दुनिया 200 साल बाद

दिल्ली रावण मारने निकली है, पहाड़ योगिनियों को जगा रहा है…

पिछले हफ्ते हम नग्‍गर में थे और निकोलस रोरिक के प्रेत से जूझ रहे थे। उस वक्‍त नग्‍गर सहित पूरा कुल्‍लू अपनी देवियों की पालकी सजाने की तैयारी में लगा था। आज उत्तर भारत में देवीपूजा के नौ दिन शुरू हो रहे हैं जिसकी परिणति विजयादशमी पर होगी। ठीक उसी दिन कुल्‍लू में लंबे दशहरे की शुरुआत होगी, जब भगवान रघुनाथ के रथ का साथ देने के लिए करीब तीन सौ गांवों के देव-देवियां, योगिनियां, शक्तियां, और पहाड़ों की रानी देवी हिडिम्‍बा ढालपुर के मैदान में उतर चुकी होंगी।

इधर नवदुर्गा की समाप्ति होगी, उधर लंबे दशहरे की शुरुआत। कुल्‍लू को इसीलिए कुलान्‍तपीठ कहा गया है। वह जगह, जहां मर्त्‍य सभ्‍यता का अंत हो जाता है। जहां देव बसते हैं। जहां के पहाड़ों, झरनों, पेड़ों की रक्षा जोगिनियां करती हैं। जहां देवी हिडिम्‍बा की आज्ञा के बगैर कुछ नहीं हो सकता। जहां नग्‍गर की ललिता त्रिपुरसुन्‍दरी वह आदिशक्ति है जिसके बगैर देवी दुर्गा कभी भी रक्‍तबीज का अंत नहीं कर पातीं। कुलान्‍तपीठ का एक सिरा यहीं कश्‍मीर के कौल तंत्र से जाकर जुड़ता है।

जब सांसारिक मनुष्‍य की उपासना समाप्‍त होती है, तब कुलान्‍त के देव-देवियां जागते हैं। नवरात्रि से लेकर दशहरे तक की यात्रा धर्मशास्‍त्र के क्षेत्र में शाक्‍त से वैष्‍णव पंथ तक सुगम संक्रमण का मौलिक उदाहरण है। इस मायने में कुल्‍लू इसलिए विशिष्‍ट है क्‍योंकि यह हिमालयी धरती आदिम रूप से जीववाद की उपासक रही है जिसमें शाक्‍त तंत्र का मिश्रण बहुत बाद में, छठवीं से आठवीं सदी के दौरान हुआ, और जो सत्रहवीं सदी में राज्‍य-प्रायोजित वैष्‍णव पंथ से होते हुए आज की तारीख में कृष्‍णभक्ति तक पहुंच चुका है। नग्‍गर में त्रिपुरसुन्‍दरी का पगोडा शैली वाला मंदिर, वहीं पास में बिजली महादेव, नीचे कुल्‍लू दशहरे के रघुनाथजी और जापानी फल (पार्सिमोन) की जन्‍नत माने जाने वाली लग घाटी के भल्‍याणी गांव में कृष्‍ण-राधा का भव्‍य काठकुनी मंदिर- शैव, शाक्‍त, वैष्‍णव पंथों (और उसके भीतर भी रामानंदी और कृष्‍णभक्ति की धाराओं) के अद्भुत संगम का परिचायक हैं।



नग्‍गर में त्रिपुरसुन्‍दरी का पगोडा शैली वाला मंदिर

हिंदुस्‍तान के समाज में धर्म कभी भी राज्‍य से अलग नहीं रहा। राज्‍य ने धर्म को प्रश्रय दिया, धर्म ने राज्‍य को उसका धर्म सिखाया। यहां की धर्मनिरपेक्षता या पंथनिरपेक्षता पश्चिम के सेकुलरिज्‍़म से बुनियादी तौर पर भिन्‍न है क्‍योंकि यहां किसी एक के हित किसी दूसरे को खारिज नहीं किया गया। सबको साथ लेकर चलने वाली परंपरा रही। इस संदर्भ में कुल्‍लू का उदाहरण उल्‍लेखनीय है, जिसकी शुरुआत आदिम जीववाद से होती है लेकिन गुप्‍तकाल में यह शाक्‍त तंत्र का केंद्र बन जाता है। शाक्‍त तंत्र के अवशेष आज भी योगिनियों के मंदिरों और लोक कथाओं में विद्यमान हैं।   

