दुनिया 200 साल बाद

दो सौ साल पुराने सूर्य के आभासी पुनरुदन्‍त पर एक औपचारिकता

आज ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ को दो सौ साल पूरे हो गए। आज के ही दिन 1826 में कलकत्ते में रहने वाले कानपुर के वकील जुगल किशोर शुक्‍ल ने देश का पहला हिंदी अखबार शुरू किया था। पूरे देश में पत्रकारिता की सुध रखने वाले लोग आज का दिन अलग-अलग तरीकों से मना रहे हैं। बीते हफ्ते भर से कहीं सम्‍मेलन हो रहे हैं, कहीं गोष्‍ठी। जाहिर है, हर साल की 30 मई की तरह इस बार भी हिंदी पत्रकारिता दिवस को रस्‍मी तौर से मनाकर लोग फारिग हो जाएंगे और अपने-अपने काम-धंधों में लग जाएंगे। फिर? शायद ढाई सौ साल होने पर इसे याद करें! वह घड़ी बहुत दूर नहीं है?

अचरज की बात है कि आज तक उदन्‍त मार्तण्‍ड को किसी ने दोबारा, किसी भी रूप में, शुरू करने की कोशिश क्‍यों नहीं की। यह जिज्ञासा एक ऐतिहासिक विडम्‍बना की तरह भी आती है, चूंकि ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ का अर्थ है उगता हुआ सूरज। 1826 में जो सूरज कलकत्ते से उगा, वह आजादी के आंदोलन तक आकाश पर मुसलसल चमकता रहा, लेकिन कुछ दशकों बाद उसका पतन होना शुरू हो गया। आज पत्रकारिता की स्थिति ऐसी हो चुकी है कि खुली आंख से देखने वाला कोई भी प्राणी समाचारों के आकाश पर सूरज के नदारद होने की गवाही देगा। हो सकता है इसी वजह से कभी पत्रकारिता के सूरज को दोबारा उगाने का प्रयास या खुला दावा किसी ने नहीं किया हो। या किया भी हो, तो वह सामान्‍य गति को ही प्राप्त हो गया हो। कौन जाने!

दो सौ साल बाद ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ को डिजिटल रूप से चालू करना आसान फैसला नहीं था। अव्‍वल तो इसलिए क्‍योंकि यहां क्‍या छापा जाए, इसको लेकर कोई साफ समझदारी नहीं थी। दूसरे, मूल अखबार की सामग्री को डिजिटल रूप में पुनरुत्‍पादित करने के लिए उतनी सामग्री उपलब्‍ध नहीं है। कलकत्ते की नेशनल लाइब्रेरी जैसी जगहों पर भी इस अखबार की प्रति नहीं मिलती। इसके बावजूद जो कुछ भी था, हमने उसे जुटाया और बिलकुल उसी भाषा और वर्तनी में उसे पुनरुत्‍पादित करने का निर्णय लिया।

साथ ही दो सौ साल बाद की दुनिया को कैसे लोगों को समझाया जाय, यह एक चुनौती थी। जाहिर है, कहानियां सबसे आसान माध्‍यम होती हैं गूढ़ बातों को सामने लाने का, तो हमने फैसला किया कि सरल कहानियों के माध्‍यम से समकालीन दुनिया की गति को सामने लाया जाए।

इन दोनों को मिलाकर जो कुछ निकल सकता था, वही उदन्‍त मार्तण्‍ड की वेबसाइट के रूप में खड़ा करने का प्रयास है। इसके बारे में विस्‍तार से हमारे प्रकाशकीय इश्‍तेहार में आप पढ़ सकते हैं। मूल अखबार में 1826-27 में छपी पुरानी कहानियां आप यहां पढ़ सकते हैं। नई कहानियां दुनिया दो सौ साल बाद के अंतर्गत पढ़ी जा सकती हैं।   

चूंकि यह वेबसाइट रचना और पुनर्रचना की एक लंबी प्रक्रिया है, इसलिए इसके बारे में अभी कहने को बहुत कुछ नहीं है। सिवाय इसके, कि औपचारिक रूप से इस पोस्‍ट को ‘उदन्‍त मार्तण्‍ड’ का डिजिटल पुनर्जीवन मान लिया जाय। हम नहीं जानते कि इसे कौन पढ़ेगा और कौन नहीं, लेकिन प्रलय की आसन्‍न सूरत में भी सदिच्‍छा को तो नहीं छोड़ा जा सकता!

हिंदी पत्रकारिता दिवस की मुबारकबाद के साथ सभी सुधि पाठकों को शुभकामनाओं के साथ,

अभिषेक श्रीवास्‍तव
दिल्ली