दुनिया 200 साल बाद

दिल्ली में मोबाइल चोरों के नाम एक दिन

दिल्‍ली जब भी किसी न किसी बहाने गरमाती है, उसकी आंच दो चार दिन पहले से ही लोगों की जबान पर चढ़ जाती है और दो चार दिन बाद तक चढ़ी रहती है। अबकी छह जून के दो दिन आगे पीछे दिल्‍ली के लोगों से बात करने का अपना ही मजा था।

दो जून की रोटी कमाने में लगे सहरसा के एक ठाकुरजी माता सुंदरी कालोनी के बाहर अपनी नाई की दुकान में एक मौलाना की दाढ़ी बना रहे थे। वहीं दो और मौलाना बकरीद मनाने की थकन के बाद चौकी पर लेट कर सुस्‍ता रहे थे। एक सज्‍जन इस बात से परेशान थे कि लेबर नहीं मिल रहा है, काम कैसे चले। उनका मोबाइल बजा। फौरन तो पता ही नहीं चला क्‍योंकि कू कू की कोयल-सी आवाज आई। उस समय वे मुकेश का एक गीत गा रहे थे- जिस गली में तेरा घर न हो बालमा…।

उन्‍होंने जैसे ही फोन उठाया तब समझ में आया कि मोबाइल बज रहा था। उधर से जो भी आवाज आई हो उन्‍होंने कहा- लेबर ही ना मिल रहे भाई साब, दुकान की सटर कौन उठावे। बोलकर उन्‍होंने जोर का ठहाका लगाया और फोन रख दिया। ठाकुर उस्‍तुरा फेरता रहा।

दूसरे सज्‍जन को कुछ काम याद आ गया, वे स्‍कूटी उठाकर प्‍यार से निकल लिए। ठाकुर बोला- ऐसे फोन मत रखा करो, गायब हो जाएगा तो मेरा नाम लगाओगे। गुनगुनाते हुए मौलाना ने कहा- देख भाई, दुनिया भरोसे पर कायम है। मुझे भरोसा था कि आज लेबर नहीं आवेगी, लेटा पड़ा हूं। फिर उन्‍होंने ठहाका मार दिया। ठाकुर ने हाथ रोककर प्रसंग सुनाया- अभी दो दिन पहले रामलीला मैदान में वो शुक्‍ला का लड़का गया था, उसका मोबाइल चोरी हो गया। आजकल भाई साब किसी का भरोसा नहीं है। हवा में मोबाइल उड़ जाते हैं।

मौलाना बोले- अरे, कहां है शुक्‍ला? जवाब आया- गया हुआ है गढ़ में इलाज करवाने, बवासीर हो गई है उसे। मौलाना ने कहानी बना दी- अबे, एक मोबाइल खोने पर बवासीर हो गई। अभी देखियो कितनों को होती है जंतर-मंतर पर छह तारीख को। ठाकुर ने पूछा- वहां क्‍या है हुजूर? ‘मोबाइल वाले आ रहे हैं भाई। अमेरिका तक से। सब के सब वीडियो बनाते हैं। रील बनाते हैं। सारे कट्ठे हो रहे हैं। जन क्‍या बला है। कुछ काकरोच नाम से तो बता रहे थे।‘

ठाकुर ने फिर हाथ रोक दिया- काकरोच? भाई साब, गंदगी तो बहुत हो ही गई है। ये जो घुसपैठिए हैं न, बंगलादेसी, यही सब होंगे। विदेश से खूब पैसे आते हैं इनके पास।‘ मौलाना ने कहा- ‘भाई हम तो इसी देस के हैं। हमें क्‍या पड़ी है जंतर-मंतर की। बस लेबर दो दिन और न आए, छह तारीख के बाद आराम से काम करेंगे। वैसे भी बहुत ट्रैफिक रहेगा दो दिन शहर में।‘

छह तारीख को बताया गया कि जंतर-मंतर पर हुए काकरोच वाले प्रदर्शन में 93 मोबाइल फोन चोरी चले गए। बाद में दिल्‍ली पुलिस के एक अफसर को दावा करना पड़ा कि ये तथ्‍य गलत है, लेकिन उन्‍होंने ये नहीं बताया कि कितने फोन चोरी हुए। साथ में उन्‍होंने ये भी कहा कि जिनके मोबाइल फोन चोरी हुए हैं वे थाने जाकर रपट लिखवाएं। तब तक यदि रिपोर्ट ही नहीं लिखी गई तो पुलिस को पता कैसे चला कि 93 या 100 कितने मोबाइल चोरी हुए या नहीं हुए? खैर…

उस शाम उबर चालक पासवानजी ने सबसे काम की बात बताई। वो वहीं के जाम से बच बचा के लक्ष्मी नगर आ रहे थे। कह रहे थे कि भाई साब वहां तो मोबाइल कैमरों से बच पाना ही मुश्किल था, इतने फोन चमक रहे थे। अगर आप भीड़ में चले जाते तो किसी न किसी के वीडियो में आ ही जाते।

कितने आदमी थे वैसे? पासवानजी का कहना था कि प्रदर्शन करने वाले तो पांचेक सौ रहे होंगे, उनका वीडियो बनाने वाले एक नेता पर तीन तीन लोग थे। बाकी इतने ही पुलिस को आप जोड़ लो। वो भी वीडियो बना रहे थे। कुल मिला के पांच छह सौ पदर्शनकारी, डेढ़ दो हजार मोबाइल वीडियो बनाने वाले और डेढ़ दो हजार पुलिसवाले रहे होंगे, यानी पांच हजार मान लो आप। पांच हजार में अगर पचास सौ मोबाइल चोरी हो भी जाए तो किसी को क्‍या मतलब। इतनी बेरोजगारी है…!

उस दिन एक वीडियो आया जिसमें बताया गया था कि एक काकरोच ने ही दूसरे काकरोच का मोबाइल चुरा लिया। जिसका फोन चोरी हुआ था लड़के उस पर हंस रहे थे। एक लड़के का फोन जो सुबह दस बजे चोरी हुआ था वो दोपहर में बरामद हो गया। उसने बताया कि संसद मार्ग थाने में पुलिस ने 10-15 चोरों को बिठा रखा था क्योंकि खुद दिल्ली पुलिस के एक अफसर का मोबाइल चोरी हो गया था। इसी वजह से पुलिस मुस्तैद हुई और नौजवान का फोन मिल गया।