दुनिया 200 साल बाद

बनारस में तहज़ीब के मरकज़ का मलबा देखिए…

दोपहर को चुकी थी हरिकथा के चलते। हम लोग पीछे से घुसे। यानी चौक थाने के बगल वाली गली से। बहुत नहीं गए होंगे। बमुश्किल पचास मीटर कि मलबे के पहाड़ से रास्‍ता बंद था। बैरिकेड लगे हुए थे पुलिस के। एकाध सिपाही दाएं बाएं कर रहे थे। इस पचास मीटर में दाएं बाएं तीन चार मकान टूटे पड़े थे। उन्‍हीं के बीच बाजार जगमग था। दो-तीन युवा नुक्‍कड़ पर खड़े होकर यही सब बतिया रहे थे- अबे, आज का है दालमंडी? हमरे बाप दादा के जमाने का है

उन्‍हीं से हमने आगे जाने के बारे में पूछा। वे बोले बाएं कटरे में से होकर निकल जाओ। कटरे में होकर गोलियाते हुए हम आगे निकले तो गोल गोल घूम फिर कर वापस बुलानाला निकल आए। सीधा रास्‍ता एकदम बंद था। हमें उसका थोड़ा भी अंदाजा नहीं था। तय पाया गया कि शाम को एक राउंड फिर मारा जाए, अबकी दूसरी तरफ से।

वो शाम रमज़ान की पहली थी। रोज़े शुरू हो रहे थे। उम्‍मीदन नई सड़क पर अच्‍छी खासी भीड़भाड़ थी। जितनी आम तौर से रहती है उतनी तो थी ही लेकिन त्‍योहार की खरीदारी करने वाले खासकर गलियों में ठुंसे पड़े थे। उन्‍हीं गलियों में, जहां से तबाही का मंज़र शुरू होता था।

हमें किसी ने नहीं रोका। न वीडियो बनाने से न फोटो खींचने से। हम पूरे साढ़े छह सौ मीटर चलते गए ईंट, कंकड़, मलबे और कचरे के ऊपर से। और लोग भी खरामा खरामा ठोकर बचाते हुए किसी तरह चले जा रहे थे। कहीं दाएं मकान टूटा, तो कहीं बाएं बारजा। कहीं पूरा का पूरा भवन ही गिरा दिया गया था। एकाध जगहों पर तो ऐसा लगा जैसे इनसानी सभ्‍यता की भरी पूरी पुख्‍ता दीवार में बड़ा सा छेद कर के रिक्‍त स्‍थान बना दिया गया हो। ऐसी ही एक खाली जगह पर बैनर लटका था कि फलानी दुकान अब कटरे के भीतर चली गई है।

कुछ देर एक कपड़े की दुकान पर हम ठहरे। थोड़ी बातचीत की। उन्‍होंने बताया कि तोड़फोड़ का काम दिन भर चलता है लेकिन शाम को चार बजे के बाद बंद हो जाता है। उसके बाद ही बैरिकेडें हटाई जाती हैं। हम उस जगह पर पहुंचे जहां दिन में बैरिकेड मिला था और मलबे का पहाड़ रास्‍ते में खड़ा था। अभी पहाड़ को पठार बनाकर रास्‍ता देने की पूरी कोशिश की गई थी। आवाजाही चालू थी। बैरिकेड एक साइड में था।

कुल मिलाकर साढ़ छह सौ मीटर की दालमंडी की सीधी गली में कम से कम नहीं तो सौएक मकान-दुकान जरूर टूटे हुए दिखे। जो बचे थे उन्‍हीं से बाजार चल रहा था। ऐसा लगता था कि मलबे के सागर में अपने लगभग उजड़ने वाले टापू का शटर खोले दुकानदार बैठे हों। एकदम मुन्‍ना मारवाड़ी की याद आन पड़ी, जो काशी विश्‍वनाथ कॉरीडोर बनाए जाने के दौरान सबसे अंत तक अपनी दुकान थामकर टापू की तरह पड़े हुए थे। अभी वही हाल सैकड़ों दुकानदारों और मकान मालिकों का है। अजीब तरीका है कि एक लाइन से दुकानें नहीं तोड़ी जा रहीं। रह-रह के विध्‍वंस के सुराग मिलते हैं।



