इस दुनिया के मेले में किसी के लिए कोई भी ग़ैर हो सकता है। ग़ैरियत या परायापन केवल अशोक बनवासी जैसों की किस्मत में नहीं बदा है। परायेपन की वजह महज गरीब होना, किसी जाति में पैदा होना या सामाजिक रूप से परित्यक्त होना ही नहीं है। दिल्ली के पंजाबी बनियों, हापुड़ के एक चौधरी साहब और कुछ मद्रासी श्रद्धालुओं की यह कहानी बताती है कि खाये पीये अघाये सभ्य समाज के भीतर भी कैसे कुछ लोगों को बेगाना और अजनबी बना कर खारिज कर दिया जाता है। बात बनारस की ही है, जहां अशोक ने अपने उत्पीड़न की अर्जी दी थी और जहां से श्रद्धालुओं की एक पार्टी दिल्ली की ट्रेन में चढ़ी।
कोई हफ्ते भर के काशी प्रवास के बाद श्रद्धालुओं की एक बड़ी पार्टी दिल्ली लौट रही थी। कैंट स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर वंदे भारत दो बजे आकर खड़ी हो गई थी, लेकिन उसमें घुसने की मनाही थी। कोई पौन घंटे तक बंद डिब्बों की साफ-सफाई हुई। इस बीच बाहर कुछ खड़े और कुछ बैठे मुसाफिर पसीने में नहाते रहे। पौने तीन बजने से ठीक कुछ मिनट पहले डिब्बों के दरवाजों को दोनों ओर से कुलियों ने छेक लिया। ये कुली आम तौर से भारी सामान वाले ग्राहकों को पटाते हैं और उनका सामान सबसे पहले सुरक्षित चढ़वाकर रखने के एवज में भारी रकम ऐंठते हैं। दरवाजे खुलते ही बड़े सामान और भारी लोग कुलियों के सहारे पहले चढ़ गए। बाकी लोग उनके पीछे लगी लाइन में अटक गए।
जब तक सब चढ़े, डिब्बे के भीतर घमासान मच चुका था। दो बाउंसर से दिखने वाले काले सफारीधारी मुस्टंडे हलके लोगों को धकिया रहे थे और भारी सामान को छोटे सामानों के बीच जबरन ठेल रहे थे। कुछ यात्रियों से उनकी बहस भी हुई। उनका लहजा धमकाने वाला लगा। वे किसके लोग थे, कोई नहीं जानता था। इस बीच एक अजीब सा आदमी पूरी ठसक और लचक के साथ डिब्बे में घुसा। उसने अपने दोनों हाथ अगल-बगल की दो सीटों पर टिकाए और बालों को झटकते हुए बोला, ‘’और सब चंगा जी? किसी को भूख लगी हो तो बताना।‘’
बीच में से एक अधेड़ सम्भ्रान्त महिला की ठिठोली करती सी आवाज आई- ‘’आप कहां चले गए थे शर्माजी? हम लोग तो बहुत परेशान हो गए।‘’ शर्माजी बोले, ‘’मैं तो यहीं सी ग्यारह में हूं बहनजी, यहीं रहूंगा, और कहां जाना मैंने?’’ फिर उसने खिस्स सी हंसी निकालते हुए कहा, ‘’मट्ठी वट्ठी चाहिए हों तो बताना, मेरे पास बहुत सी हैं।‘’ किसी के बोलने से पहले ही उसने पैंट की जेब में हाथ डालकर एक मोटी सी उजली पन्नी निकाली और उसे खोलकर सबको मट्ठी बांटने लगा। उस औरत ने चिल्लाकर कहा, ‘’एक मट्ठी मुझे भी देना शर्माजी!”
