1826 के झरोखे से

चढ़ती बारिश है, सांप काट ले तो क्या करें? एक प्राचीन नुस्खा

देश में इतनी तरक्‍की हो गई, लेकिन आज भी लोग सांप के काटे से मर जा रहे हैं और त्‍योहार के दिन घर में मातम फैल जा रहा है। पंजाब के जगरांव में बस्सियां गांव की कहानी दिल तोड़ने वाली है। पहली कक्षा में पढ़ने वाली जसप्रीत (6 साल) आज अपने बड़े भाई जोबनप्रीत (8 साल) को राखी बांध रही होती अगर परसों रात बाहर सोते वक्‍त दोनों को सांप ने नहीं काटा होता। अस्‍पताल भी भाई-बहन की जान नहीं बचा सका।

भादो की बारिश चढ़ते ही सांपों का कहर इस देश में आम है। हर साल यहां औसतन तीस से चालीस लाख लोगों को तो सांप काटते ही हैं। उनमें पचास से साठ हजार लोग दम तोड़ देते हैं। पिछले चौबीस घंटे में केवल गूगल से खोजने पर पता चलता है कि ऐसी दर्जनों घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं। सही और मौके पर मिलने वाले उपचार के अभाव में भारत दुनिया भर में सर्पदंश की राजधानी बन चुका है।       

ऐसा नहीं है कि सांप पहले नहीं काटते थे या लोग मरते नहीं थे, लेकिन स्‍थानीय स्‍तर पर उपलब्‍ध देसी इलाज बहुत से लोगों को बचा भी ले जाते थे। अब संपेरों, ग्रामीण उपचारकों आदि का टोटा पड़ता जा रहा है। पीढ़ी बदलने से लोगों का पारंपरिक ज्ञान खत्‍म हो रहा है। अस्‍पताल ऐसे में आखिरी वक्‍त में बहुत कुछ नहीं कर पाते।

समस्‍या की गंभीरता और विकरालता को देखते हुए 2024 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी‍ जिसमें सांप के काटे का इलाज करने वाले एंटी-वेनम की अनुपलब्‍धता पर सवाल खड़े किए गए थे। उस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि वह राज्‍यों के साथ मिलकर ‘कुछ करे’। यही बात उसने याचिकाकर्ता से भी कही थी। क्‍या करना है, इसको लेकर कोई स्‍पष्‍ट दिशानिर्देश नहीं था।


बनारस में नागपंचमी पर ऐसी तस्वीरें सुरक्षा और आशीर्वाद के लिए घर घर लगाई जाने की परंपरा है

प्रसंगवश, ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ के 7 नवम्‍बर 1826 के अंक में सांप के विष की औषधि प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक था- ‘सर्प दंशन विष उतारने की ओषधि’। इसे नीचे अविकल प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख को ‘विशाल भारत’ में पुनर्प्रकाशित करने वाले ब्रजेन्‍द्रनाथ बनर्जी ने साथ में अपनी टिप्‍पणी लिखी है कि ‘’मालूम नहीं यह औषधि कहां तक उपयोगी है’’!

‘’सभों के उपकार के निमित्त किसी एक दयावान ने इण्डिया गेजेट नाम के अंग्रेजी अखबार में सांप काटने के विष उतारने की औषध छपवा दी है और इतनी उनकी प्रार्थना है कि इसका उल्‍था और भाषों में होके सब जगह फैल जाय ओ बड़े बड़े आदमी अपनी जमीदारी ओ तालुकों पर छोटे बड़े सब को जनाय देवें इस लिए हम लोगों ने इस का उल्‍था कर सब के हितार्थ प्रकाश किया।‘’

‘’दो मौताद नौसादर ओ उसकी चौथी मौताद भर गरम पानी में घोल के एक कांच के बरतन में भर के उस में एक मौताद भर चूना मिलाके उस बरतन में ढट्ठी लगा देवे और पंदरह अथवा बीस अंगरेज़ी मिनट वा पलमें उस भांडे को झले फिर धर देवे। जब गाद बैठ जाय तब ऊपर ऊपर का अलग एक दूसरे कांचके बरतन में डाल लेवे ओ तलछट निकाल के पिछले बरदतन में ढट्ठी देके धर रखे। जब किसी को सांप डसे उस समय वह दो चमची वा बारह आना भर लेके छोटी एक कटोरी में पानी मिला के रोगी को पिलावे। उसके कुछ एक रहके फिर तीन चमची व अठारह आना भर उसी प्रकार पानी में मिलाके रोगी को पिला देवे। जो उस रोगी को जहर आवने लगे तौ फिर वही तीन चमची भर थोड़े से पानी में मिला देवे पर वह रोगी जैसा चंगा होता जाय वैसे वैसे औषध की भी मौताद घटाके देता जावै। एशिएटिक निऊस, 5 नवम्‍बर।‘’  


(कवर तस्वीर 1945 में कलकत्ते के सँपेरों की है, स्रोत: विकिपिडिया)