शिक्षक दिवस के बहाने एक भुला दिए गए शिक्षक की याद! वह शख्स, जिसकी न कहीं तस्वीर मौजूद है, न किए हुए काम का दस्तावेज़ आसानी से उपलब्ध है। बनारस के सतीश चंद्र गुहा, जिन्होंने इस देश को पहली बार सिखाया कि अपनी प्राचीन किताबों और ज्ञान को कैसे सहेजना है, बाँट-छाँट कर सजाना है, ताकि पढ़ने की जरूरत पड़े तो ढूँढने की मेहनत न करनी पड़े। जिन्होंने 1942 में किसी समय गुहा को अवकाशप्राप्त जीवन बिताते बनारस के कमच्छा मोहल्ले में खादी के धोती-कुर्ते में देखा था और बाद में उन पर लिखा, यह कहानी वहीं से साभार है।
आधुनिक दुनिया में शिक्षक का अर्थ है सिखाने वाला और सीखने का माध्यम हैं किताबें। शिक्षक वह है जो किताबों और सीखने वाले के बीच पुल का काम करता है। किताब, शिक्षा और शिक्षक के बीच का यह रिश्ता छपाई की तकनीक और उससे आई आधुनिक शिक्षण प्रणाली की स्वाभाविक पैदाइश है। अन्यथा जब किताबें नहीं होती थीं तब तो श्रुति परंपरा यानी सुन कर सीखने और याद रखने की पद्धति ही काम आती थी। अब तो किताबों के बगैर शिक्षा और शिक्षक की कल्पना भी मुश्किल है।
किताब पढ़कर तो शिक्षा कोई भी दे सकता है, आजकल के स्कूली शिक्षकों से बड़ा इसका उदाहरण और क्या होगा! पर क्या आपने कभी सोचा है कि किताबों को रखने, बरतने और संयोजित करने की शिक्षा कहां से आई होगी? एक शिक्षक को कैसे पता चलता होगा कि किताबों के ढेर में अपने काम की किताब कैसे खोजी जाय? अगर घर में ढेर सारी किताबें हैं तो उन्हें कैसे सजाया जाय कि जरूरत पड़ने पर सही समय पर सही किताब हाथ में आ जाय? लाइब्रेरी का मामला हो तो समस्या और जटिल हो जाती है। भूस के ढेर में सुई खोजने जैसा काम! यानी, एक शिक्षक अगर समय पर अपनी कक्षा या व्याख्यान के लिए उपयोगी किताब खोज ही न पाए तो सोचिए वह क्या करेगा?
शायद यही सोचकर आज से डेढ़ सौ साल पहले अमेरिका के एक विद्वान मेल्विल डेवी ने किताबों को ज्ञान की अलग-अलग धाराओं, विषयों और उपविषयों के हिसाब से वर्गीकृत करने और सजाने की एक पद्धति बनाई थी। लाइब्रेरी विज्ञान की भाषा में इसे दशमलव वर्गीकरण पद्धति कहते हैं। भारत में तब तक ऐसा कुछ भी नहीं होता था। बीसवीं सदी के आरंभ में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय जब विदेश के दौरे पर गए, तब उन्हें पहली बार सार्वजनिक पुस्तकालयों का महत्व समझ में आया। वे लौटकर आए तो 1910 में उन्होंने एक अमेरिकी पुस्तकालयविज्ञानी डब्ल्यू. ए. बोर्डेन को बड़ौदा में केंद्रीय लाइब्रेरी बनाने के काम पर लगा दिया। कहते हैं कि भारत के अपने पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत यहीं से हुई।
यह आंदोलन बड़ौदा से पंजाब तक फैला, तो 1915 में डिकिंसन नाम के एक अमेरिकी सज्जन को पंजाब विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी बनाने का काम दिया गया। डिकिंसन ने ही पहली बार लाइब्रेरी विज्ञान का पाठ्यक्रम यहां शुरू किया और 1916 में देश का पहला लाइब्रेरी साइंस प्राइमर (पंजाब) प्रकाशित किया। डिकिंसन के मातहत बहुत से लोगों ने प्रशिक्षण लिया होगा, लेकिन एक नाम उनके शिष्यों में ऐसा है जिसका जिक्र शिक्षक दिवस के संदर्भ में यहां किया जाना चाहिए- सतीश चंद्र गुहा- जिन्होंने भारत को पहली बार अपनी प्राच्य ज्ञान परंपराओं के हिसाब से किताबें सजाने का विशुद्ध देसी गुर सिखाया।