जब रक्‍तबीज के खिलाफ दुर्गा के युद्ध में पैदा हुई चौंसठ योगिनियों का काम खत्‍म हो गया, तो उन्‍होंने ऊपरी कुल्‍लू घाटी के निर्जन पहाड़ों, झरनों, घने जंगलों में आश्रय ले लिया। एक और दिलचस्‍प मिथक है कि देवी पार्वती एक टोकरी में सारे देव-देवियों को लेकर जा रही थीं और कुल्‍लू में उन्‍होंने आराम करने के लिए चुना, तो तेज हवा के एक झोंके से सारे देवी-देवता उड़ गए और अलग-अलग पहाड़ों-झरनों में जाकर बिखर गए। यहीं स्‍वतंत्र शक्तियों ने खुद को जोगिनी के रूप में स्थापित कर लिया।   

मिथकों से इतर, आप पाएंगे कि कुल्‍लू में ये योगिनियां मंदिर जैसे औपचारिक ढांचों में सामान्‍यत: कैद नहीं हैं। झरने-पहाड़ में वास करने वाली ये शक्तियां लोक परंपरा और लोक स्‍मृति में लोगों और घाटी की महादेवियों (जैसे मनाली की हिडिम्‍बा) के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाती हैं। यही चौंसठ योगिनियां मिलकर योगिनी चक्र बनाती हैं। इस योगिनीचक्र के केंद्र में आदिशक्ति नग्‍गर की त्रिपुरसुन्‍दरी हैं, जिनका मंदिर भुवनेश्‍वर के हीरापुर या और जगहों जैसा नहीं है कि खुली छत देखकर पहचान लिया जाय। यह हिमालय की खास पगोडा शैली में बना है। यह मंदिर एक केंद्रीय भौगोलिक साक्ष्‍य है कि कैसे हिमालय की आदिम पारलौकिक शक्तियों को ब्राह्मणवादी मुख्‍यधारा में समाहित किया गया।

राजा यशोदापाल ने 11वीं सदी से पहले स्‍थानीय जोगिनियों के लिए नग्‍गर में यह सामूहिक ढांचा बनवाया था। तब नग्‍गर प्राचीन कुल्‍लू राज की राजधानी हुआ करता था। समय के साथ जैसे-जैसे कुल्‍लू के राजाओं ने मुख्‍यभूमि के साम्राज्‍यों के साथ लेनदेन शुरू किया, नग्‍गर का मंदिर त्रिपुरसुन्‍दरी के नाम से पहचाना जाने लगा और स्‍थानीय योगिनीतंत्र का शाक्‍त धारा में विलय हो गया। इसीलिए जब कुल्‍लू में नवदुर्गा का व्रत लोग रखते हैं, तो देवी दुर्गा के नौ रूपों के समानांतर यह समझा जाता है कि पहाड़ों की सरहदों की रक्षा करने वाले योगिनीचक्र का भी आवाहन किया जा रहा है। हिमालयी जीववाद के शैव-शाक्‍त तंत्र के साथ विलय की करीब हजार साल तक चली यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी, हालांकि राज्‍याश्रित ही थी। इसके बाद जो हुआ, वह एक झटके में आया बदलाव था।


चित्रकार बिचित्र द्वारा 1619 में बनाया गया राजा जगत सिंह का पोर्ट्रेट

कहानी सतरहवीं शताब्‍दी की है और कुल्‍लू के राजा जगत सिंह से जुड़ी है। ये कुल्‍लू के पहले राजा हैं जिनकी कोई तस्‍वीर उपलब्‍ध है। उस वक्‍त राजनीतिक रूप से कुल्‍लू का राज असंगठित था। अलग-अलग घाटियों में अलग-अलग राणाओं का राज था और वे अपनी-अपनी योगिनियों की रक्षा के अधीन थे, हालांकि स्‍थानीय शासक अब भी देवी राजकाज के लिए हिडिम्‍बा के दैवीय आशीर्वाद को ही मानते थे। इसी दौरान जगत सिंह ने लग घाटी पर हमला किया, उसके राणा को हराया और राजधानी को नग्‍गर से सुल्‍तानपुर ले आया। इसके पीछे उसके अपने किए पाप के रेचन का कारण था।  

