जिस दारा शुकोह ने बनारस में रहकर उपनिषदों का अनुवाद किया और ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम का ऐतिहासिक ग्रंथ रच दिया, उसकी हत्या का सबब बना उसका भाई शूजा जिसकी सूबेदारी बंगाल में थी। दिलचस्प है कि उससे पहले बनारस ही वह जमीन थी जहां दारा के बेटे ने शूजा को मात दी थी। बाद में दोनों भाई औरंगजेब के हाथों निपट गए। दारा मारा गया, शूजा अराकन भाग गया। मने दिल्ली की सत्ता ने न बनारस को बख्शा, न बंगाल को।
‘सिर्र-ए-अकबर’ लिखे जाने के कोई दो साल बाद दारा के निजी चिकित्सक बनकर आए विदेशी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर। दारा की मौत तक बर्नियर उनके साथ बने रहे, बाद में औरंगजेब के दरबार में लग गए। अपने यात्रा वृत्तान्तों में बर्नियर ने कहीं लिखा है कि ‘’बंगाल के साम्राज्य में सौ प्रवेश द्वार हैं लेकिन लौटने का दरवाजा एक भी नहीं’’। इस वाक्य के सियासी मायने चाहे जो हों, पर दारा के जीते जी उनके लिए बंगाल के सौ में से एक भी दरवाजा कभी नहीं खुल सका। वो तो काफी बाद में बनी बंगाल की एशियाटिक सोसायटी ने हिंदू धर्म और इस्लाम की समानताओं पर उनकी किताब ‘मजमा-उल-बहरीन’ का प्रकाशन कर के उनके प्रति अपना प्रायश्चित दर्ज किया।
गंगा के हुगली के बीच फैले करीब पौने चार सौ साल के इस वक्फ़े में हिंदू धर्म और इस्लाम के बीच दूरियां चाहे जितनी भी कायम हुई हों, एक नई समानता लगातार बनती गई। समय के साथ दोनों मजहब अपने-अपने तईं एकलोइया होते गए। बनारस के हिंदू और बंगाल के मुसलमान इस बदलाव का अक्स हैं। कलकत्ते की सड़कें जब रमज़ान के बाजारों से जगमग होती हैं, बनारस में नाव पर इफ्तार करते कोई दर्जन भर नौजवानों को गिरफ्तार कर लिया जाता है।
इंतेहा ये हुई है कि बनारस के मुसलमान हाशिये पर पहुंच कर सड़कों से लगभग गायब-से हो गए हैं, जबकि बंगाल की धरती उनका मरकज़ बन चुकी है। यह अनायास नहीं है कि जो बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश में 1992 में तोड़ी गई थी, वह बंगाल के मुर्शिदाबाद में 2026 में बनाई जा रही है। बंगाल का यह सबसे नया प्रायश्चित उसे सियासी तौर से एक बार फिर बनारस के करीब ला रहा है। इस बात को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा गए बगैर नहीं समझा जा सकता।

बेलडांगा हमेशा से अपने सूती गमछों के लिए देश भर में मशहूर रहा है। अचानक 2025 के दिसंबर में वह किसी और कारण से सुर्खियों में आ गया। बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के एक बिफरे हुए विधायक हुमायूं कबीर ने वहां बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान कर दिया। पार्टी ने आनन-फानन में हुमायूं को यह कह कर बाहर निकाल दिया कि वे भारतीय जनता पार्टी की मदद से सूबे के माहौल को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उसके बाद हुमायूं ने अपनी एक पार्टी बनाई और 6 दिसंबर को बेलडांगा रेलवे स्टेशन से रेजीनगर की ओर जाने वाली सड़क पर कोई चार किलोमीटर आगे एक खेत में बाबरी मस्जिद की नींव रख दी। पलट कर हुमायूं ने भी ममता बनर्जी के ऊपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शह पर काम करने का आरोप लगा दिया।
