑफ वेल्थ पढ़नी चाहिए।
राहुल गांधी की शिकायत है कि टाटा को ‘आपराधिक ढंग से नष्ट’ किया जा रहा है। क्या उन्हें यह जानने और सबको बताने की जरूरत नहीं है कि टाटा ने अपने इतिहास में किस-किस को आपराधिक ढंग से नष्ट किया है? क्या वे ऐसा देश बचाना चाहते हैं जहां टाटा के किए अपराध लोकस्मृति से खत्म कर दिए जाएं? क्या वे ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहां अदाणी की जगह टाटा रहे और ट्रकों के नीचे मजदूरों की लाशें? क्या वाकई दिल्ली का मौसम बदलने वाला है या हमेशा की तरह यह केवल मोहरे बदलने की मुनादी है?
