पंडित जुगल किशोर शुक्ल कलकत्ता से प्रकाशित अपने अख़बार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ में ‘इस कागज़ के प्रकाशक का इश्तिहार’ के शीर्षक से जो सूचना छापते थे उसमें अख़बार का पता बताया गया था अमड़ातला की गली 37 अंक मार्त्तण्ड छापा घर जो बड़ा बाजार के करीब हुआ करता था। बड़ा बाजार में कोई अमड़ातला नहीं है लेकिन एक अमड़ातला डायमंड हारबर वाली सड़क पर दक्षिण, 24 परगना में जरूर है जो शुक्लजी वाला नहीं हो सकता क्योंकि उसकी दूरी बड़ा बाजार से बहुत ज्यादा है और दो सौ साल पहले वह कलकत्ता शहर का हिस्सा नहीं रहा होगा। यानी बड़ा बाजार में जो अमरतल्ला है वही शुक्लजी का अमड़ातला है। चूंकि गली है, तो वह अब वाली लेन होगी क्योंकि एक अमरतल्ला स्ट्रीट भी वहां है। स्ट्रीट को हम सड़क मान लेते हैं। पर रोड का करेंगे? असल में कलकत्ते में एक ही नाम वाली रोड, स्ट्रीट और लेन से कभी कभार बहुत गड़बड़ हो जाती है।
बहरहाल, हो सकता है कि कभी वहां आम के या अमड़े के पेड़ रहे हों जिसके चलते ऐसा नाम पड़ गया हो। फिर कालान्तर में यही अमरतल्ला हो गया। कौन जाने। अभी तो सभी अमरतल्ला के नाम से ही बुलाते हैं। वहां अमड़ातला कोई नहीं बोलता। हां, आपको बताना होगा कि आप अमरतल्ला लेन में मकान खेज रहे हैं या अमरतल्ला स्ट्रीट में क्योंकि लेन में आजकल केवल 27 अंक तक मकान होते हैं और स्ट्रीट में 29 अंक पर जाकर मकानों की सूची समाप्त हो जाती है। 37 अंक वाला मकान न स्ट्रीट पर है न लेन में। मतलब?
फरवरी 2026 की एक सुहानी सुबह हम लोग ज़कारिया स्ट्रीट के रमज़ान बाजार से सीधे चलते हुए बड़ा बाजार में घुसे। अमरतल्ला लेन पूछते हुए नाक की सीध में चलते गए। किसी ने बताया कि आगे से दाहिने मुड़ने पर लेन खत्म हो जाती है। बाईं ओर एक पुराने भवन को जर्जर बताकर उस पर इश्तिहार लगा दिया गया था और काफी ऊपर तक लकड़ी की सीढ़ियां लगी हुई थीं। शायद वह इमारत गिराई जा रही थी या दोबारा बनाई जा रही थी। चाहे जो हो पर हमने जब उसकी तस्वीर उतारने की कोशिश की तो एक नामालूम शख्स कहीं से निकलकर सामने आ गया और बोला- फोटो मत खींचिए, डिलीट करिए तुरन्त।
कलकत्ता ऐसा कभी नहीं था। पूरा शहर ही जब अजायबघर में रखे जाने लायक किसी पुरानी तस्वीर के जैसा हो तो वहां कौन किसी को रोक सकता था फोटो खींचने से, पर हमें रोका गया। यह पहला तजुर्बा था। ऐसा लगता था कि हम इतिहास की अंधेरी सुरंग में घुस आए हों जहां दबे छुपे तहखानों में साजिशें पनपती हों। उस आदमी को भरोसा दिलाकर हम आगे बढ़े ही थे कि गली खत्म हो गई। हम अमरतल्ला स्ट्रीट पर आ गए। यानी मार्त्तण्ड छापा घर यहीं कहीं होना चाहिए।
गली के अंत में एक चायवाले से हमने दरयाफ्त की। उसीने बताया कि यहां तो 27 अंक पर आकर मकान खत्म हो जाते हैं। 37 का तो सवाल ही नहीं उठता। फिर उसने हमारे पूछने का कारण पूछा। जब हमने बताया कि यहां से कभी कोई अख़बार निकलता था और हम उी का दफ्तर खोज रहे हैं तो उसने सोचकर कहा कि हां, हमने भी सुना है कभी अख़बार निकलता था लेकिन 37 नंबर यहां नहीं है। बल्कि स्ट्रीट भी 29 पर खत्म हो जाती है। आपको सही से याद है?
हमने भरोसा दिलवाया। किसी ने कोई पक्का जवाब नहीं दिया। हम गली पार कर के अमरूद खरीद कर खाने लगे। कलकत्ते के अमरूद इस मौसम में बिलकुल गरी के जैसे मुलायम होते हैं। अमरूद खाने के क्रम में सिर उठाया तब इमारत पर ध्यान गया। वह इमारत नई बनी थी। ऐसा लगता था कि अगल बगल की दो इमारतों को गिराकर नई बनाई गई हैं। दोनों हूबहू एक जैसी थीं। मतलब यह निकला कि कभी अगर कोई निशान रहा भी होगा मार्त्तण्ड छापा धर का तो वह मिटाया जा चुका था। ठीक वैसे ही जैसे थोड़ा पीछे एक दमारत को जर्जर बताकर शायद गिराया जा रहा था।
एक बुजुर्ग दिखाई दिए। हमने उन्हें रोककर पूछा। वे हंसते हुए बोले कि इतनी पुरानी बात भला कौन बताएगा। फिर भी अगर इसी इमारत का मामला है तो उसके नीचे चायपत्ती वाली दुकान से पता कर के देखो क्योंकि इस भवन को उसके मालिक ने ही बनवाया है। वास्तव में दोनों सटे हुए भवन उसी चायपत्ती वाले के निकले।
हमने चायपत्ती वाली दुकान पर जाकर खूब बात की। पता चला कि उसके मालिक साल्ट लेक में रहते हैं। कुछ साल पहले ही उन्होंने दोनों इमारतें बनवाई हैं पुरानी वाली को तोड़कर। उन्हीं में से अमरतल्ला लेन की आखिरी वाली इमारत भी है जिसमें मार्त्तण्ड छापा घर के होने के पूरे सुराग थे गोकि मकानों की संख्या 27 से आगे नहीं बढ़ती थी। उसने एक और बात बताई। मालिक ने जाने किस कारण से दोनों भवनों के कमरे किराये पर नहीं उठाए हैं। ऊपर सब खाली है। यह भी रहस्य ही था।
मालिक को शाम को आना था। हो सकता है कि मालिक के पास कोई ऐसा कागज़ निकल जाता दो सौ साल पहले का जिससे मार्त्तण्ड छापा घर के उसी भवन में होने की पुष्टि होती। हालांकि चायपत्ती वाले का कहना था कि इमारत पहले किसी मुसलमान की थी जिससे चायपत्ती वाले मारवाड़ी ने खरीद कर जमींदोज कर दिया और नई बनवाई। कौन जाने उस मुसलमान ने भी किसी और से न खरीदी रही हो। जो पता इतिहास में ‘अमड़ातला की गली 37 अंक’ के नाम से दर्ज हो ही चुका है, वहां 27 मकानों के बीच 37वां खोजना वैसे भी बेवकूफी ही होती। क्या करते हम मालिक से मिल के!
हम कुछ देर ठहरे। उस भवन को निहारते रहे। फिर लौट आए।