कलकत्ते से बेलडांगा बमुश्किल दो सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन दिलचस्प है कि बाबरी को बनाए जाने की घटना वहां चर्चा का विषय नहीं बन सकी। ठीकठाक पढ़े-लिखे लोगों ने इसे हलके में लिया। बेशक दिल्ली तक इसकी खबरें छपीं, लेकिन हुमायूं कबीर को बहुत से बहुत ‘नोटोरियस’ कह कर कलकत्ता और दिल्ली के विद्वानों ने टाल दिया। इसकी एक वजह तो यह थी कि किसी ने बेलडांगा जाकर बाबरी निर्माण स्थल को देखने की जहमत नहीं उठाई। दूसरे, इस बात को कोई शायद हवा भी नहीं देना चाह रहा था।
शायद इसी बात ने हमें वहां जाने का हौसला भी दिया वरना कलकत्ते पहुंचते ही जिससे भी चुनावी बात करो उसके मुंह से बस एक ही नाम निकल रहा था- मटुआ। ऐसा लगता था कि पिछले चुनाव में दिल्ली की मीडिया ने जिस मटुआ समुदाय को इतनी हवा दी थी उसे इस बार कलकत्ते के बौद्धिकों ने सच मानकर अपना लिया हो और भाजपा की कमजोर जमीन का हवाला देने के लिए उनके पास बस यही बहाना बचा हो। हमने सीपीएम की पृष्ठभूमि वाली पुरानी पत्रकार शिखा मुखर्जी से पूछा कि बाबरी का क्या मामला है। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि हुमायूं खुराफाती है, आप लोग रानाघाट जाओ और मटुआ पर काम करो। हमने तृणमूल के लिए चुनाव का प्रबंधन करने वाली प्रशांत किशोर की कंपनी आइपैक के आदमी से यही पूछा। उसने भी यही कहा कि मटुआ इस बार असली स्टोरी है, बाबरी का कोई असर नहीं होने वाला।
सवाल यह नहीं था कि असर के अंदाजे के हिसाब से दौरा कर के कहानी लिखी जाए। सवाल यह था कि जहां के असर का अभी कोई अंदाजा नहीं है उसका जायजा लिया जाए, चाहे वह कितना ही मुश्किल क्यों न हो। इसीलिए एक सुबह हम सियालदह से लालगोला मेमू पकड़ कर बेलडांगा निकल पड़े, यह जाने बगैर कि बाबरी की नींव जहां रखी गई है वह जगह किधर है, कहां है। सही सही पता होता तो हम शायद रेजीनगर ही उतर जाते। नहीं पता होना कभी-कभार ठीक ही होता है।
चार घंटे सफर के बाद बेलडांगा के छोटे-से स्टेशन से बाहर निकलते ही ई-रिक्शों का सैलाब दिखा। अव्वल तो ये नहीं पता था कि जाना कहां है। दूसरे भाषा का भी संकट था और मसला ऐसा नाजुक कि बाबरी बोलते ही सामने से आने वाली प्रतिक्रिया का कोई अंदाजा तक नहीं था कि हमें कैसे लिया जाता। बाहर कुछ दूर हम पैदल ही गए थे कि रास्ते में एसडीपीआइ के झंडे दिखाई दिए। ओबीसी और नागरिकता के प्रश्न पर एसडीपीआइ की किसी भेदभाव विरोधी रैली का हवाला देते एक पोस्टर भी दीवार पर लगा था जो शायद 27 जनवरी को हुई थी। वहीं बाएं हाथ पर एक गली पड़ी जो भाजपा के झंडों से पटी हुई थी। इतने भाजपा के झंडे हमने कलकत्ते में भी एक साथ नहीं देखे थे। कलकत्ते में एसडीपीआइ का भी पोस्टर हमें कहीं नहीं दिखा। हां, सिंगुर में जरूर पूरा का पूरा बाजार भगवा था। भाजपा और एसडीपीआइ दोनों की उपस्थिति बता रही थी कि यहां माहौल कितना संगीन हो सकता है।
वहीं सामने से एक सम्भ्रान्त-से बुजुर्ग आते हुए दिखे। वे एक दुकान में घुसने ही जा रहे थे कि हमने टोक कर उन्हें चाचा कहते हुए अपनी ओर मुखातिब किया, फिर पूछ दिया कि क्या आप हिंदी समझते हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी दोनों जानते थे। अपना परिचय देकर हमने उनसे यक्ष प्रश्न पूछा- बाबरी कहां बन रही है? आगे से बाएं, यहां से तीन-चार किलोमीटर दूर, रोड पर ही है- उनका जवाब इतने पर ही नहीं रुका। उन्होंने अपनी राय भी जाहिर की- कोई समर्थन में नहीं है इनके, यहां के लोग नाराज हैं।