दरअसल, जगत सिंह की नजर टिपरी गांव के एक ब्राह्मण पर लगी थी जिसके बारे में उसे झूठी खबर मिली थी कि उसके पास अनमोल मोतियों का खजाना है। राजा ने उसे डराया-धमकाया। गरीब ब्राह्मण ने दुखी होकर आत्‍मदाह कर लिया और राजा को श्राप दिया कि वह जब भी खाने की कोई चीज देखेगा वह रेंगते हुए कीड़ों में बदल जाएगी और पानी खून बन जाएगा। इस श्राप के बाद राजा को लाइलाज कोढ़ हो गया। राजा जगत सिंह को एक वैष्‍णव वैरागी मिले बाबा कृष्‍णदास पयहारी। उन्‍होंने राजा को सलाह दी कि अयोध्‍या में रघुनाथजी (भगवान राम) की मूर्ति को जिस पानी से धोया जाता है, उस पानी से ही राजा ठीक हो सकता है। राजा ने एक ब्राह्मण दामोदर दास को व‍ह मूर्ति लाने अयोध्‍या भेज दिया।     

दामोदर दास बहुत दिन अयोध्‍या रहा। उसने वहां के लोगों का दिल जीत लिया और मौका पाकर 1651 की जुलाई में रघुनाथजी की पवित्र काली मूर्ति लेकर भागने को हुआ, कि पकड़ लिया गया। वहां के पंडितों ने जब मूर्ति उठाई तो वह हिलीडुली ही नहीं, लेकिन जैसे ही मूर्ति का मुख कुल्‍लू की दिशा में होता वह पंख की तरह हलकी हो जाती। इसे दैवीय आदेश मानकर स्‍थानीय पंडितों ने दामोदर दास को मूर्ति ले जाने दी। कुल्‍लू पहुंचने पर मूर्ति को राजा ने मणिकर्ण में रखा और अपना इलाज करता रहा। ठीक हो जाने के बाद जगत सिंह ने मंडी के राजा के साथ मिलकर लग घाटी पर हमला किया और वहां के राजा को हरा दिया।

इसके बाद कुल्‍लू की राजधानी नग्‍गर से लग घाटी के सुल्‍तानपुर लाई गई और यहां रघुनाथजी को प्रतिष्‍ठापित किया गया। रघुनाथजी का मंदिर बनवाकर राजा ने अपना राजपाट उनके सुपुर्द कर दिया। अब समस्‍या यह थी कि शैव-शाक्‍त परंपरा के स्‍थानीय देवी-देवताओं का वैष्‍णव पंथ के रघुनाथजी के साथ संगम कैसे करवाया जाय? तब राजा ने कुल्‍लू के सभी गांवों के देवताओं के करदारों के नाम एक राज्‍यादेश निकाला कि दशहरे के दिन वे सभी अपने-अपने देवता लेकर रघुनाथजी की सेवा में उपस्थित हों। पुरानी तांत्रिक व्‍यवस्‍था को मिटाने के बजाय राजा ने उसका रघुनाथ भक्ति में विलय कर दिया। देवी हिडिम्‍बा को राजशाही की कुलदेवी रखा गया। उनकी पालकी मनाली से आए बगैर आज भी कुल्‍लू का दशहरा शुरू नहीं हो सकता। बाकी गांवों की देवियां, योगिनियां तो नीचे आती ही हैं।

राजा जगत सिंह के एक राज्‍यादेश ने कुल्‍लू में वैष्‍णव पंथ की केंद्रीय जगह बना दी। उसके बाद पयहारी बाबा और उनके वैरागी शिष्‍यों के लिए राजा ने ठाकुरद्वारे की बहुत-सी जमीनें दान में दीं। इन ठाकुरद्वारों से ठाकुरजी (कृष्‍ण-राधा) की पूजा की परंपरा शुरू हुई, तो धीरे-धीरे रामभक्ति यानी राजकीय कर्त्तव्‍य और राजकाज से और कृष्‍णभक्ति यानी साख्‍य भाव तक धर्म का सफर चला आया। इस पूरे सफर में लग घाटी, जो आज पार्सिमोन के लिए जानी जाती है, केंद्रीय जगह रखती है।

