दुनिया 200 साल बाद

पर्यावरण पर पालेबाजी से आखिर किसकी जान पहले बच जाएगी?

देश के प्रधान पंच का नाम सूर्यकान्‍त है। न्‍याय के मंदिर के कंगूरे पर विराजे के इस सर्वोच्‍च सूर्य की कान्ति ऐसी है कि किसी की भी आंखें चुंधिया जाएं। आंखें ही क्‍या, सभी इंद्रियां शिथिल पड़ जाएं और आसपास के वातावरण की कोई संज्ञा ही न बचने पावे। क्‍योंकि अपने पर्यावरण का आपको थोड़ा-सा भी बोध हुआ और आपने चूं की, तो वे पूछेंगे, ‘’जहां दाव लगे वहीं?”

क्‍या अपनी इंद्रियों के सहज अनायास प्रयोग से हमें खुद को अब सप्रयास रोकना होगा ताकि आसपास की गंदी हवा, मैला पानी, काला आकाश, उर्वरकयुक्‍त धरती और कटते पहाड़ों से होने वाली असमय बारिश का कोई अहसास न हो सके? उनकी मंशा भले ऐसी न हो, पर वे ऐसा कह तो चुके हैं।

उन्‍होंने कहा:

’इस देश में सारी समस्‍या यह है कि यहां विकास की परियोजनाओं में अड़ंगा डालने के लिए याचिकाएं लगाई जाती हैं।‘’

’आप हमें इस देश में एक ऐसी परियोजना दिखाइए जहां ये कथित पर्यावरणवादी, एक्टिविस्‍ट कहते हों कि हम इस परियोजना का स्‍वागत करते हैं।‘’

’आप तो यह भी कहते हैं कि आप एनजीटी में गए और बदकिस्‍मती ये यह आपकी योग्‍यता पर काफी संदेह पैदा कर देता है। आप यदि वाकई एक एक्‍सपर्ट हैं, तो आप किसी विशेषज्ञ एजेंसी के पास, किसी अधिकारी के पास जा के यह नहीं कहते कि देखो यह तुम्‍हारी जमा की हुई रिपोर्ट है और मैं एक्‍सपर्ट हूं और मैंने पाया है कि तुम्‍हारी रिपोर्ट में फलां-फलां कमियां हैं। आप तो कोई आरटीआइ एक्टिविस्‍ट हैं, आप फलाना ढिकाना एक्टिविस्‍ट हैं, पर्यावरणवादी हैं, कितनी तो डिग्रियां हैं आपके पास। मैं आरटीआइ एक्टिविस्‍ट, मैं पर्यावरणवादी, मैं सोशल एक्टिविस्‍ट, मैं फलाना और ढिकाना एक्टिविस्‍ट। जहां दाव लगे वहीं?”   

ये बातें उन्‍होंने 11 मई को खुली अदालत में अपने मुखारविंद से कहीं। सुनवाई गुजरात के पिपावाव तट के विस्‍तार से जुड़े एक मामले की हो रही थी, लेकिन करीब छह सौ शिकायतियों का मानना है कि यह टिप्‍पणी सुने जा रहे केस विशेष के संदर्भ में नहीं, बल्कि अपने पर्यावरण को बचाने के नागरिकों के अधिकार के संदर्भ में की गईं।   

जिन लोगों ने सूर्यकान्‍तजी की कॉक्रोच वाली 15 मई की महागुंजित टिप्‍पणी की जगह इस वाली हलकी और अचर्चित टिप्‍पणी को ध्‍यान से सुना, उन्‍होंने आपत्ति जताते हुए न सिर्फ उनके नाम लंबी चिट्ठी लिखी बल्कि वे दिल्‍ली में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करने भी 22 मई को आए। उनमें ओडिशा के लोक शक्ति अभियान के संयोजक प्रफुल्‍ल सामंतराय भी थे। उन्‍होंने बताया कि अपमानित करने के लहजे में जिस तरह से ‘पर्यावरणवादी’ शब्‍द का सरसरा इस्‍तेमाल हुआ है वह गलत है क्‍योंकि हमारे संविधान का अनुच्‍छेद 51(A)(g) कहता है कि जंगलों, झीलों, नदियों और वन्‍यजीवों सहित अपने पूरे पर्यावरण को बचाना और सुधारना हर नागरिक का मौलिक कर्त्तव्‍य है। इसका मतलब कि जो नागरिक अनुपयुक्‍त विकास परियोजनाओं पर पर्यावरण के हित में सवाल उठा रहे हैं वे अपना संवैधानिक दायित्‍व निभा रहे हैं। कायदे से उन नागरिकों में खुद जज साहब भी हैं क्‍योंकि संविधान के अनुसार वे भी पर्यावरण के संरक्षक हैं।   