‘’डोन्ट वरी जी! परशाद है, सबको मिलेगा!” मट्ठी पाई औरतों ने उसे अपने माथे से लगाया और खाने लगीं। वो आदमी वापस उसी ठसक और लचक के साथ लौट गया। गाड़ी चल चुकी थी। तकरीबन सभी का सामान अपनी जगह सेट हो चुका था। दोनों मुस्टंडे भी नजर से ओझल हो गए। इसके बाद श्रद्धालु पार्टी के लोगों ने अकेली सवारियों को निशाना बनाकर विस्थापित करना शुरू किया- ‘’भाई साब, आप सिंगल हो? आप उस वाली सीट पर चले जाओ, मैंने अपने हसबैंड को दवा देनी होती है।‘’ एक औरत ने ठिठोली की, ‘’और क्या? बहनजी भाई साब के सामने बैठेंगी तो उन्हें भी तसल्ली रहेगी।‘’ धीरे-धीरे बैठने की व्यवस्था कुछ ऐसे बनी कि एक तरह की ज़़बान बोलने वाले एक हुजूम की तरह आसपास इकट्ठा हो गए। सिंगल सवारियों को उन जोड़ों या परिवारों के पास ठेल दिया गया जो इस पार्टी का हिस्सा होते हुए भी अलग से दिखते थे। उनमें कुछ दक्षिण भारतीय थे। उन्हीं में एक खादी का कुरता और धोती पहने लहीम शहीम चौधरी साहब भी थे।
गाड़ी जब गति में आ गई, तब काशी-यात्रा के अनुभवों पर गप चल पड़ी। एक साथ कई औरतें और कुछ पुरुषों के बोलने के चलते किसी की भी बात साफ नहीं हो रही थी। उसी में चौधरी साहब की पत्नी भी अपनी सीट से उचक कर कुछ कुछ जोड़े दे रही थीं, लेकिन उनके बोले की ओर कोई तवज्जो नहीं दे रहा था। चौधरी साहब भी रह-रह कर कुछ बोलने को उकसते दिख रहे थे, लेकिन एक जैसी जबान बोलने वाले ज्यादातर शर्ट पैंटधारी पुरुष उनकी ओर देख तक नहीं रहे थे। फिर चौधरी साहब से रहा नहीं गया। वे सीट से उठ कर निकल लिए और बीच के गलियारे में थोड़ा आगे जाकर खड़े हो गए- शायद वहां चल रही बातचीत का हिस्सा बनने के लिए।
पूरी यात्रा में चौधरी साहब ने ऐसा चार बार किया। वे जाते, थोड़ी देर रुकते, फिर लौटकर शांत बैठ जाते। इस बीच उनकी पत्नी उचक कर औरतों के संवाद में अपना एक वाक्य जोड़तीं, उन्हें कोई नहीं सुनता, फिर वे भी झेंपकर बैठ जातीं। एक समय ऐसा आया, शायद कानपुर के बाद, जब दोनों ने ही शांत होकर बैठना चुन लिया। उधर, मट्ठीप्रेमी महफिल अपने शबाब पर थी। कभी केक निकलता, कभी कचौड़ी, कभी नमकीन। सब कुछ सबमें बंटता, सिवाय मद्रासियों और चौधरी साहब के।
जब शाम का नाश्ता आया, तो चौधरी साहब ने ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। उनका मन शायद भरा हुआ था। पत्नी की ओर देखकर वे बोले, ‘’खा ले!” फिर नाश्ते को अपने माथे से लगाकर खोल रहीं दूसरी औरतों की ओर इशारा कर के बोले, ‘’जब से देख रहा हूं ये जनानी खाये जा रही हैं। सुबह भी खाकर चली थीं, रास्ते भर खाती रहीं, अब फिर से नास्ता। बहुत खावें हैं ये पंजाबन लुगाई।‘’ उनकी पत्नी ने दुरुस्त करते हुए कहा, ‘’बनिये हैं।‘’ चौधरी बोले, ‘’हां जी, परशादी है, खा लो जितना जी चाहे।‘’
उनके संवाद को काफी देर से एक सिंगल मुसाफिर सुन रहा था, जिसे सीट बंटवारे के दौरान चौधरी जोड़े के साथ जबरन बैठा दिया गया था। उसने जिज्ञासा में पूछा, ‘’क्या आप सब लोग एक साथ हैं? एक ही पार्टी में? या अकेले?’’ चौधरी की पत्नी ने कहा, ‘’हां जी, सब साथ हैं। हम लोग तो इससे पहले जगन्नाथ पुरी, द्वारका, महाकाल, सब जगह साथ जा चुके हैं।‘’ चौधरी साहब ने टोका, ‘’पुरी तो अपना बेटा ले गया था। पार्टी के साथ तो ये दूसरी ही यात्रा है।‘’ पत्नी को अचानक याद पड़ा। फिर चौधरी के धागे खुलने लगे, ‘’साथ आने में यूनिटी लगती है जी। तरह-तरह के लोगों से मिलने का मौका मिलता है। संग साथ रहवे तो सफर ठीक कटे है। वैसे तो अपना बेटा ही सक्षम है। सब उसी की मेहरबानी है। पुरी तो उसने हमें फ्लाइट से भेजा था।‘’
