1826 के झरोखे से

इस कागज़ के प्रकाशक का इश्तिहार

यह उदन्‍त मार्त्तण्‍ड अब पहले पहल हिंदुस्‍तानियों के हितके हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगले में जो समाचार का काग़ज़ छपता है उसका सुख उन बोलियों के जान्ने ओ पढ़नेवालों को ही होता है और सब लोग पराये सुख सुखी होते हैं जैसे पराए धन धनी होना ओ अपनी रहते पराई आंख देखना वैसे ही जिस गुणमें जिसकी पैठ न हो उसको उसके रसका स्‍वाद मिलना कठिन ही है और हिंदुस्‍तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं कि पराई चाल देखकर अपनी यहां तक भुले हैं कि परायोंमें जो बुद्धिमन्‍त है वे अपनी तो बनी बनाइ है पर पराई पर भले बुरेका वराव करने का वाना बान्‍धते हैं ऐसी को धन कहा चाहिए जो इसमें वे बड़े कायर हैं जो इतने पर भी भाग टटोलते हैं बांह जो आंखों से सहज में देख सकेंगे उसको धोखे भी न देखकर आंखों को व्‍यर्थ माथे चढ़ावते हैं ऐसी ऐसी बातों के विचार से नाना देश के सत्‍य समाचार हिन्‍दुस्‍तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओ पराई अपेक्षा ओ अपने भाषेंक उपज न छोड़े इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणनि के निधान सबके कल्‍यानके विषय श्रीमान गब्रनर जेनेरेल बहादुरकी आयस से ऐसे साहसमें चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाटठाटा जो कोई प्रशस्‍त लोग इस खबरके काग़ज़के लेनेकी इच्छा करें तो अमड़ातलाकी गली 37 अंक मार्त्तण्‍ड छापा घर में अपना नाम ओ ठिकाना भेजने ही से सतवारे के सतवारे यहांके रहनेवाले घर बैठे ओ वाहिर के रहने वाले डाकपर काग़ज़ पाया करैंगे इसका मोल- महीने में दो रुपया ओ डाकके महसूल की तेहाई लिईजायगी और यहांसे बाहिर रहते हैं उनको यहां रुपयेकी मानौती कर देनी होयगी काहेसे कि महीने महीने के अन्‍तर रुपये भर पावने की रसीद भेजनेमें किसी डेढ़ ओ कहीं एक रुपया डाकका महसूल लगेगा ओ कोइ कारण पाय करके उसी मध्‍ये फिर लखना पड़े तो फिर उतना

खरच बैठेगा। इसमें दो रुपयेके पटने में दो तीन रुपया महसूल का देना लगेगा इससे यहांकी मनोती रहनेसे
इतना खरच ओ अबेर भी कलेश न होयगा।‘’