इसका मतलब क्या है? असल में, तब तक लाइब्रेरी में किताबों के वर्गीकरण की पद्धति अमेरिकी ही चली आ रही थी। यहां समस्या यह थी कि वह पद्धति यूरोपीय ज्ञान परंपरा, उसकी शाखाओं, विषयों और उपविषयों पर आधारित थी। अब हमारे यहां और अन्य प्राच्य देशों में तो ज्ञान की धाराएं ही बिलकुल अलग हैं। उनका संज्ञान तो पश्चिमी पद्धति में लिया ही नहीं गया था, और था भी तो बहुत आंशिक। इसलिए अमेरिकी दशमलव पद्धति से यहां के ज्ञान-सम्बंधी विषयों और उपविषयों को संयोजित कर पाना संभव नहीं था। एक देसी तकनीक की जरूरत थी। गुहा ने सबसे पहले इस जरूरत को समझा।
गुहा बनारस के रहने वाले थे। आजीवन बनारस में रहे। डिकिंसन से प्रशिक्षण लेने के बाद सतीश चंद्र गुहा बनारस में पेशेवर काम कर चुके थे। जब सर जदुनाथ सरकार काशी हिंदू विश्विद्यालय के मानद लाइब्रेरियन थे उस वक्त गुहा वहां सहायक लाइब्रेरियन होते थे। उसके बाद वे बनारस के क्वींस कॉलेज में कैटेलॉगर रहे, विहार विद्यापीठ में लेक्चरार और मानद लाइब्रेरियन रहे, और दरभंगा राज के पुस्तकालय के मुख्य लाइब्रेरियन रहे। कम उम्र में इतने अनुभवों ने उनके भीतर के जिज्ञासु को जगा दिया था, जिसका परिणाम 1921 में लिखे उनके एक परचे के रूप में सामने आया: ‘’ऑन द क्लासिफिकेशन ऑफ बुक्स इन आवर लाइब्रेरीज़’’। यह परचा अगस्त 1921 में एजुकेशनल रिव्यू ऑफ मद्रास में छपा था और किसी भारतीय द्वारा पुस्तकों के वर्गीकरण पर लिखा पहला परचा था।
अपने ऐसे और परचों व जिज्ञासाओं के चलते वे ऑल इंडिया लाइब्रेरी एसोसिएशन के एक अहम सदस्य बनकर उभरे। वे शिकागो की अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन के भी सदस्य थे। फिर गुहा ने बनारस में एक लाइब्रेरी एसोसिएशन बनाया और उसे नाम दिया ‘बनारस ग्रंथ गोष्ठी’। एक वक्त में गुहा खुद राष्ट्रवादी पत्रिका डॉन के प्रबंधक और सहायक संपादक रह चुके थे जिसे शिक्षाविद् सतीश चंद्र मुखोपाध्याय ने शुरू किया था, तो गुहा के पास एक पत्रिका चलाने का पर्याप्त अनुभव था। इसी के सहारे उन्होंने 1930 में ‘इंडियाना’ नाम की एक पत्रिका मशहूर ‘पूल्स इंडेक्स’ की तर्ज पर शुरू की, जो भारत में अपने किस्म का पहला प्रकाशन था। पैसे और संसाधन के अभाव में यह बहुत दिन नहीं चल सका।
बहरहाल, ग्रंथों के वर्गीकरण की पश्चिमी समस्या उनके लिए अध्यय का विषय बनी रही। प्राच्यविधा और भारतविज्ञान से जुड़ी किताबों में यह पद्धति काम नहीं आ रही थी। सतीश चंद्र गुहा इसी से बेचैन थे। लिहाजा, दिसंबर 1928 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में ऑल इंडिया लाइब्रेरी कॉन्फ्रेंस के छठवें सत्र में उन्होंने चर्चा के लिए यही विषय सुझाया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता एनी बेसेन्ट को करनी थी पर वे नहीं आ पाईं। इसलिए अध्यक्षता का काम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने किया, जिनका जन्मदिन हम लोग आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। इस सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष और कोई नहीं, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर थे।