जोशीमठ से अतुल सती भी आए थे। उन्‍होंने तो आंकड़ा देकर ही जज साहब को झुठला दिया। उनका कहना था कि यह दावा ही गलत है कि हर याचिका विकास परियोजनाओं में अड़ंगा डालती है। उनके मुताबिक हर साल पर्यावरण, जंगल, वन्‍यजीव और तटीय क्षेत्र से जुड़ी 12500 मंजूरियां दी जाती हैं जो 2022 में अपने चरम पर पहुंच चुकी थीं। इनमें 2020 से 2025 के बीच सालाना औसतन 70 परियोजनाओं को राष्‍ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के सामने नागरिकों या एक्टिविस्‍टों की ओर से चुनौती दी गई।

सबसे अच्‍छी और सीधी बात राजस्‍थान के बहरोड़ जिले की कोटपुतली से आए एक मजदूर पवना अहीर ने कही। वे बोले, ‘’भारत के गरीबों के लिए साफ सुथरा पर्यावरण कोई वैचारिक चुनाव का मामला नहीं है, वह तो हमारे वजूद के लिए जरूरी स्थिति है। हमारे घरों, बच्‍चों के स्‍कूलों और खेतों के आसपास होने वाला खनन और विस्‍फोट हमारे वजूद के अधिकार को खतरा पैदा कर रहा है। हम लोग कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके लेकिन हम गरीबों की कोई नहीं सुनता। हम लोग केवल शंाति से जीना चाहते हैं। क्‍या यह मांग कुछ ज्‍यादा है? गांवों में रहने वाले हम लोगों के लिए तो अदालत ही आखिरी रास्‍ता है।‘’

यही बात प्रभुदयाल वर्मा ने भी कही, जो उत्तरी राजस्‍थान के एक अवकाश प्राप्‍त शिक्षक हैं। सबसे बेचैन करने वाला सवाल बंगलुरु से आए जोसेफ हूवर ने पूछा, ‘’जब मैं पर्यावरण पर बात करता हूं तो मेरी पत्‍नी कहती है कि तुम समय खराब कर रहे हो और सरकार कहती है कि तुम राष्‍ट्रविरोधी हो। मैं क्‍या करूं?”

हूवरजी दो चार दिन दिल्‍ली में और रुकते तो उन्‍हें समझ आ जाता कि क्‍या करना चाहिए। बिरसा मुंडा की जयंती पर लाल किले में 24 मई को भव्‍य जनजातीय सांस्‍कृतिक समागम हुआ था। उसके बाद 28 तारीख को जनजाति सुरक्षा मंच  का एक प्रतिनिधिमंडल सीधे राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिला भी था। हां, उसने देश की किसी भी विकास परियोजना पर, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर कोई सवाल नहीं उठाया, कोई मांग नहीं रखी।  



जिन्‍हें जनजातियों के पर्यावरण की चिंता थी, उन्‍हें तो दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब में सुनने के लिए कायदे से तीस लोग भी नहीं आए थे। इन्‍होंने जो चिट्ठी भेजी है प्रधान जज को पिछली 22 तारीख को, वो शायद उन्‍हें मिल गई होगी। उस पर देश भर से 340 लोगों के दस्‍तखत हैं, लेकिन वे उसे क्‍यों पढ़ेंगे? जब सरकार खुद ही जल, जंगल, जमीन के पारंपरिक रखवाले आदिवासियों का इतना बड़ा मेला दिल्‍ली में लगवा रही है और सरकार चलाने वालों की मातृसंस्‍था का प्रवक्‍ता ‘पांचजन्‍य’ उसे कवर पर छाप रहा है, तो समस्‍या कहां है?   

हूवरजी या प्रफुल्‍लजी और पत्र पर दस्‍तखत करने वाले सैकड़ों लोगों की समस्‍या ये है कि पर्यावरण जैसे नाजुक मसले पर वे गलत पाले में हैं। गलत पाला मतलब? पर्यावरण दिवस पर पालेबाजी नहीं करनी चाहिए। हवा खराब होगी तो सबकी ही जान जाएगी। पर्यावरण पर पालेबाजी कर के दूसरे से पहले कोई बच सकता है क्‍या? बकौल राहत इंदौरी, “लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है”!