बीते कुछ दिनों से देश में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम की एक नई आभासी सनसनी पर काफी चर्चा हुई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 15 मई, 2026 को सीनियर एडवोकेट के पद पर नियुक्ति से संबंधित सुनवाई के एक खास संदर्भ में बिना डिग्री वाले वकीलों के लिए ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया था। संदर्भ से काटकर कुछ लोग इसे सामान्य बेरोजगार आबादी के लिए प्रयुक्त हुआ मानकर ले उड़े। बाकी सब पिछले दसेक दिन का इतिहास है, जिसमें ऐसा लगा कि देश हिल उठा हो!
इस संदर्भ में जितनी भी प्रतिक्रिया और समीक्षा यहां-वहां लिखी गई, उनके बीच बीती 24 मई को वरिष्ठ पत्रकार पी. साइनाथ की एक पोस्ट सबसे कारगर और संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में सोशल मीडिया मंच एक्स पर शाया हुई। साइनाथ ने मलेशिया के अधिवक्ता और कवि रहे सेसिल राजेंद्रा की लिखी काफी पुरानी एक कविता वहां डाली और उस पर निम्न टिप्पणी की:
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में जिस देश का दरजा 180 राष्ट्रों के बीच 157वां हो, उसके पैमाने से भी देखा जाए तो कॉकरोच जनता पार्टी के प्रति शासक-प्रशासकों की प्रतिक्रिया असाधारण से कहीं ज्यादा है। एक काल्पनिक खुराफात पर लोगों ने जैसी प्रतिक्रिया दी, उसने शायद शासकों को युवा आबादी के बीच फैले गहरे असंतोष, यहां तक कि संकट का संकेत भेजा होगा। इसे उस रूप में देखने के बजाय, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा, देश की ‘’राष्ट्रीय सुरक्षा’’ को खतरे में डालने वाले और ‘’भारत की सम्प्रभुता के लिए जोखिम’’ की तरह पेश किया गया। दशकों पहले मलेशियाई अधिवक्ता और कवि सेसिल राजेंद्रा ने यह विलक्षण कविता लिखी थी जो इस प्रसंग की मूर्खता को कहीं बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करती है, बजाय इसके कि इस पर कोई आडंबरपूर्ण संपादकीय लिखा जाय (वैसे, हमारा ‘मुख्यधारा’ का मीडिया इतना भी करने का साहस नहीं उठा सकता)।

साइनाथ की पोस्ट की हुई सेसिल राजेंद्रा लिखित कविता का शीर्षक है ‘पशु एवं कीट अधिनियम’। कविता का सरल हिंदी अनुवाद देने का प्रयास नीचे है।
पशु एवं कीट अधिनियम
अक्षुण्ण राष्ट्रीय सुरक्षा के हित
पारित कर डाला है उन्होंने अंतत:
पशु एवं कीट आपात नियंत्रण एवं अनुशासन अधिनियम।
इस नए कानून के अंतर्गत एक साथ
तीन से ज्यादा की रेवड़ में
भैंसों, गायों और बकरियों का चरना
वर्जित है।
अब, न तो झुंड में उड़ सकेंगे पक्षी, न ही
दल बना सकेंगी मधुमक्खियां… चूंकि
गैरकानूनी सभा में आता है ये सब।
मिट्टी में घर बनाने से पहले ततैयों और अबाबीलों ने
नहीं ली थी अग्रिम अनुमति, तो
थमा दिया गया है उन्हें खाली करने का नोटिस।
उनके घरों को निजी संपत्ति पर विध्वंसक अतिक्रमण
कर दिया गया है घोषित।
उपयुक्त मंत्रालय से जब तक जारी न हो
प्रसारण का लाइसेंस तब तक के लिए
चेतावनी दी गई है बंदरों और मैनाओं को
बाज़ आएं वे सुबह की अपनी शोर भरी प्रार्थनाओं से।
ऐसे स्वतंत्र प्रसारण, प्रकाशन सबसे बड़ा
खतरा होते हैं राष्ट्रीय आपातकाल में।
बंद करना होगा कठफोड़वों को भी
अब नारियल के तने पर ठकठक कर के
गुप्त संदेश भेजना चम्पा के पेड़ों तक।
सारे संदेश भेजे जाने से पहले
संबंधित अधिकारियों द्वारा की जाएगी
उनकी अनिवार्य सघन जांच।
अफवाह फैलाने के लिए जावा गोरैयों के झुंड
कर लिए गए हैं गिरफ्तार और बिल्लियों को
(षडयंत्र की आशंका में)
नौ बजे तक घर लौट आने का हुक्म है।
अधिसूचना निकली है झींगुरों और टिड्डों के नाम
कम करें वे अपनी ध्वनि का विस्तार।
प्रतिबंधित घंटों के दौरान न तो अब
बतख घुरघुराएंगे न टर्की गड़गड़ाएंगे।
कहने की जरूरत नहीं है, फिर भी-
अल्सेशियन हों या शिकारी दाख्शहुंड,
टेरियर हों या प्वाइंटर, यहां तक कि
खिलौने वाले नन्हे चिहुआउवा भी,
सभी कुत्तों के मुंह पर बराबर लगा दी गई है जांबी।
सुरक्षा के हित पेंग्विन और जेब्रा को आदेश है
उतार फेंकें वे अपनी अनियामित, अमान्य वर्दियां।
और हिरनों को जमा करवानी होंगी अपनी खतरनाक सींगें।
जो पंजे मोड़ कर भीतर छुपा ले जाते हैं नाखून
ऐसे बाघों और मांसभक्षियों को तत्काल
भेज दिया गया जेल
खतरनाक हथियार छुपाने के जुर्म में।
अनुच्छेद चार के पैरा 2(बी) की उपधारा सोलह के तहत
सुबह छह बजे से शाम के छह तक
किसी भी परिस्थिति में
हाथियों के पादने पर लग गया है प्रतिबंध, चूंकि
उनके हवा छोड़ने से हो सकती थी गोली चलने की गफ़लत,
फिर शायद भड़क सकते थे दंगे भी…
कानून के गजेट में अधिसूचित होने के
महीने भर बाद पक्षी और कीट उड़ चले दक्षिण
उत्तर दिशा में कूच कर गए पशु सारे, और
भयावह चुप्पी में कैद हो गए हैं जंगल।
सुरक्षा अब मुकम्मल है, संपूर्ण है।