इस सम्मेलन में लिया गया नौवां संकल्प कुछ ऐसे था: ‘’चूंकि अनुभवसिद्ध है कि भारतीय भाषाओं और क्लासिकीय भाषाओं में लिखी किताबों के वर्गीकरण के लिए पश्चिमी पद्धतियां उपयुक्त नहीं हैं, इसलिए यह सम्मेलन ऑल इंडिया पब्लिक लाइब्रेरी एसोसिएशन की कार्यकारी कमेटी से अनुरोध करता है कि वह इस प्रश्न की गहराई में जाकर सिफारिशें देने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी का गठन करे।‘’
दूसरे ही दिन इस संकल्प के आधार पर एक कमेटी बनाई गई। बनारस के सतीश चंद्र गुहा उसके अध्यक्ष बने। कमेटी के सदस्यों में एस. आर. रंगनाथन, विश्व भारती के प्रभात कुमार मुखोपाध्याय और न्यूटन मोहन दत्त शामिल थे। ध्यान दें कि कमेटी के सदस्य रंगनाथन वे शख्स थे जिन्हें भारत में कालान्तर में ‘’पुस्तकालय विज्ञान का जनक’’ कहा गया। पिछले महीने ही 12 अगस्त को उनका जन्मदिवस बीता है, जिसे देश भर में लाइब्रेरियन डे के रूप में मनाया जाता है। रंगनाथन एक गणितज्ञ थे। उन्होंने पुस्तकों के वर्गीकरण की ‘कोलन पद्धति’ बनाई थी, लेकिन कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए गुहा की दृष्टि में यह पद्धति भी भारतीय और प्राच्य ज्ञान परंपरा के ग्रंथों को वर्गीकृत करने के लिए अपर्याप्त थी।

यह तो ज्ञात नहीं है कि गुहा की अध्यक्षता वाली कमेटी ने नई पद्धति पर कितना काम किया, लेकिन 1932 में जाकर बनारस के सरस्वती भवन से उनका एक परचा छपा जो नई पुस्तक वर्गीकरण पद्धति पर केंद्रित था, जिसे ‘प्राच्य वर्गीकरण पद्धति’ नाम दिया गया था। गुहा के परचे की भूमिका पंडित गोपीनाथ कविराज ने लिखी थी, जो उस समय बनारस में संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल थे और खुद प्रिंस ऑफ वेल्स सरस्वती भवन के पुस्तकालयाध्यक्ष रह चुके थे। अपनी वर्गीकरण पद्धति में गुहा ने धर्मशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, साहित्य, विज्ञान, उपयोगी कलाएं/तकनीक, प्रदर्श कलाएं, दर्शन और धर्म को ज्ञान की मुख्य धाराओं के रूप में पहचाना था। एनसाइक्लोपीडिया या कोश जैसी किताबें, जिनमें कई ज्ञान-धाराएं शामिल होती हैं, वैसी किताबों को उन्होंने ‘सर्व वर्ग’ में रखा। फिर प्रत्येक ज्ञानधारा को नौ उपधाराओं में विभाजित किया गया। प्रत्येक उपधारा के भीतर भी खण्डों का विभाजन है।
गुहा की प्राच्य वर्गीकरण पद्धति को बहुत से पुस्तकालयों ने अपनाया- इलाहाबाद की भारतीय कांग्रेस की लाइब्रेरी, काशी विद्यापीठ, बीकानेर की राजकीय लाइब्रेरी और कराची का केंद्रीय सार्वजनिक पुस्तकालय। इस पद्धति का शीर्षक यह भ्रम दे सकता है कि यह प्राच्य और पुरानी किताबों को सजाने के लिए ही है, लेकिन हकीकत में इसने पश्चिमी दशमलव पद्धति से बहुत कुछ लिया है और केवल इस मामले में ‘प्राच्य’ है कि इसने भारतीय मनीषियों द्वारा वर्गीकृत ज्ञान की प्राच्य धाराओं को सम्मिलित किया है।
भारत में लाइब्रेरी साइंस के जनक कहे जाने वाले रंगनाथन की कोलन पद्धति 1933 में प्रकाशित हुई थी, जबकि सतीश चंद्र गुहा की प्राच्य पद्धति एक साल पहले ही आ चुकी थी। इसलिए किताबों की आधुनिक और देसी वर्गीकरण पद्धति को जन्म देने का वास्तविक श्रेय बनारस के गुहा को जाता है। सतीश चंद्र गुहा देश के पहले शिक्षक थे जिन्होंने भारत को अपनी ज्ञान परंपरा को सहेजने का हुनर सिखाया, भले ही उन्हें आज भुलाया जा चुका है और उनकी एक अदद तस्वीर तक कहीं उपलब्ध नहीं है।
(ए. के. ओहदेदार लिखित ‘द कंट्रिब्यूशन ऑफ ए बंगाली ऑफ वाराणसी टु लाइब्रेरी साइंस’ पर आधारित)