उनसे फारिग होकर हमने ई-रिक्शा रोका और उसे बाबरी चलने को कहा। रिक्शावाला मुसलमान था और उसे अच्छे से पता था कहां जाना है। सौ रुपये में आने जाने का सौदा कर के हम बैठे। मुख्य सड़क पर आते ही धूल के गुबार और जबरदस्त जाम ने हमें घेर लिया। वह सड़क चौड़ी की जा रही थी और चौतरफा ट्रकों की कतार लगी हुई थी। बाएं हाथ पर ममता बनर्जी का एक कटआउट लगा हुआ था जिस पर बांग्ला में एक नारा लिखा था: बांग्लार माटी बांग्लार पथ, स्वनिर्भरता बांग्लार शपथ। यह पथश्री-रास्ताश्री नाम की सड़क परियोजना का प्रचार था जिसके तहत समूचे सूबे में कोई 20000 किलोमीटर लंबी सड़कें 9000 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जानी है। कटआउट का नारा सड़क पर उड़ रही धूल में जीवंत था।
कच्ची पटरी पर धूल उड़ाते हुए किसी तरह रिक्शा आगे बढ़ा और एक परिसर के विशाल दरवाजे पर जाकर ठहर गया जहां कम से कम पचासेक रिक्शे पहले से खड़े थे। उसने एक पन्नी में लिपटे कुछ कागजात निकाले और हमसे बांग्ला मिश्रित हिंदी में कहा कि दो मिनट में आता हूं, कुछ कागज जमा करवाने हैं। वह गाड़ी पार्किंग में लगाकर निकल लिया। पीछे धूल मुसलसल उड़ती रही। वह नगरपालिका की बिल्डिंग थी। भीतर राज्य सरकार की ताजातरीन योजनाओं को बांटने वाले शिविर लगे हुए थे। लोगों की भीड़ ऐसी गोया लंगर चल रहा हो। बाहर ममता बनर्जी का एक बड़ा सा होर्डिंग था। कोई पंद्रह बीस मिनट तक हमने उसका इंतजार किया। वह लौटकर आया तो थोड़ा निराश था। उसके कागज जमा नहीं हुए थे। उसने आगे जाने से इनकार कर दिया। हमने उससे इसरार किया कि बगल में खड़े रिक्शेवाले से सौदा करवा दे। बगलवाले को उसने समझा दिया कि कहां जाना है और कितने में, हमने सवारी बदली और फिर चल पड़े। जाम आगे जाकर खत्म हो गया था।



बमुश्किल दस मिनट में हम हाइवे पर थे जिसके दोनों ओर खुदे हुए, बाड़ लगे, खेत ही खेत थे। हवा में लहराते हरे झंडे और बड़े-बड़े होर्डिंग बाबरी के होने की गवाही दे रहे थे। एक तम्बू भी लगा था सुनसान सा। वहां कोई नहीं था। ऊपर एक बड़ा सा बोर्ड लगा था बंगाली में- इंडियन बाबरी होटल एंड रेस्टोरेंट। उस पर 26 दिसंबर, 2025 की तारीख लिखी थी और प्रोपराइटर का नाम था बच्चू शेख। मेनू के साथ मालिक का मोबाइल नंबर भी दर्ज था।
उसके अलावा जहां तक हमारी नजर गई, बस एक जेसीबी दिखा और कुछ स्टालों के बाहर खाली कुर्सियां पड़ी दिखाई दीं। रिक्शा साइड लगवाकर हम खुदे हुए खेतों में उतर गए। कोई पैंतीस बीघा जमीन, जिसकी तसदीक बाद में हुई, बारीकी से खुदी पड़ी थी। यही बाबरी मस्जिद की नींव थी। चौतरफा मिट्टी, ईंटें, मलबा, सरिया, डामर, गिट्टी बिखरी पड़ी थी। पूरा परिसर हरे रंग के झीने-से कपड़े से घेरा हुआ था। शायद वह बाउंड्री की सीमा रही होगी, जिसके पार भारत का तिरंगा लहरा रहा था।
