श्रीवास्तवजी की बिटिया जिस पीढ़ी और पृष्ठभूमि से आती है ऐसा कहने में उसका दोष मानना ज्यादती होगी। दरअसल बीते कुछ दशक में सरकारी स्कूलों का ढांचा लगभग खत्म होते जाने और निजी शिक्षण संस्थानों के उनकी जगह ले लेने का यह असर दिखता है वरना किसी कौम से किसी को भी नफरत होने की क्या वजह होनी चाहिए थी।
स्वाभाविक है कि लोग एक-दूसरे को करीब से नहीं जानते क्योंकि किसी भी सार्वजनिक स्पेस में वे एक दूसरे के साथ कुछ घंटे भी रहे नहीं, जैसा कि सरकारी स्कूलों में होता था। वे एक दूसरे के साथ उठते बैठते नहीं, उनके घर नहीं आते जाते क्योंकि इसे प्रोत्साहित करने वाली सार्वजनिक जगहें अब नहीं बची हैं। इसीलिए केवल सुनी सुनाई पर विश्वास कर के गैरों के बारे में लोग अपने खयालात बनाते हैं। जोयिता यही तो कह रही थीं कि आज की पीढ़ी के पास अपने विचार नहीं रह गए। सब इनफ्लुएंसरों के भरोसे चल रहा है। लोग इनफ्लुएंस हो रहे हैं।
मामला हालांकि केवल आज की पीढ़ी का नहीं है कि उन पर दोष डालकर पिछली पीढ़ियों को बरी कर दिया जाय। सब किया धरा तो पिछली पीढ़ियों का ही है जो साझा जगहों को खत्म किए जाने को चुप मार के देखती रहीं। चलिए, उदारीकरण के बाद तीन दशकों में सरकारी स्कूल गए तो गए। सरकारी अस्पताल भी नहीं रहे जहां सब एक ही कुएं से पानी पीते थे। उठने बैठने की जगहें, चौपाल, कॉफी हाउस, सब अतीत की बात हुए।
सरकारें भी वैसी नहीं रहीं जो गंगा-जमुनी का भरम देती हों। अब तो एक कुआं, एक श्मशान और एक कब्रिस्तान स्वीकार्य राजनीतिक नारा ही बन चुका है। सबका अपना-अपना। कुछ भी साझा नहीं। फिर भी, पूंजीवाद की बुनियादी तमीज ये है कि बाजारों को साझा रखा जाए। बाजार शायद वह अंतिम सार्वजनिक जगह है जहां कोई किसी की जात या धर्म नहीं पूछता कुछ बेचते या खरीदते वक्त। हमारे उस्ताद मरहूम अनिल चौधरी कहते थे कि ये साले तमीज से पूंजीवाद को ही चला लें तो बड़ी बात।
उनकी बात को समझने के लिए आइए दालमंडी की सैर पर चलते हैं। दालमंडी बनारस के सबसे पुराने बाजारों में है जो शहर की दो केंद्रीय सड़कों को आपस में एक लंबी सी गली या कहें गलियों के जाल से जोड़ता है। एक सड़क मैदागिन से चौक-गोदौलिया होते हुए सीधे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक जाती है जिसके किनारे विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद हैं और गंगा के सभी प्रमुख घाट हैं। यह शहर का भीतरी और पुराना हिस्सा है। शहर को थोड़ा बीचोबीच से काटने वाली दूसरी सड़क वरुणापार से लहुराबीर होते हुए गोदौलिया के गिरजाघर चौराहे तक जाती है और आगे रेवड़ी तालाब होते हुए अंतत: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक पहुंच जाती है। इस सड़क को चेतगंज के आगे नई सड़क कहते हैं। यह मुस्लिम बहुल बाजार का इलाका है। इसी सड़क पर बेनियाबाग के आगे से बाईं ओर दालमंडी की गली कटती है जो कोई सात सौ मीटर चलने के बाद सीधे पुरानी वाली सड़क पर स्थित प्राचीन चौक थाने (जो आजकल कमिश्नरी बन चुका है) के पीछे से विश्वनाथ मंदिर के ठीक पहले जा मिलती है। यही गली तोड़ी जा रही है। इसे सत्रह मीटर चौड़ा किया जाना है। मतलब गली में बने मकान दुकान सब निपटाए जाने हैं।
मामला केवल दालमंडी को तो़ड़ने तक सीमित नहीं है। आगे रेवड़ी तालाब के पुनर्निर्माण का भी ठेका निकल चुका है। वह भी मुस्लिम बहुल इलाका है। इस सब की जड़ में काशी को क्योटो बनाने वाली केंद्रीय परियोजना है, जिसकी पहली कील बनारस की छाती में 2019 में गड़ी थी जब विश्वनाथ मंदिर को गंगा से सीधे जोड़ने के लिए करीब ढाई सौ विग्रहों, इतने ही भवनों और एक समूची सभ्यता को हमेशा के लिए मिटा दिया गया था जिसमें गलियां थीं, चौक चौराहे थे, पुस्तकालय थे और प्राचीन देवालय थे। उसकी कहानी भी हमने कही थी, लेकिन तब मंदिर बचाओ आंदोलनम से लेकर धरोहर बचाओ आंदोलन तक संक्षिप्त ही सही, पक्कामहाल या पक्कापा में एक आंच उठी थी। हम कहानी कहते न कहते, लोग खुद कुछ समय के लिए खड़े हुए थे।
आज शहर के बीचोबीच वही सब बीते कुछ महीनों से हो रहा है पर पूरा बनारस शांत है। किसी को परवाह नहीं कि जिस बाजार से लोग जनम से लेकर मरण तक और शादी ब्याह से लेकर तमाम शुभ आयोजनों के लिए खरीदारी करते हैं, जहां से समूचा पूर्वांचल अपने खुदरा व्यापार के लिए थोक खरीदारी करता है वहां मौजूद बरसों पुरानी दुकानों को जमींदोज कर दिया गया है। श्रीवास्तवजी की बिटिया इस शहर के बाशिंदों में से महज एक है, वो भी उस पीढ़ी से जिसे कोई इतिहासबोध नहीं कि बनारस शहर को बनाने में दालमंडी की भूमिका क्या रही है।
उस सुबह जगतगंज के अपने तकरीबन स्थाई ठिकाने से हम यही सोचकर निकले थे कि चलें जरा दालमंडी का हाल ले लिया जाय। दरअसल, पिछले दिनों दालमंडी को लेकर यूट्यूब के कुछ चैनलों पर काफी हो हल्ला कटा था। हम लोगों को तो पिछले साल से ही इसकी पल पल की खबर थी। भाई राघवेंद्र मिश्र ने तो इस तोड़फोड़ परियोजना की शुरुआत में ही दालमंडी की ऐतिहासिकता पर इतिहासकार आरिफजी और पत्रकार लारीजी के निर्देशन में दो बढि़या फिल्में बना दी थीं, लेकिन बनारस कचौड़ी खाकर सोता रहा।
हम उस दिन सोकर उठे और बासी मुंह नीचे उतरे तो सोते हुए बनारस के एक खास प्रतिनिधि जय सिंह अचानक मिल गए। महादेव और हालचाल के बाद ऐसे ही मुंह से निकल गया कि जरा दालमंडी होकर आवें। उसके बाद हरि अनंत हरि कथा अनंता का साक्षात चरितार्थ होना ही बदा था। यानी दालमंडी गई तेल लेने…