बातचीत आगे बढ़ी। पता लगा चौधरी साहब हापुड़ के निवासी हैं। गाजियाबाद में बेटे के साथ रहते हैं। बेटा बिल्डर है। गांव में जमीनें बहुत हैं। बेटे ने ही तीर्थयात्रा के लिए दिल्ली के योजना विहार की किसी कंपनी के साथ मां-बाप की बुकिंग करवा दी थी, जो समय-समय पर तीर्थयात्राएं आयोजित करती है। मट्ठी वितरक शर्माजी नाम का आदमी उसी कंपनी का एजेंट था और दोनों काले सफारीधारी उसके सुरक्षाकर्मी। पिछला दृश्य अब खुल रहा था।
इतने में मेरठ से चौधरी साहब की बेटी का फोन आ गया। हालचाल देते हुए चौधरी बोले, ‘’बेटा, मौसम गड़बड़ हो जावे तो यो ट्रेन भी हवाई जहाज से कम ना दीखे।‘’ और बोलकर हंसने लगे। उनकी पत्नी ने व्याख्या की, ‘’हम लोग पुरी से आ रहे थे तो मौसम खराब हो गया था, ड्राइवर ने बताया कि उसी के कारण हवाई जहाज हिल-डुल रहा है।‘’ चौधरी ने जोड़ा, ‘’हां जी, बड़ा स्याना ड्राइवर था, संभाल लिया पट्ठे ने।‘’ फिर उनकी पत्नी बताने लगीं कि कैसे बनारस में चौधरी साहब की तबीयत बिगड़ गई थी और तीन दिन तक वे लोग घूम-फिर नहीं सके। पार्टी के लोगों ने पूछा तक नहीं। एजेंट मारवाड़ी अस्पताल ले गया। वहां डॉक्टर ने यात्रा रद्द करने की सलाह दी, तो बेटा तुरंत फ्लाइट से आने को तैयार हो गया, लेकिन ‘’ये ही ना माने जी… जिद करने लगे कि वापस चलना है, बेटे को आने से मना कर दिया। अब तो फिर भी थोड़ा ठीक हैं।‘’ पता चला चौधरी को मोतियाबिंद है।
अलीगढ़ पार हो चुका था। एक अजनबी को अपनी कहानी सुना सुनाकर चौधरी और चौधराइन के कलेजे को ठंडक पड़ चुकी थी। उधर, चौधरी जोड़े से बेखबर एक जैसी जबान बोलने वाले दिल्ली के पंजाबी बनियों की महफिल मुसलसल जमी हुई थी। अचानक डिब्बे के पीछे से घंटी बजने और तमिल में किसी स्त्री के गाने की आवाज आई। मल्होत्राजी उचक कर बोले, ‘’इस टाइम पूजा कौन कर रहा है यार?” पीछे देखने के लिए उस झुंड से एक साथ कई नरमुंड उठे। एक औरत की आवाज आई, ‘’वो साउथ इंडियन वाले हैं जी।‘’ सब वापस बैठते अपनी सीट पर, उससे पहले ही स्पीकर पर एक घोषणा हुई- ‘’बोगी नंबर सी-8 में एक यात्री की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। अगर इस ट्रेन में कोई डॉक्टर यात्रा कर रहा हो तो कृपया मदद के लिए पहुंचें।‘’
श्रद्धालु पार्टी में सनसनी दौड़ गई। सभी बेचैन हो उठे। एक औरत ने कहा, ‘’कहीं हमारे लोगों में से ही तो कोई सी-8 में नहीं है?” फिर सभी याद करने लगे। गिनने लगे कि उनके लोगों में कौन कौन कहां कहां बैठा है। एक औरत अपने पति से चिल्लाकर बोली, ‘’लिस्ट निकालो जी! देख क्या रहे हो?” दूसरी ने कहा, ‘’सीनियर सिटिजन के लिए तो डॉक्टर होना चाहिए ट्रेन में!” भर हाथ चूड़ी पहनी एक नवब्याहता ने कहा, ‘’हां आंटी, सीनियर सिटिजन का तो कोटा होता है।‘’ एक बुजुर्ग बोले, ‘’और क्या! सरकार को व्यवस्था करनी चाहिए, ट्रेन उसकी है।‘’
अब तक पूरी तरह सहज हो चुके चौधरी साहब ने बेचैन श्रद्धालु पार्टी की ओर सिर उचकाकर थोड़ा तेज आवाज में चुटकी ली, ‘’कोटा तो पूरा हो चुका! इत्ती दूर आ के तबीयत खराब करन का के फायदा? काशी में होता तो डायरेक्ट मोक्ष मिल जाता! हैं जी?” और ठठाकर हंस पड़े।
इस बार भी किसी ने उनके कहे की ओर ध्यान नहीं दिया, हालांकि सुना सबने था।