पांच दस मिनट तक वहां टहलने के बाद हम हाइवे की ओर थोड़ा आगे बढ़े तो कुछ जिंदा स्टॉल नजर आए। कुछ लोग वहां मौजूद चहलकदमी कर रहे थे। ये अस्थाई दुकानें थीं। उन पर ‘आइ लव बाबरी’ लिखी हुई टीशर्ट, मग, लॉकेट, और कई किस्म के सजावटी सामान बिक रहे थे। सावधानीपूर्वक कुछ तस्वीरें उतारते हुए हम थोड़ा और आगे बढ़े। वहां एक दफ्तरनुमा जगह थी। तम्बू के भीतर पांच छह लोग बैठे हुए थे। उसके भीतर एक और कमरा था। यह निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद का आधिकारिक दफ्तर था। बाहर बाबरी का एक प्रस्तावित मॉडल रखा हुआ था। उसके बगल में वहां बनने वाले अस्पताल और होटल का भी मॉडल था। सामने एक शख्स बैठे थे जिनका काम निर्माण के लिए चंदा उतारना था। चंदे के लिए एक बारकोड लगा हुआ था।
हलके परिचय के बाद उन्होंने हमें एक छोटा सा कार्ड दिया जिस पर रमजान की तारीखें लिखी थी और पीछे वही चंदे वाला बारकोड बना हुआ था। दरयाफ्त करने पर उन्होंने बताया कि भीतर मैनेजर साहब हैं, उनसे मिला जा सकता है। हम भीतर गए। वहां दो लोग बैठे थे। जिन्होंने खुद को मैनेजर बताया, उनकी आंखों में एक अविश्वास सा दिखा। उनका नाम हसन था। उनके साथ एक और व्यक्ति था। परिचय के बाद हुई संक्षिप्त बातचीत में पता लगा कि बाबरी मस्जिद परियोजना के लिए कुल पचास बीघा जमीन ली जा रही है जिसमें से 32 बीघा पर मस्जिद, अस्पताल, स्कूल और होटल आदि बनाए जाने हैं। सन्नाटा इसलिए था कि क्योंकि रोजे के कारण मजदूर उस वक्त वहां नहीं थे। काम सुबह चलता था।
ठीक दो हफ्ते पहले वहीं पर हुमायूं कबीर एक मोटरसाइकिल रैली लेकर पलासी से आए थे। पहले उनकी योजना लंबी रैली करने की थी लेकिन बच्चों की परीक्षाओं के कारण उसे अनुमति नहीं मिली। फिर मोटरसाइकिल रैली केवल 22 किलोमीटर तक निकाली गई। हसन ने बताया कि कोई छह सात लाख लोग उस रैली के बाद हुई जनसभा में मैदान में इकट्ठा हुए थे जहां कबीर ने पूरी कुरान पढ़ी थी। भाईजान कल यहीं पर थे, कल भी आएंगे बारह बजे, यह बताते हुए हसन ने भरोसा जताया कि दो-तीन साल तो लग ही जाएंगे मस्जिद बनने में। उसने यह भी बताया कि पूरा मुर्शिदाबाद भाई के साथ है और वे चुनाव में जीतेंगे।
जिस पैमाने पर यह तैयारी चल रही थी, उसे देखकर अचरज होता है कि कलकत्ते में इसे इतनी गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा। बाहर बैठे शख्स ने गर्व से बताया कि चंदे में आने वाला पैसा रोज बोरों में भरकर वहां लाया जाता है और गिना जाता है। सैकड़ों करोड़ के इस प्रोजेक्ट ने लबे सड़क खेती और बाग की जमीनों के दाम आसमान पर पहुंचा दिए हैं। सड़क के उस पार तो अभी से ही जमीनें बिक चुकी हैं और होटल बन रहे हैं। वापसी में रिक्शेवाला बता रहा था कि कोई दस-पंद्रह लाख कट्ठा जमीन का दाम पहुंच गया है।
शायद इस रिक्शेवाले के पिता उसी सरकारी शिविर में कुछ कागजात जमा करवाने गए थे। वापसी में उसने उन्हें वहीं से उठाकर हमारे साथ बैठा लिया। कोई आधा घंटा जाम में फंसने के बाद समझ आया कि इस जगह पर देर तक रुकने का कोई ठिकाना नहीं मिलने वाला और लगे हाथ अगली गाड़ी पकड़ लेनी चाहिए। बेलडांगा का गमछा खरीदने की योजना भविष्य के लिए टाल दी गई। रेलवे स्टेशन के ठीक सामने बीच में से खुदी हुई सड़क के काफी आगे से हमने रिक्शा वापस मुड़वाया और टिकट खरीदकर प्लेटफार्म पर आ गए। कलकत्ता जाने वाली लालगोला पैसेंजर के आने का टाइम हो चुका था।