जब राजा जगत सिंह ने लग घाटी पर कब्‍जा किया, उसे कुल्‍लू में मिलाया और वहां वैष्‍णव पंथ का प्रसार किया, तो यहां के योगिनीपूजक लोगों ने अपनी स्‍थानीय देवियों के कोप और आक्रोश को कृष्‍णभक्ति अपनाकर संतुलित किया। खासकर, ये प्रक्रिया लग घाटी के दो गांवों भल्‍याणी और मठासौर में घटी। आज भी यहां के लोग अपने पहाड़ों की रक्षा के लिए जो योगिनियों को मानते हैं लेकिन दै‍नंदिन भक्तिभाव कृष्‍ण-राधा पर बरसाते हैं। मठासौर का जोगिनी मंदिर और भल्‍याणी का कृष्‍ण-राधा मंदिर इसका उदाहरण है। भल्‍याणी का मंदिर यहां के खूबसूरत बुग्‍याल में है। बहुत से बाहरी लोगों को अब भी इसके बारे में पता नहीं है।  


भल्‍याणी का कृष्‍ण-राधा मंदिर

यहां एक रिटायर शिक्षक रहते हैं। बातचीत में वे आग्रह करते हैं कि बाहर के लोगों को भल्‍याणी के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए ताकि कुल्‍लू-मनाली की भीड़ से पर्यटकों का आवागमन यहां हो सके, तो गांव के लोगों को चार पैसे की आमदनी हो। भल्‍याणी में एकाध होम स्‍टे चलते हैं। बिहार के एक प्रवासी मजदूर शिवशंकर को तो यह गांव इतना पसंद है कि वे साल के नौ महीने यहीं बिताते हैं और बहुत खुश रहते हैं। कृष्‍णभक्ति की अनुगूंज अब भल्‍याणी से उतर कर नीचे भी सुनाई दे रही है।     

समय के साथ जब साठ और सत्तर के दशक में हिप्‍पी संस्‍कृति ने पहाड़ों में अपने पैर पसारे और आत्मिक शांति के लिए विदेशी लोग कुल्‍लू की वादियों में आने लगे, तो पहले से मौजूद कृष्‍णभक्ति के परिदृश्‍य के चलते यहां इस्‍कॉन को काम करने की बनी-बनाई जमीन मिल गई। कुल्‍लू के बाजार में चलते-चलते किसी को भी इस्‍कॉन के भक्‍तों के समागम और भजन सुनने को मिल सकते हैं। कृष्‍णभक्ति का प्रसार ऐसा है कि पड़ोस के आइआइटी मंडी जैसे संस्‍थान और इस्‍कॉन का जबरदस्‍त औपचारिक गठजोड़ हो चुका है। आइआइटी मंडी के निदेशक प्रो. लक्ष्‍मीधर बहेरा उर्फ एचजी लीला पुरुषोत्तम दास इस्‍कॉन के प्रचारक हैं जिन्‍होंने परिसर के भीतर ही भक्तिवेदान्‍त रिसर्च सेंटर खोल रखा है और परिसर में शाकाहार का पालन करवाते हैं। इस चक्‍कर में वे कई विवादों में भी पड़ चुके हैं।

कुल्‍लू का इतिहास हिंदुस्‍तान के समाज में धार्मिक सम्‍प्रदायों के सुगम संगम का इतिहास है। शैव, शाक्‍त, तंत्र, वैष्‍णव, आदि के सह-अस्तित्‍व की इस जमीन पर साधु और शैतान के बीच फर्क कर पाना इसलिए मुश्किल है क्‍योंकि यहां छुपने के लिए पहाड़, जंगल, झरने जैसी भौतिक आड़ के अलावा बहुत-सी खूबसूरत रूहानी सहूलियतें भी हैं। हो सकता है इसीलिए शायद निकोलस रोरिक ने नग्‍गर को अपना घर बनाना चुना हो। हो सकता है इसीलिए और भी कई रहस्‍यमय लोग यहां आकर आसानी से टिक जाते हैं- देसी, विदेसी, यूरोपीय, रूसी और इजरायली।

शायद इसीलिए, जब पूरी दिल्‍ली रावण को मारने के लिए कटे कबंध सड़क पर निकली हुई है उस वक्‍त पहाड़ इससे बेखबर अपनी योगिनियों को जगा रहा है। वह जानता है कि राक्षस को मारने के लिए पहले देवी को जगाना होगा, नीचे मैदान में लाना होगा।