अगले दिन लक्ष्‍मी चायवाले के यहां विजय मिला। उसका हड़हा सराय में गहने का कारोबार है। तुम्‍हारा भी जाएगा? नहीं, हम लोग तो बच जाएंगे। उसके जवाब में एक भरोसा दिखा। उसने साफ कहा कि हिंदुओं का उतना नहीं टूटेगा जितना मुसलमानों का टूट रहा है। उसका कहना था कि हड़हा सराय शायद न टूटे। वहां पचास परसेंट हिन्दू हैं। दालमंडी में दस परसेंट है। वैसे भी उसके दुकान पर काम करने वाले सब ढाई ढाई लाख लेकर अपना मकान बना चुके हैं और उन्हें कोई फिक्र नहीं। वे सब भाजपा के वोटर हैं। उसने बताया- मेरी दुकान में काम करने वाले बिलकुल चिंतित नहीं।

फिर उसने अजीबोगरीब कहानियां सुनानी शुरू कीं अपने जानने वालों की, जिन्‍हें नोटिस मिला है। कहानियां भले हँसी मजाक में उसने सुनाईं लेकिन उसके कहन में हलका-सा दर्द था जब वो कह रहा था- बहुत बुरा हो रहा है गुरु मुसलमानों के साथ!

एक मुस्लिम व्यापारी को एक करोड़ पंद्रह लाख मुआवजा मिल रहा था। वो अर्जी लेकर डीएम के पास गया। उसका मुआवजा घटाकर पचासी लाख कर दिया गया और डीएम ने कहा: इसलिए कम किया गया है कि हफ्ते भर में बिल्डिंग और जर्जर हो गई है, और देर करोगे लेने में तो कोई और अधिकारी आएगा और मुआवजा घटाकर पचहत्तर लाख कर देगा। काहे? उस व्‍यापारी ने मासूमियत से पूछा। जवाब आया- हफ्ते भर में बिल्डिंग और जर्जर हो जाएगी न! विजय के अनुसार उसका मकान कम से कम चार करोड़ का था।

उसका जानने वाला एक और व्यापारी बहुत माल लगाकर अपना मकान बनवाया था। उसने महीने भर की मोहलत मांगी थी कि धीरे धीरे सामान निकलवा दें फिर खुद ही गिरा देंगे। अगले ही दिन उसके यहां जेसीबी आई और खिड़की को नोच कर दीवार गिरा दी। विजय के मुताबिक वो रो रहा था।



विजय कह रहा था कि बहुत बर्बर ढंग से प्रशासन इस बार तोड़फोड़ कर रहा है। स्टे लेकर आने वालों की सुन नहीं रहा। इतना बुरा कभी नहीं हुआ था, ये सच है लेकिन…। इस लेकिन में ट्रेन में मिली श्रीवास्‍तवजी की बिटिया से लेकर जय सिंह तक सबकी बात का मर्म छुपा हुआ है। विजय बोला- जब मंदिर टूटा तब कुछ नहीं हुआ तो एक गली के टूटने से क्या होगा। हमारी तो कितनी गलियां लुप्त हो गईं।

लेकिन उस समय तो हल्‍ला हुआ रहा? बाकायदे आंदोलन चला था? इस जिज्ञासा पर उसका कहना था कि जब कॉरिडोर के लिए सात सौ मकान और मंदिर टूट रहे थे तब तो ‘ये लोग’ चुप थे, कोई यूट्यूबर नहीं बोल रहा था। आज एक मकान टूटता है तो घंटे भर में बाईस यूट्यूबर चिल्लाने लगते है। दालमंडी की तोड़फोड़ पर पिछले दिनों वीडियो बनाने वाली एक महिला यूट्यूबर को गाली देते हुए वह कहता है कि उनका तो हाथ कांप रहा था! तब कहां थीं जब मंदिर टूट रहा था?   

विजय अविमुक्तेश्वरानंद से भी दुखी हैं, जिन्‍होंने मंदिरों को तोड़े जाने के खिलाफ मंदिर बचाओ आंदोलनम चलाया था। वह कहता है- अविमुक्तेश्वरानंद की एक आवाज पर लोग जुट गए थे उस समय। अब वो शंकराचार्य बन गए हैं लेकिन मुख्यमंत्री स्तर पर बहसबाजी में लगे हुए हैं। पहले वाले शंकराचार्य सब प्रधानमंत्री से सीधे टक्कर लेते थे। स्वरूपानंद पर भले कांग्रेसी होने का आरोप था लेकिन उनकी बात का वजन था। अविमुक्तेश्वरानंद ने शंकराचार्य का वजन गिरा दिया है। अब योगी भी कोई हल्के आदमी नहीं हैं, नाथ संप्रदाय के प्रमुख हैं।

मने दालमंडी का मामला बनारसियत का नहीं है, ये लोग वो लोग का है। दलील यह है कि जब मंदिर टूटने पर ये लोग नहीं बोले तो इनके लिए अब कौन और क्‍यों बोलेगा। ब्रेख्‍त की कविता बनारस में उलटबांसी बन के साकार होती दिखती है। प्रशासन का नोटिस देखकर विजय की कही यह बात सच लगती है कि इस बार प्रशासन कुछ ज्‍यादा बर्बर रुख अपना रहा है। नोटिस की पहली ही लाइन कहती है: ऐसा पतीत होता है कि आपका भवन जर्जर है…। और अंतिम पंक्ति तीन दिनों के भीतर जर्जर भवन से पैदा हुए संकट को दूर करने का अल्टीमेटम देती है। तीन दिन में भला कौन अपना मकान अपने हाथ से तोड देगा? आप खुद नहीं तोड़ेंगे तो बुलडोजर इंतजार में हैं ही।



दालमंडी में हम एक मोड़ पर मलबे के बीच फंसे थे उस शाम। हमारे आगे एक अधेड़ महिला चल रही थीं जो चलते-चलते ठिठक गई थीं और अपने फोन पर किसी से कह रही थीं- भैया, सब खंडहर हो गया! उनकी आवाज में एक हदस थी। यह कहते हुए वे अपना मुंह छुपा रही थीं। बाकी लोग यहां-वहां बदहवास से देख रहे थे कि ये क्‍या हुआ। एक आदमी अपनी दुकान के मलबे पर झुक कर कुछ खोज रहा था।

कुछ ही दिन बचे हैं जब लोग उस गली को खोजेंगे जिसमें मुहर्रम पर उस्‍ताद बिस्मिला खां शहनाई बजाते थे। जहां कभी महीने भर के लिए सही मिर्जा गालिब आकर ठहरे थे। जहां कभी गोविंदा की मां मशहूर शास्‍त्रीय गायिका निर्मला देवी रहा करती थीं। जहां 1905 में पहला गाना रिकॉर्ड करने वाली गौहर जान हुआ करती थीं। जहां गाने वाली रसूलन बाई और जद्दन बाई की सुर ल‍हरियां आज भी बुजुर्गों की स्‍मृति में पैबस्‍त हैं। जिन गलियों में पारसी थिएटर के पितामह आगा हश्र कश्‍मीरी ने जिंदगी के लम्‍बे गुजारे थे और जहां के एक काले धूसर कमरे में लच्‍छू महाराज बिना बिजली के रियाज़ किया करते थे।

दालमंडी ने ही कभी दारा शुकोह को पनाह दी थी। उस वक्‍त कोई औरंगजेब इसे तोड़ने नहीं आया था। आज दस हजार दुकानें और मकान जमींदोज होने के इंतजार में हैं। दालमंडी का जाना बनारस के दिल का थम जाना है, जिसके साथ ही बनारसी इतिहास और संस्‍कृति के कई अध्‍याय खुद-ब-खुद खत्‍म हो जाएंगे। बनारस का आदमी अगर इस तोड़फोड़ पर खुश है, जैसा कि जय सिंह का कहना है, तो कोई और कुछ कहने वाला कौन होता है।